<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-594519525038210653</atom:id><lastBuildDate>Fri, 25 Dec 2009 12:06:53 +0000</lastBuildDate><title>रामचरित मानस</title><description>इन्टरनेट संस्करण : राहुल त्यागी</description><link>http://ram.eunnao.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (eunnao)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>7</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-594519525038210653.post-3261166923691464159</guid><pubDate>Fri, 01 Feb 2008 13:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-02-01T08:03:37.599-08:00</atom:updated><title>बालकाण्ड</title><description>&lt;FONT face=Arial size=2&gt; &lt;DIV class=entry&gt; &lt;DIV class=snap_preview&gt; &lt;P&gt;।।श्री गणेशाय नमः ।।&lt;BR&gt;श्रीजानकीवल्लभो विजयते&lt;BR&gt;श्री रामचरित मानस&lt;BR&gt;प्रथम  सोपान&lt;BR&gt;(बालकाण्ड)&lt;SPAN id=more-5&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;BR&gt;श्लोक&lt;BR&gt;वर्णानामर्थसंघानां रसानां  छन्दसामपि।&lt;BR&gt;मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।&lt;BR&gt;भवानीशङ्करौ वन्दे  श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।&lt;BR&gt;याभ्यां विना न पश्यन्ति  सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्।।2।।&lt;BR&gt;वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं  शङ्कररूपिणम्।&lt;BR&gt;यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र  वन्द्यते।।3।।&lt;BR&gt;सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।&lt;BR&gt;वन्दे विशुद्धविज्ञानौ  कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।&lt;BR&gt;उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं  क्लेशहारिणीम्।&lt;BR&gt;सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं  रामवल्लभाम्।।5।।&lt;BR&gt;यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं  ब्रह्मादिदेवासुरा&lt;BR&gt;यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ  यथाहेर्भ्रमः।&lt;BR&gt;यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां&lt;BR&gt;वन्देऽहं  तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।&lt;BR&gt;नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्&lt;BR&gt;रामायणे  निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।&lt;BR&gt;स्वान्तःसुखाय तुलसी  रघुनाथगाथा-&lt;BR&gt;भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7।।&lt;BR&gt;सो0-जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक  करिबर बदन।&lt;BR&gt;करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।1।।&lt;BR&gt;मूक होइ बाचाल पंगु  चढइ गिरिबर गहन।&lt;BR&gt;जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन।।2।।&lt;BR&gt;नील सरोरुह  स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।&lt;BR&gt;करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन।।3।।&lt;BR&gt;कुंद इंदु  सम देह उमा रमन करुना अयन।&lt;BR&gt;जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन।।4।।&lt;BR&gt;बंदउ  गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।&lt;BR&gt;महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर  निकर।।5।।&lt;BR&gt;बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।&lt;BR&gt;अमिय मूरिमय  चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।।&lt;BR&gt;सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल  मोद प्रसूती।।&lt;BR&gt;जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।&lt;BR&gt;श्रीगुर  पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती।।&lt;BR&gt;दलन मोह तम सो सप्रकासू।  बड़े भाग उर आवइ जासू।।&lt;BR&gt;उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी  के।।&lt;BR&gt;सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।&lt;BR&gt;दो0-जथा  सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।&lt;BR&gt;कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि  निधान।।1।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति  सारा।।&lt;BR&gt;मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।&lt;BR&gt;भनिति बिचित्र सुकबि  कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।।&lt;BR&gt;बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर  नारी।।&lt;BR&gt;सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।।&lt;BR&gt;सादर कहहिं  सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।।&lt;BR&gt;जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप  प्रकट एहि माहीं।।&lt;BR&gt;सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।।&lt;BR&gt;धूमउ  तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।।&lt;BR&gt;भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग  मंगल करनी।।&lt;BR&gt;छं0-मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।।&lt;BR&gt;गति कूर कबिता  सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।।&lt;BR&gt;प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन  भावनी।।&lt;BR&gt;भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।&lt;BR&gt;दो0-प्रिय लागिहि अति  सबहि मम भनिति राम जस संग।&lt;BR&gt;दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय  प्रसंग।।10(क)।।&lt;BR&gt;स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।&lt;BR&gt;गिरा ग्राम्य  सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।10(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।  नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।&lt;BR&gt;तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव  मोचन।।&lt;BR&gt;बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।।&lt;BR&gt;सुजन समाज सकल गुन  खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।।&lt;BR&gt;साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय  फल जासू।।&lt;BR&gt;जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।।&lt;BR&gt;मुद मंगलमय  संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।&lt;BR&gt;राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार  प्रचारा।।&lt;BR&gt;बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।।&lt;BR&gt;हरि हर कथा  बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।&lt;BR&gt;बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज  सुकरमा।।&lt;BR&gt;सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।&lt;BR&gt;अकथ अलौकिक  तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।&lt;BR&gt;दो0-सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति  अनुराग।&lt;BR&gt;लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मज्जन फल  पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।&lt;BR&gt;सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा  नहिं गोई।।&lt;BR&gt;बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।&lt;BR&gt;जलचर थलचर नभचर  नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।&lt;BR&gt;मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं  पाई।।&lt;BR&gt;सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।&lt;BR&gt;बिनु सतसंग बिबेक न होई।  राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।&lt;BR&gt;सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन  फूला।।&lt;BR&gt;सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।&lt;BR&gt;बिधि बस सुजन कुसंगत  परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।&lt;BR&gt;बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु  महिमा सकुचानी।।&lt;BR&gt;सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन  जैसें।।&lt;BR&gt;दो0-बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।&lt;BR&gt;अंजलि गत सुभ सुमन जिमि  सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।&lt;BR&gt;संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।&lt;BR&gt;बालबिनय सुनि  करि कृपा राम चरन रति देहु।।3(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु  काज दाहिनेहु बाएँ।।&lt;BR&gt;पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद  बसेरें।।&lt;BR&gt;हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।।&lt;BR&gt;जे पर दोष लखहिं  सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी।।&lt;BR&gt;तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी  धनेसा।।&lt;BR&gt;उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।।&lt;BR&gt;पर अकाजु लगि तनु  परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।।&lt;BR&gt;बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ  पर दोषा।।&lt;BR&gt;पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना।।&lt;BR&gt;बहुरि सक्र  सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।।&lt;BR&gt;बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर  दोष निहारा।।&lt;BR&gt;दो0-उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।&lt;BR&gt;जानि पानि जुग जोरि  जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न  लाउब भोरा।।&lt;BR&gt;बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।।&lt;BR&gt;बंदउँ  संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।।&lt;BR&gt;बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत  एक दुख दारुन देहीं।।&lt;BR&gt;उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन  बिलगाहीं।।&lt;BR&gt;सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।&lt;BR&gt;भल अनभल निज निज  करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।।&lt;BR&gt;सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि  ब्याधू।।&lt;BR&gt;गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।&lt;BR&gt;दो0-भलो भलाइहि  पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।&lt;BR&gt;सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ  मीचु।।5।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।&lt;BR&gt;तेहि  तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।।&lt;BR&gt;भलेउ पोच सब बिधि उपजाए।  गनि गुन दोष बेद बिलगाए।।&lt;BR&gt;कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन  साना।।&lt;BR&gt;दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।।&lt;BR&gt;दानव देव ऊँच  अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।।&lt;BR&gt;माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक  अवनीसा।।&lt;BR&gt;कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा।।&lt;BR&gt;सरग नरक अनुराग  बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।&lt;BR&gt;दो0-जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह  करतार।&lt;BR&gt;संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अस बिबेक जब  देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।।&lt;BR&gt;काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस  चुकइ भलाई।।&lt;BR&gt;सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।।&lt;BR&gt;खलउ  करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।।&lt;BR&gt;लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष  प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।&lt;BR&gt;उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन  राहू।।&lt;BR&gt;किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।।&lt;BR&gt;हानि कुसंग  सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।।&lt;BR&gt;गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ  नीच जल संगा।।&lt;BR&gt;साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।।&lt;BR&gt;धूम  कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।।&lt;BR&gt;सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद  जग जीवन दाता।।&lt;BR&gt;दो0-ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।&lt;BR&gt;होहि कुबस्तु  सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7(क)।।&lt;BR&gt;सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि  कीन्ह।&lt;BR&gt;ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7(ख)।।&lt;BR&gt;जड़ चेतन जग जीव जत सकल  राममय जानि।&lt;BR&gt;बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7(ग)।।&lt;BR&gt;देव दनुज नर नाग  खग प्रेत पितर गंधर्ब।&lt;BR&gt;बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब  सर्ब।।7(घ)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।&lt;BR&gt;सीय  राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।&lt;BR&gt;जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि  करहु छाड़ि छल छोहू।।&lt;BR&gt;निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब  पाही।।&lt;BR&gt;करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।।&lt;BR&gt;सूझ न एकउ अंग  उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।&lt;BR&gt;मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न  छाछी।।&lt;BR&gt;छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।&lt;BR&gt;जौ बालक कह तोतरि  बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।।&lt;BR&gt;हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन  भूषनधारी।।&lt;BR&gt;निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।&lt;BR&gt;जे पर भनिति  सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।&lt;BR&gt;जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि  बढ़हिं जल पाई।।&lt;BR&gt;सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।&lt;BR&gt;दो0-भाग  छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।&lt;BR&gt;पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं  उपहास।।8।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।&lt;BR&gt;हंसहि  बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।।&lt;BR&gt;कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह  कहँ सुखद हास रस एहू।।&lt;BR&gt;भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं  खोरी।।&lt;BR&gt;प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।।&lt;BR&gt;हरि हर  पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की।।&lt;BR&gt;राम भगति भूषित जियँ जानी।  सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।।&lt;BR&gt;कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या  हीनू।।&lt;BR&gt;आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना।।&lt;BR&gt;भाव भेद रस भेद  अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।।&lt;BR&gt;कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि  कागद कोरे।।&lt;BR&gt;दो0-भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।&lt;BR&gt;सो बिचारि  सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक।।9।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।&lt;BR&gt;नृप किरीट तरुनी  तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।&lt;BR&gt;तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत  छबि लहहीं।।&lt;BR&gt;भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।।&lt;BR&gt;राम चरित सर  बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।&lt;BR&gt;कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं  हरि जस कलि मल हारी।।&lt;BR&gt;कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत  पछिताना।।&lt;BR&gt;हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।&lt;BR&gt;जौं बरषइ  बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।&lt;BR&gt;दो0-जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं  रामचरित बर ताग।&lt;BR&gt;पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जे  जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।&lt;BR&gt;चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर  कलि मल भाँड़ें।।&lt;BR&gt;बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।।&lt;BR&gt;तिन्ह महँ  प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।।&lt;BR&gt;जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा  पार नहिं लहऊँ।।&lt;BR&gt;ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।।&lt;BR&gt;समुझि  बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।।&lt;BR&gt;एतेहु पर करिहहिं जे  असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।।&lt;BR&gt;कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप  राम गुन गावउँ।।&lt;BR&gt;कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।।&lt;BR&gt;जेहिं  मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।।&lt;BR&gt;समुझत अमित राम प्रभुताई।  करत कथा मन अति कदराई।।&lt;BR&gt;दो0-सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।&lt;BR&gt;नेति नेति  कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि  कहें बिनु रहा न कोई।।&lt;BR&gt;तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु  भाषा।।&lt;BR&gt;एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।&lt;BR&gt;ब्यापक बिस्वरूप भगवाना।  तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।&lt;BR&gt;सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत  अनुरागी।।&lt;BR&gt;जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।।&lt;BR&gt;गई बहोर  गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।&lt;BR&gt;बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत  सुफल निज बानी।।&lt;BR&gt;तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद  माथा।।&lt;BR&gt;मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;दो0-अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।&lt;BR&gt;चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु  श्रम पारहि जाहिं।।13।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा  सुहाई।।&lt;BR&gt;ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।।&lt;BR&gt;चरन कमल  बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।।&lt;BR&gt;कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह  बरने रघुपति गुन ग्रामा।।&lt;BR&gt;जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित  बखाने।।&lt;BR&gt;भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।।&lt;BR&gt;होहु  प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।।&lt;BR&gt;जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो  श्रम बादि बाल कबि करहीं।।&lt;BR&gt;कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित  होई।।&lt;BR&gt;राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।।&lt;BR&gt;तुम्हरी कृपा सुलभ  सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।&lt;BR&gt;दो0-सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं  सुजान।&lt;BR&gt;सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।&lt;BR&gt;सो न होइ बिनु बिमल  मति मोहि मति बल अति थोर।&lt;BR&gt;करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ  निहोर।।14(ख)।।&lt;BR&gt;कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।&lt;BR&gt;बाल बिनय सुनि सुरुचि  लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सो0-बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं  निरमयउ।&lt;BR&gt;सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।।&lt;BR&gt;बंदउँ चारिउ बेद भव  बारिधि बोहित सरिस।&lt;BR&gt;जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद  जसु।।14(ङ)।।&lt;BR&gt;बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।&lt;BR&gt;संत सुधा ससि धेनु  प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।।&lt;BR&gt;दो0-बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर  जोरि।&lt;BR&gt;होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पुनि बंदउँ  सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।&lt;BR&gt;मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर  अबिबेका।।&lt;BR&gt;गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।।&lt;BR&gt;सेवक स्वामि  सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।।&lt;BR&gt;कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा।  साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।&lt;BR&gt;अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस  प्रतापू।।&lt;BR&gt;सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।&lt;BR&gt;सुमिरि सिवा  सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।।&lt;BR&gt;भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज  मिलि मनहुँ सुराती।।&lt;BR&gt;जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि  सचेता।।&lt;BR&gt;होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।&lt;BR&gt;दो0-सपनेहुँ  साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।&lt;BR&gt;तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति  प्रभाउ।।15।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष  नसावनि।।&lt;BR&gt;प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।&lt;BR&gt;सिय  निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।।&lt;BR&gt;बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु  सकल जग माची।।&lt;BR&gt;प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।।&lt;BR&gt;दसरथ  राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।&lt;BR&gt;करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु  कृपा सुत सेवक जानी।।&lt;BR&gt;जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु  माता।।&lt;BR&gt;सो0-बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।&lt;BR&gt;बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु  तृन इव परिहरेउ।।16।।&lt;BR&gt;प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़  सनेहू।।&lt;BR&gt;जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।।&lt;BR&gt;प्रनवउँ प्रथम भरत  के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।&lt;BR&gt;राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न  पासू।।&lt;BR&gt;बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।।&lt;BR&gt;रघुपति कीरति बिमल  पताका। दंड समान भयउ जस जाका।।&lt;BR&gt;सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय  टारन।।&lt;BR&gt;सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।।&lt;BR&gt;रिपुसूदन पद  कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।।&lt;BR&gt;महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप  बखाना।।&lt;BR&gt;सो0-प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।&lt;BR&gt;जासु हृदय आगार बसहिं राम  सर चाप धर।।17।।&lt;BR&gt;कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।&lt;BR&gt;बंदउँ सब के  चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।&lt;BR&gt;रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर  समेते।।&lt;BR&gt;बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।।&lt;BR&gt;सुक सनकादि भगत  मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।&lt;BR&gt;प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा  जन जानि मुनीसा।।&lt;BR&gt;जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।।&lt;BR&gt;ताके  जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।&lt;BR&gt;पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन  कमल बंदउँ सब लायक।।&lt;BR&gt;राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख  दायक।।&lt;BR&gt;दो0-गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।&lt;BR&gt;बदउँ सीता राम पद  जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु  भानु हिमकर को।।&lt;BR&gt;बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान  सो।।&lt;BR&gt;महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।&lt;BR&gt;महिमा जासु जान  गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।&lt;BR&gt;जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा  जापू।।&lt;BR&gt;सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।।&lt;BR&gt;हरषे हेतु हेरि हर  ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।।&lt;BR&gt;नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह  अमी को।।&lt;BR&gt;दो0-बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।।&lt;BR&gt;राम नाम बर बरन जुग  सावन भादव मास।।19।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय  जोऊ।।&lt;BR&gt;सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।।&lt;BR&gt;कहत सुनत सुमिरत  सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।।&lt;BR&gt;बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम  सहज सँघाती।।&lt;BR&gt;नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।।&lt;BR&gt;भगति  सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ।&lt;BR&gt;स्वाद तोष सम सुगति सुधा के।  कमठ सेष सम धर बसुधा के।।&lt;BR&gt;जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर  से।।&lt;BR&gt;दो0-एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।&lt;BR&gt;तुलसी रघुबर नाम के बरन  बिराजत दोउ।।20।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु  अनुगामी।।&lt;BR&gt;नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।।&lt;BR&gt;को बड़ छोट कहत  अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।।&lt;BR&gt;देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं  नाम बिहीना।।&lt;BR&gt;रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।।&lt;BR&gt;सुमिरिअ  नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।&lt;BR&gt;नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत  सुखद न परति बखानी।।&lt;BR&gt;अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर  दुभाषी।।&lt;BR&gt;दो0-राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।&lt;BR&gt;तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं  चाहसि उजिआर।।21।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच  बियोगी।।&lt;BR&gt;ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।।&lt;BR&gt;जाना चहहिं गूढ़  गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।।&lt;BR&gt;साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध  अनिमादिक पाएँ।।&lt;BR&gt;जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।&lt;BR&gt;राम  भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।&lt;BR&gt;चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी  प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।&lt;BR&gt;चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन  उपाऊ।।&lt;BR&gt;दो0-सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।&lt;BR&gt;नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ  किए मन मीन।।22।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि  अनूपा।।&lt;BR&gt;मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।।&lt;BR&gt;प्रोढ़ि  सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।।&lt;BR&gt;एकु दारुगत देखिअ एकू।  पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।।&lt;BR&gt;उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म  राम तें।।&lt;BR&gt;ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।।&lt;BR&gt;अस प्रभु  हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।&lt;BR&gt;नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत  जिमि मोल रतन तें।।&lt;BR&gt;दो0-निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।&lt;BR&gt;कहउँ नामु  बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट  किए साधु सुखारी।।&lt;BR&gt;नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।।&lt;BR&gt;राम एक  तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।&lt;BR&gt;रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित  सेन सुत कीन्ह बिबाकी।।&lt;BR&gt;सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि  नासा।।&lt;BR&gt;भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।।&lt;BR&gt;दंडक बनु प्रभु  कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।।&lt;BR&gt;निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल  कलि कलुष निकंदन।।&lt;BR&gt;दो0-सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।&lt;BR&gt;नाम उधारे  अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान  सबु कोऊ।।&lt;BR&gt;नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।।&lt;BR&gt;राम भालु कपि  कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।।&lt;BR&gt;नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु  बिचारु सुजन मन माहीं।।&lt;BR&gt;राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु  धारा।।&lt;BR&gt;राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।।&lt;BR&gt;सेवक सुमिरत नामु  सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।&lt;BR&gt;फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद  सोच नहिं सपनें।।&lt;BR&gt;दो0-ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।&lt;BR&gt;रामचरित सत  कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।&lt;BR&gt;मासपारायण, पहला विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नाम  प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।&lt;BR&gt;सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम  प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।&lt;BR&gt;नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय  आपू।।&lt;BR&gt;नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।&lt;BR&gt;ध्रुवँ  सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।।&lt;BR&gt;सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस  करि राखे रामू।।&lt;BR&gt;अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।&lt;BR&gt;कहौं  कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।&lt;BR&gt;दो0-नामु राम को कलपतरु कलि  कल्यान निवासु।&lt;BR&gt;जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;चहुँ  जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।&lt;BR&gt;बेद पुरान संत मत एहू। सकल  सुकृत फल राम सनेहू।।&lt;BR&gt;ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु  पूजें।।&lt;BR&gt;कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन जन मीना।।&lt;BR&gt;नाम कामतरु काल  कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।।&lt;BR&gt;राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु  माता।।&lt;BR&gt;नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।।&lt;BR&gt;कालनेमि कलि कपट  निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।&lt;BR&gt;दो0-राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।&lt;BR&gt;जापक  जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम  जपत मंगल दिसि दसहूँ।।&lt;BR&gt;सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि  माथा।।&lt;BR&gt;मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।।&lt;BR&gt;राम  सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।।&lt;BR&gt;लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं।  बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।।&lt;BR&gt;गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन  उजागर।।&lt;BR&gt;सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।।&lt;BR&gt;साधु सुजान  सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।।&lt;BR&gt;सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति  नति गति पहिचानी।।&lt;BR&gt;यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।।&lt;BR&gt;रीझत राम  सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।&lt;BR&gt;दो0-सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं  राम कृपालु।&lt;BR&gt;उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।।&lt;BR&gt;हौहु कहावत  सबु कहत राम सहत उपहास।&lt;BR&gt;साहिब सीतानाथ सो सेवक  तुलसीदास।।28(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक  सकोरी।।&lt;BR&gt;समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।।&lt;BR&gt;सुनि  अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।।&lt;BR&gt;कहत नसाइ होइ हियँ नीकी।  रीझत राम जानि जन जी की।।&lt;BR&gt;रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए  की।।&lt;BR&gt;जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।।&lt;BR&gt;सोइ  करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।।&lt;BR&gt;ते भरतहि भेंटत सनमाने।  राजसभाँ रघुबीर बखाने।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।।&lt;BR&gt;तुलसी  कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।।&lt;BR&gt;राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।&lt;BR&gt;जों  यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।।&lt;BR&gt;एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि  सिरु नाइ।&lt;BR&gt;बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष  नसाइ।।29(ग)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि  सुनाई।।&lt;BR&gt;कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।।&lt;BR&gt;संभु कीन्ह यह  चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।&lt;BR&gt;सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम  भगत अधिकारी चीन्हा।।&lt;BR&gt;तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति  गावा।।&lt;BR&gt;ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।।&lt;BR&gt;जानहिं तीनि काल निज  ग्याना। करतल गत आमलक समाना।।&lt;BR&gt;औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि  नाना।।&lt;BR&gt;दो0-मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।&lt;BR&gt;समुझी नहि तसि बालपन तब  अति रहेउँ अचेत।।30(क)।।&lt;BR&gt;श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।&lt;BR&gt;किमि समुझौं  मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि  परी कछु मति अनुसारा।।&lt;BR&gt;भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं  होई।।&lt;BR&gt;जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।।&lt;BR&gt;निज  संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।।&lt;BR&gt;बुध बिश्राम सकल जन रंजनि।  रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।।&lt;BR&gt;रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ  अरनी।।&lt;BR&gt;रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।&lt;BR&gt;सोइ बसुधातल सुधा  तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।&lt;BR&gt;असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध  कुल हित गिरिनंदिनि।।&lt;BR&gt;संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।।&lt;BR&gt;जम  गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।&lt;BR&gt;रामहि प्रिय पावनि तुलसी  सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।।&lt;BR&gt;सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख  संपति रासी।।&lt;BR&gt;सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।&lt;BR&gt;दो0-  राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।&lt;BR&gt;तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर  बिहारु।।31।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग  सिंगारू।।&lt;BR&gt;जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।&lt;BR&gt;सदगुर  ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।।&lt;BR&gt;जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज  सकल ब्रत धरम नेम के।।&lt;BR&gt;समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।।&lt;BR&gt;सचिव  सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।।&lt;BR&gt;काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि  सावक जन मन बन के।।&lt;BR&gt;अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि  के।।&lt;BR&gt;मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।&lt;BR&gt;हरन मोह तम दिनकर  कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।।&lt;BR&gt;अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर  से।।&lt;BR&gt;सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।।&lt;BR&gt;सकल सुकृत फल भूरि भोग  से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।।&lt;BR&gt;सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल  से।।&lt;BR&gt;दो0-कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।&lt;BR&gt;दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन  अनल प्रचंड।।32(क)।।&lt;BR&gt;रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।&lt;BR&gt;सज्जन कुमुद चकोर  चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि  बिधि संकर कहा बखानी।।&lt;BR&gt;सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र  बनाई।।&lt;BR&gt;जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।।&lt;BR&gt;कथा अलौकिक  सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।।&lt;BR&gt;रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि  प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।।&lt;BR&gt;नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि  अपारा।।&lt;BR&gt;कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।&lt;BR&gt;करिअ न संसय अस उर  आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।&lt;BR&gt;दो0-राम अनंत अनंत गुन अमित कथा  बिस्तार।&lt;BR&gt;सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि  बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।&lt;BR&gt;पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी।  करत कथा जेहिं लाग न खोरी।।&lt;BR&gt;सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन  गाथा।।&lt;BR&gt;संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।&lt;BR&gt;नौमी भौम बार मधु  मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।&lt;BR&gt;जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल  तहाँ चलि आवहिं।।&lt;BR&gt;असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।।&lt;BR&gt;जन्म  महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।&lt;BR&gt;दो0-मज्जहि सज्जन बृंद बहु  पावन सरजू नीर।&lt;BR&gt;जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;दरस  परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।।&lt;BR&gt;नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न  सकइ सारद बिमलमति।।&lt;BR&gt;राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति  पावनि।।&lt;BR&gt;चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।।&lt;BR&gt;सब बिधि पुरी  मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।।&lt;BR&gt;बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं  काम मद दंभा।।&lt;BR&gt;रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।।&lt;BR&gt;मन करि विषय  अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।।&lt;BR&gt;रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु  सुहावन पावन।।&lt;BR&gt;त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।।&lt;BR&gt;रचि  महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।।&lt;BR&gt;तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम  हियँ हेरि हरषि हर।।&lt;BR&gt;कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन  लाई।।&lt;BR&gt;दो0-जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।&lt;BR&gt;अब सोइ कहउँ प्रसंग सब  सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस  कबि तुलसी।।&lt;BR&gt;करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।।&lt;BR&gt;सुमति  भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।।&lt;BR&gt;बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर  मनोहर मंगलकारी।।&lt;BR&gt;लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल  हानी।।&lt;BR&gt;प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।।&lt;BR&gt;सो जल सुकृत सालि  हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।।&lt;BR&gt;मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ  सुहावन।।&lt;BR&gt;भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।&lt;BR&gt;दो0-सुठि  सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।&lt;BR&gt;तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर  चारि।।36।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन  माना।।&lt;BR&gt;रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।।&lt;BR&gt;राम सीय जस सलिल  सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।।&lt;BR&gt;पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप  सुहाई।।&lt;BR&gt;छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।।&lt;BR&gt;अरथ अनूप सुमाव  सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।।&lt;BR&gt;सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार  मराला।।&lt;BR&gt;धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।।&lt;BR&gt;अरथ धरम कामादिक  चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।&lt;BR&gt;नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु  तड़ागा।।&lt;BR&gt;सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।।&lt;BR&gt;संतसभा चहुँ  दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।।&lt;BR&gt;भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम  लता बिताना।।&lt;BR&gt;सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।।&lt;BR&gt;औरउ कथा  अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।&lt;BR&gt;दो0-पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग  बिहारु।&lt;BR&gt;माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जे गावहिं यह चरित  सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।&lt;BR&gt;सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस  अधिकारी।।&lt;BR&gt;अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।।&lt;BR&gt;संबुक भेक  सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।।&lt;BR&gt;तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक  बिचारे।।&lt;BR&gt;आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।।&lt;BR&gt;कठिन कुसंग कुपंथ  कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।।&lt;BR&gt;गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल  बिसाला।।&lt;BR&gt;बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।&lt;BR&gt;दो0-जे श्रद्धा  संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ।&lt;BR&gt;तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय  रघुनाथ।।38।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई  होई।।&lt;BR&gt;जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।।&lt;BR&gt;करि न जाइ सर मज्जन  पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।।&lt;BR&gt;जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि  बुझावा।।&lt;BR&gt;सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।।&lt;BR&gt;सोइ सादर  सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।।&lt;BR&gt;ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम  चरन भल भाऊ।।&lt;BR&gt;जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।।&lt;BR&gt;अस मानस मानस चख  चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।।&lt;BR&gt;भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद  प्रबाहू।।&lt;BR&gt;चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।।&lt;BR&gt;सरजू नाम  सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।।&lt;BR&gt;नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु  मूल निकंदिनि।।&lt;BR&gt;दो0-श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।&lt;BR&gt;संतसभा  अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति  सरजु सुहाई।।&lt;BR&gt;सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।।&lt;BR&gt;जुग बिच  भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।।&lt;BR&gt;त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी।  राम सरुप सिंधु समुहानी।।&lt;BR&gt;मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन  करिही।।&lt;BR&gt;बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।।&lt;BR&gt;उमा महेस  बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।।&lt;BR&gt;रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग  मनोहरताई।।&lt;BR&gt;दो0-बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।&lt;BR&gt;नृप रानी परिजन सुकृत  मधुकर बारिबिहंग।।40।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि  छाई।।&lt;BR&gt;नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।।&lt;BR&gt;सुनि अनुकथन परस्पर  होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।।&lt;BR&gt;घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर  बानी।।&lt;BR&gt;सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।।&lt;BR&gt;कहत सुनत हरषहिं  पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।।&lt;BR&gt;राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु  जुरे समाजा।।&lt;BR&gt;काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।&lt;BR&gt;दो0-समन अमित  उतपात सब भरतचरित जपजाग।&lt;BR&gt;कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग  काग।।41।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।&lt;BR&gt;हिम  हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।।&lt;BR&gt;बरनब राम बिबाह समाजू। सो  मुद मंगलमय रितुराजू।।&lt;BR&gt;ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।।&lt;BR&gt;बरषा  घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।।&lt;BR&gt;राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद  सोइ सरद सुहाई।।&lt;BR&gt;सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।।&lt;BR&gt;भरत  सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।&lt;BR&gt;दो0- अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर  हास।&lt;BR&gt;भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;आरति बिनय दीनता  मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।&lt;BR&gt;अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल  हारी।।&lt;BR&gt;राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानौ।।&lt;BR&gt;भव श्रम सोषक तोषक  तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।।&lt;BR&gt;काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग  बढ़ावन।।&lt;BR&gt;सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।।&lt;BR&gt;जिन्ह एहि बारि  न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।।&lt;BR&gt;तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग  जिमि जीव दुखारी।।&lt;BR&gt;दो0-मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।&lt;BR&gt;सुमिरि भवानी  संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ  प्रसाद ।&lt;BR&gt;कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।&lt;BR&gt;भरद्वाज मुनि बसहिं  प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।&lt;BR&gt;तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम  सुजाना।।&lt;BR&gt;माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।&lt;BR&gt;देव दनुज किंनर नर  श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।&lt;BR&gt;पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु  हरषहिं गाता।।&lt;BR&gt;भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।।&lt;BR&gt;तहाँ होइ  मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।।&lt;BR&gt;मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं  परसपर हरि गुन गाहा।।&lt;BR&gt;दो0-ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि प्रकार भरि माघ  नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।&lt;BR&gt;प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि  गवनहिं मुनिबृंदा।।&lt;BR&gt;एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।।&lt;BR&gt;जगबालिक  मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।।&lt;BR&gt;सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन  बैठारे।।&lt;BR&gt;करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।।&lt;BR&gt;नाथ एक संसउ  बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।।&lt;BR&gt;कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ  अकाजा।।&lt;BR&gt;दो0-संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।&lt;BR&gt;होइ न बिमल  बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु  नाथ करि जन पर छोहू।।&lt;BR&gt;रास नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।।&lt;BR&gt;संतत  जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।।&lt;BR&gt;आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत  परम पद लहहीं।।&lt;BR&gt;सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।।&lt;BR&gt;रामु कवन  प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।।&lt;BR&gt;एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर  चरित बिदित संसारा।।&lt;BR&gt;नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु  मारा।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।&lt;BR&gt;सत्यधाम सर्बग्य  तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा  नाथ बिस्तारी।।&lt;BR&gt;जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति  प्रभुताई।।&lt;BR&gt;राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।।&lt;BR&gt;चाहहु  सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।।&lt;BR&gt;तात सुनहु सादर मनु लाई।  कहउँ राम कै कथा सुहाई।।&lt;BR&gt;महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका  कराला।।&lt;BR&gt;रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।।&lt;BR&gt;ऐसेइ संसय कीन्ह  भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।&lt;BR&gt;दो0-कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु  संबाद।&lt;BR&gt;भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एक बार  त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।&lt;BR&gt;संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि  अखिलेस्वर जानी।।&lt;BR&gt;रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।।&lt;BR&gt;रिषि  पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।।&lt;BR&gt;कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन  तहाँ रहे गिरिनाथा।।&lt;BR&gt;मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग  दच्छकुमारी।।&lt;BR&gt;तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।।&lt;BR&gt;पिता बचन  तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।&lt;BR&gt;दो0-ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि  दरसनु होइ।&lt;BR&gt;गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु  कोइ।।48(क)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सो0-संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।।&lt;BR&gt;तुलसी  दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।&lt;BR&gt;रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु  कीन्ह चह साचा।।&lt;BR&gt;जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।।&lt;BR&gt;एहि  बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।।&lt;BR&gt;लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ  कपट कुरंगा।।&lt;BR&gt;करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।।&lt;BR&gt;मृग  बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।।&lt;BR&gt;बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत  बिपिन फिरत दोउ भाई।।&lt;BR&gt;कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख  ताकें।।&lt;BR&gt;दो0-अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।&lt;BR&gt;जे मतिमंद बिमोह बस  हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति  हरपु बिसेषा।।&lt;BR&gt;भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी।।&lt;BR&gt;जय  सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।।&lt;BR&gt;चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि  पुलकत कृपानिकेता।।&lt;BR&gt;सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी।।&lt;BR&gt;संकरु  जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।।&lt;BR&gt;तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि  सच्चिदानंद परधमा।।&lt;BR&gt;भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न  रोकी।।&lt;BR&gt;दो0-ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद। &lt;/P&gt; &lt;P&gt;सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बिष्नु जो सुर हित  नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।&lt;BR&gt;खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम  श्रीपति असुरारी।।&lt;BR&gt;संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।।&lt;BR&gt;अस  संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।।&lt;BR&gt;जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर  अंतरजामी सब जानी।।&lt;BR&gt;सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।।&lt;BR&gt;जासु  कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।&lt;BR&gt;सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत  जाहि सदा मुनि धीरा।।&lt;BR&gt;छं0-मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि  ध्यावहीं।&lt;BR&gt;कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं।।&lt;BR&gt;सोइ रामु ब्यापक  ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।&lt;BR&gt;अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित  रघुकुलमनि।।&lt;BR&gt;सो0-लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।&lt;BR&gt;बोले बिहसि महेसु  हरिमाया बलु जानि जियँ।।51।।&lt;BR&gt;जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा  लेहू।।&lt;BR&gt;तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही।।&lt;BR&gt;जैसें जाइ  मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।।&lt;BR&gt;चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं  बिचारु करौं का भाई।।&lt;BR&gt;इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं  कल्याना।।&lt;BR&gt;मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं।।&lt;BR&gt;होइहि सोइ जो  राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।&lt;BR&gt;अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ  प्रभु सुखधामा।।&lt;BR&gt;दो0-पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।&lt;BR&gt;आगें होइ  चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप।।52।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए  भ्रम हृदयँ बिसेषा।।&lt;BR&gt;कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत  मतिधीरा।।&lt;BR&gt;सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।।&lt;BR&gt;सुमिरत जाहि मिटइ  अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।।&lt;BR&gt;सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव  प्रभाऊ।।&lt;BR&gt;निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।।&lt;BR&gt;जोरि पानि  प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।।&lt;BR&gt;कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू।  बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।&lt;BR&gt;दो0-राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति  संकोचु।&lt;BR&gt;सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मैं संकर कर  कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।&lt;BR&gt;जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति  दारुन दाहा।।&lt;BR&gt;जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।।&lt;BR&gt;सतीं  दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता।।&lt;BR&gt;फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा।  सहित बंधु सिय सुंदर वेषा।।&lt;BR&gt;जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस  प्रबीना।।&lt;BR&gt;देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।।&lt;BR&gt;बंदत चरन  करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।&lt;BR&gt;दो0-सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित  अनूप।&lt;BR&gt;जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।।54।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखे  जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।&lt;BR&gt;जीव चराचर जो संसारा। देखे  सकल अनेक प्रकारा।।&lt;BR&gt;पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं  देखा।।&lt;BR&gt;अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।।&lt;BR&gt;सोइ रघुबर सोइ लछिमनु  सीता। देखि सती अति भई सभीता।।&lt;BR&gt;हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग  माहीं।।&lt;BR&gt;बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि नाइ  राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।&lt;BR&gt;दो0-गई समीप महेस तब हँसि पूछी  कुसलात।&lt;BR&gt;लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।&lt;BR&gt;मासपारायण, दूसरा  विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।&lt;BR&gt;कछु  न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।।&lt;BR&gt;जो तुम्ह कहा सो मृषा न  होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।।&lt;BR&gt;तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित  सब जाना।।&lt;BR&gt;बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।।&lt;BR&gt;हरि  इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।।&lt;BR&gt;सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर  भयउ बिषाद बिसेषा।।&lt;BR&gt;जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ  अनीती।।&lt;BR&gt;दो0-परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।&lt;BR&gt;प्रगटि न कहत महेसु कछु  हृदयँ अधिक संतापु।।56।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु  हृदयँ अस आवा।।&lt;BR&gt;एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन  माहीं।।&lt;BR&gt;अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।।&lt;BR&gt;चलत गगन भै गिरा  सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।&lt;BR&gt;अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ  भगवाना।।&lt;BR&gt;सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।।&lt;BR&gt;कीन्ह कवन पन  कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।।&lt;BR&gt;जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ  त्रिपुर आराती।।&lt;BR&gt;दो0-सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।&lt;BR&gt;कीन्ह कपटु मैं  संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57क।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता  अमित जाइ नहि बरनी।।&lt;BR&gt;कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर  अपराधा।।&lt;BR&gt;संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।&lt;BR&gt;निज अघ  समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।&lt;BR&gt;सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं  कथा सुंदर सुख हेतू।।&lt;BR&gt;बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।।&lt;BR&gt;तहँ  पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।।&lt;BR&gt;संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि  समाधि अखंड अपारा।।&lt;BR&gt;दो0-सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।&lt;BR&gt;मरमु न कोऊ  जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ  दुख सागर पारा।।&lt;BR&gt;मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि  जाना।।&lt;BR&gt;सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।।&lt;BR&gt;अब बिधि अस  बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।।&lt;BR&gt;कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ  रामाहि सुमिर सयानी।।&lt;BR&gt;जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा।।&lt;BR&gt;तौ  मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।।&lt;BR&gt;जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन  क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।&lt;BR&gt;दो0- तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।&lt;BR&gt;होइ  मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।&lt;BR&gt;सो0-जलु पय सरिस बिकाइ देखहु  प्रीति कि रीति भलि।&lt;BR&gt;बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57ख।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि  बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।।&lt;BR&gt;बीतें संबत सहस सतासी। तजी  समाधि संभु अबिनासी।।&lt;BR&gt;राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।।&lt;BR&gt;जाइ  संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।।&lt;BR&gt;लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ  प्रजेस भए तेहि काला।।&lt;BR&gt;देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति  नायक।।&lt;BR&gt;बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।।&lt;BR&gt;नहिं कोउ अस जनमा  जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।&lt;BR&gt;दो0- दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़  जाग।&lt;BR&gt;नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।&lt;BR&gt;बिष्नु बिरंचि महेसु  बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।।&lt;BR&gt;सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि  नाना।।&lt;BR&gt;सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।।&lt;BR&gt;पूछेउ तब  सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी।।&lt;BR&gt;जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ  दिन जाइ रहौं मिस एहीं।।&lt;BR&gt;पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध  बिचारी।।&lt;BR&gt;बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।&lt;BR&gt;दो0-पिता भवन उत्सव  परम जौं प्रभु आयसु होइ।&lt;BR&gt;तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन  सोइ।।61।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत  पठावा।।&lt;BR&gt;दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।।&lt;BR&gt;ब्रह्मसभाँ हम  सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।।&lt;BR&gt;जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न  सीलु सनेहु न कानी।।&lt;BR&gt;जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न  सँदेहा।।&lt;BR&gt;तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।।&lt;BR&gt;भाँति अनेक संभु  समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।।&lt;BR&gt;कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि  बात हमारे भाएँ।।&lt;BR&gt;दो0-कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।&lt;BR&gt;दिए मुख्य गन  संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास  काहुँ न सनमानी।।&lt;BR&gt;सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत  मुसुकाता।।&lt;BR&gt;दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।।&lt;BR&gt;सतीं जाइ  देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।।&lt;BR&gt;तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु  अपमानु समुझि उर दहेऊ।।&lt;BR&gt;पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा  परितापा।।&lt;BR&gt;जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।।&lt;BR&gt;समुझि सो  सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।&lt;BR&gt;दो0-सिव अपमानु न जाइ सहि  हृदयँ न होइ प्रबोध।&lt;BR&gt;सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन  सक्रोध।।63।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर  निंदा।।&lt;BR&gt;सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।।&lt;BR&gt;संत संभु  श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।।&lt;BR&gt;काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन  मूदि न त चलिअ पराई।।&lt;BR&gt;जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।।&lt;BR&gt;पिता  मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।।&lt;BR&gt;तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर  धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।।&lt;BR&gt;अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख  हाहाकारा।।&lt;BR&gt;दो0-सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।&lt;BR&gt;जग्य बिधंस बिलोकि  भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप  पठाए।।&lt;BR&gt;जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।।&lt;BR&gt;भे  जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।।&lt;BR&gt;यह इतिहास सकल जग जानी। ताते  मैं संछेप बखानी।।&lt;BR&gt;सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।।&lt;BR&gt;तेहि  कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।।&lt;BR&gt;जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल  सिद्धि संपति तहँ छाई।।&lt;BR&gt;जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर  दीन्हे।।&lt;BR&gt;दो0-सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। &lt;/P&gt; &lt;P&gt;प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सरिता सब पुनित जलु  बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।&lt;BR&gt;सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल  करहिं अनुरागा।।&lt;BR&gt;सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ।।&lt;BR&gt;नित  नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।।&lt;BR&gt;नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं  गिरि गेह सिधाए।।&lt;BR&gt;सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।।&lt;BR&gt;नारि सहित  मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।।&lt;BR&gt;निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना।  सुता बोलि मेली मुनि चरना।।&lt;BR&gt;दो0-त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र  तुम्हारि।।&lt;BR&gt;कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कह मुनि  बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।&lt;BR&gt;सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम  उमा अंबिका भवानी।।&lt;BR&gt;सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।।&lt;BR&gt;सदा  अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।।&lt;BR&gt;होइहि पूज्य सकल जग माहीं।  एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।।&lt;BR&gt;एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिँ पतिब्रत  असिधारा।।&lt;BR&gt;सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी।।&lt;BR&gt;अगुन  अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।&lt;BR&gt;दो0-जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल  बेष।।&lt;BR&gt;अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि मुनि  गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।&lt;BR&gt;नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक  समुझब बिलगाना।।&lt;BR&gt;सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।।&lt;BR&gt;होइ न  मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।।&lt;BR&gt;उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन  कठिन मन भा संदेहू।।&lt;BR&gt;जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि  जाई।।&lt;BR&gt;झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी।।&lt;BR&gt;उर धरि धीर कहइ  गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।&lt;BR&gt;दो0-कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा  लिलार।&lt;BR&gt;देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तदपि एक मैं कहउँ  उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।।&lt;BR&gt;जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस  संसय नाहीं।।&lt;BR&gt;जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने।।&lt;BR&gt;जौं बिबाहु  संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।।&lt;BR&gt;जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु  तिन्ह कर दोषु न धरहीं।।&lt;BR&gt;भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ  नाहीं।।&lt;BR&gt;सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।।&lt;BR&gt;समरथ कहुँ नहिं  दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।&lt;BR&gt;दो0-जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक  अभिमान।&lt;BR&gt;परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुरसरि जल कृत  बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।&lt;BR&gt;सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस  अनीसहि अंतरु तैसें।।&lt;BR&gt;संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि  कल्याना।।&lt;BR&gt;दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।।&lt;BR&gt;जौं तपु करै  कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।&lt;BR&gt;जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि  कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।।&lt;BR&gt;बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन  रंजन।।&lt;BR&gt;इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।&lt;BR&gt;दो0-अस कहि  नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।&lt;BR&gt;होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु  गिरीस।।70।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस  भयऊ।।&lt;BR&gt;पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।।&lt;BR&gt;जौं घरु बरु  कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा।।&lt;BR&gt;न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा  मम प्रानपिआरी।।&lt;BR&gt;जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु  लोगू।।&lt;BR&gt;सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।।&lt;BR&gt;अस कहि परि  चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।।&lt;BR&gt;बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु  अन्यथा नाहीं।।&lt;BR&gt;दो0-प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।&lt;BR&gt;पारबतिहि  निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान।।71।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ  अस जाइ सिखावन देहू।।&lt;BR&gt;करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहि  कलेसू।।&lt;BR&gt;नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू।।&lt;BR&gt;अस बिचारि तुम्ह  तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका।।&lt;BR&gt;सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि  गिरिजा पाहीं।।&lt;BR&gt;उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।।&lt;BR&gt;बारहिं बार  लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई।।&lt;BR&gt;जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं  मृदु बानी।।&lt;BR&gt;दो0-सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।&lt;BR&gt;सुंदर गौर  सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि।।72।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो  सत्य बिचारी।।&lt;BR&gt;मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।।&lt;BR&gt;तपबल  रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता।।&lt;BR&gt;तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल  सेषु धरइ महिभारा।।&lt;BR&gt;तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ  जानी।।&lt;BR&gt;सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी।।&lt;BR&gt;मातु पितुहि  बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई।।&lt;BR&gt;प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल  मुख आव न बाता।।&lt;BR&gt;दो0-बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।।&lt;BR&gt;पारबती महिमा सुनत  रहे प्रबोधहि पाइ।।73।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु  करना।।&lt;BR&gt;अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।।&lt;BR&gt;नित नव चरन  उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।&lt;BR&gt;संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष  गवाँए।।&lt;BR&gt;कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।।&lt;BR&gt;बेल पाती महि  परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई।।&lt;BR&gt;पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ  अपरना।।&lt;BR&gt;देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।&lt;BR&gt;दो0-भयउ मनोरथ  सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।&lt;BR&gt;परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं  त्रिपुरारि।।74।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि  ग्यानी।।&lt;BR&gt;अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।।&lt;BR&gt;आवै पिता  बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।।&lt;BR&gt;मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा।  जानेहु तब प्रमान बागीसा।।&lt;BR&gt;सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा  हरषानी।।&lt;BR&gt;उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा।।&lt;BR&gt;जब तें सती  जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।।&lt;BR&gt;जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ  सुनहिं राम गुन ग्रामा।।&lt;BR&gt;दो0-चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।&lt;BR&gt;बिचरहिं  महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं  ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।&lt;BR&gt;जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित  सुजाना।।&lt;BR&gt;एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।।&lt;BR&gt;नैमु  प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।।&lt;BR&gt;प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला।  रूप सील निधि तेज बिसाला।।&lt;BR&gt;बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को  निरबाहा।।&lt;BR&gt;बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।।&lt;BR&gt;अति पुनीत  गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।&lt;BR&gt;दो0-अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो  पर निज नेहु।&lt;BR&gt;जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।&lt;BR&gt;सिर धरि आयसु करिअ  तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।&lt;BR&gt;मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार  करिअ सुभ जानी।।&lt;BR&gt;तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ  तुम्हारी।।&lt;BR&gt;प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।।&lt;BR&gt;कह  प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।।&lt;BR&gt;अंतरधान भए अस भाषी। संकर  सोइ मूरति उर राखी।।&lt;BR&gt;तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन  सुहाए।।&lt;BR&gt;दो0-पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।&lt;BR&gt;गिरिहि प्रेरि पठएहु  भवन दूरि करेहु संदेहु।।77।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत  तपस्या जैसी।।&lt;BR&gt;बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।।&lt;BR&gt;केहि  अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।।&lt;BR&gt;कहत बचत मनु अति सकुचाई।  हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।।&lt;BR&gt;मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति  उठावा।।&lt;BR&gt;नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।।&lt;BR&gt;देखहु मुनि  अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।&lt;BR&gt;दो0-सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब  देह।&lt;BR&gt;नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह।।78।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;दच्छसुतन्ह  उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।&lt;BR&gt;चित्रकेतु कर घरु उन घाला।  कनककसिपु कर पुनि अस हाला।।&lt;BR&gt;नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु  भिखारी।।&lt;BR&gt;मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।।&lt;BR&gt;तेहि कें बचन  मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।।&lt;BR&gt;निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल  अगेह दिगंबर ब्याली।।&lt;BR&gt;कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के  बौराएँ।।&lt;BR&gt;पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।&lt;BR&gt;दो0-अब सुख  सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं।&lt;BR&gt;सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि  खटाहिं।।79।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक  बिचारा।।&lt;BR&gt;अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।।&lt;BR&gt;दूषन रहित  सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।।&lt;BR&gt;अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत  बिहसि कह बचन भवानी।।&lt;BR&gt;सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु  देहा।।&lt;BR&gt;कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।।&lt;BR&gt;नारद बचन न मैं  परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।&lt;BR&gt;गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न  सुख सिधि तेही।।&lt;BR&gt;दो0-महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।&lt;BR&gt;जेहि कर मनु रम  जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा।  सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।&lt;BR&gt;अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै  बिचारा।।&lt;BR&gt;जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।।&lt;BR&gt;तौ  कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।।&lt;BR&gt;जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ  संभु न त रहउँ कुआरी।।&lt;BR&gt;तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू।।&lt;BR&gt;मैं  पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।।&lt;BR&gt;देखि प्रेमु बोले मुनि  ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।&lt;BR&gt;दो0-तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु  मातु।&lt;BR&gt;नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जाइ मुनिन्ह  हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।&lt;BR&gt;बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा  उमा कै सकल सुनाई।।&lt;BR&gt;भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।।&lt;BR&gt;मनु  थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।।&lt;BR&gt;तारकु असुर भयउ तेहि काला।  भुज प्रताप बल तेज बिसाला।।&lt;BR&gt;तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति  रीते।।&lt;BR&gt;अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।।&lt;BR&gt;तब बिरंचि सन जाइ  पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।&lt;BR&gt;दो0-सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब  होइ।&lt;BR&gt;संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मोर कहा सुनि करहु  उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।&lt;BR&gt;सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल  गेहा।।&lt;BR&gt;तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।।&lt;BR&gt;जदपि अहइ  असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।।&lt;BR&gt;पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु  संकर मन माहीं।।&lt;BR&gt;तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।।&lt;BR&gt;एहि बिधि  भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।।&lt;BR&gt;अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू।  प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।&lt;BR&gt;दो0-सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह  बिचार।&lt;BR&gt;संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तदपि करब  मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।&lt;BR&gt;पर हित लागि तजइ जो देही। संतत  संत प्रसंसहिं तेही।।&lt;BR&gt;अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित  सहाई।।&lt;BR&gt;चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।&lt;BR&gt;तब आपन प्रभाउ  बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।।&lt;BR&gt;कोपेउ जबहि बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल  श्रुति सेतू।।&lt;BR&gt;ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।।&lt;BR&gt;सदाचार  जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।&lt;BR&gt;छं0-भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट  संजुग महि मुरे।&lt;BR&gt;सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे।।&lt;BR&gt;होनिहार  का करतार को रखवार जग खरभरु परा।&lt;BR&gt;दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु  धरा।।&lt;BR&gt;दो0-जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।&lt;BR&gt;ते निज निज मरजाद तजि भए सकल  बस काम।।84।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु  साखा।।&lt;BR&gt;नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई।।&lt;BR&gt;जहँ असि दसा जड़न्ह  कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।।&lt;BR&gt;पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय  बिसारी।।&lt;BR&gt;मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।&lt;BR&gt;देव दनुज  नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।।&lt;BR&gt;इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम  के चेरे जानी।।&lt;BR&gt;सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।&lt;BR&gt;छं0-भए  कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।&lt;BR&gt;देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत  रहे।।&lt;BR&gt;अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।&lt;BR&gt;दुइ दंड भरि ब्रह्मांड  भीतर कामकृत कौतुक अयं।।&lt;BR&gt;सो0-धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे।&lt;BR&gt;जे राखे  रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।।85।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।&lt;BR&gt;सिवहि बिलोकि ससंकेउ  मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।।&lt;BR&gt;भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ  मतवारे।।&lt;BR&gt;रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।&lt;BR&gt;फिरत लाज कछु  करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।।&lt;BR&gt;प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित  नव तरु राजि बिराजा।।&lt;BR&gt;बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।।&lt;BR&gt;जहँ  तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।&lt;BR&gt;छं0-जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन  सुभगता न परै कही।&lt;BR&gt;सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही।।&lt;BR&gt;बिकसे सरन्हि  बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।&lt;BR&gt;कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं  अपछरा।।&lt;BR&gt;दो0-सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।&lt;BR&gt;चली न अचल समाधि सिव  कोपेउ हृदयनिकेत।।86।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन  माखा।।&lt;BR&gt;सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।&lt;BR&gt;छाड़े बिषम  बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।।&lt;BR&gt;भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल  दिसि देखी।।&lt;BR&gt;सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।&lt;BR&gt;तब सिवँ तीसर  नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।।&lt;BR&gt;हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर  सुखारी।।&lt;BR&gt;समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।&lt;BR&gt;छं0-जोगि अकंटक भए  पति गति सुनत रति मुरुछित भई।&lt;BR&gt;रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं  गई।&lt;BR&gt;अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।&lt;BR&gt;प्रभु आसुतोष कृपाल  सिव अबला निरखि बोले सही।।&lt;BR&gt;दो0-अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।&lt;BR&gt;बिनु  बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।87।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जब जदुबंस कृष्न  अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।&lt;BR&gt;कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न  मोरा।।&lt;BR&gt;रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।।&lt;BR&gt;देवन्ह समाचार सब  पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।।&lt;BR&gt;सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव  कृपानिकेता।।&lt;BR&gt;पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र  अवतंसा।।&lt;BR&gt;बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू।।&lt;BR&gt;कह बिधि तुम्ह  प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।&lt;BR&gt;दो0-सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर  परम उछाहु।&lt;BR&gt;निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;यह  उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन।&lt;BR&gt;कामु जारि रति कहुँ बरु  दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा।।&lt;BR&gt;सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह  कर सहज सुभाऊ।।&lt;BR&gt;पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा।।&lt;BR&gt;सुनि बिधि  बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी।।&lt;BR&gt;तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं।  बरषि सुमन जय जय सुर साई।।&lt;BR&gt;अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन  पठाए।।&lt;BR&gt;प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।&lt;BR&gt;दो0-कहा हमार न  सुनेहु तब नारद कें उपदेस।&lt;BR&gt;अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु  महेस।।89।।&lt;BR&gt;मासपारायण,तीसरा विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित  कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।&lt;BR&gt;तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे  सबिकारा।।&lt;BR&gt;हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।&lt;BR&gt;जौं मैं सिव सेये  अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।&lt;BR&gt;तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य  कृपानिधि ईसा।।&lt;BR&gt;तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु  तुम्हारा।।&lt;BR&gt;तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।&lt;BR&gt;गएँ समीप सो  अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।&lt;BR&gt;दो0-हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति  बिस्वास।।&lt;BR&gt;चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।90।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सबु प्रसंगु  गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।&lt;BR&gt;बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि  हिमवंत बहुत सुखु माना।।&lt;BR&gt;हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए  बोलाई।।&lt;BR&gt;सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई।।&lt;BR&gt;पत्री  सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।&lt;BR&gt;जाइ बिधिहि दीन्हि सो  पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।&lt;BR&gt;लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर  समुदाई।।&lt;BR&gt;सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।&lt;BR&gt;दो0- लगे  सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।&lt;BR&gt;होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा  गान।।91।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।&lt;BR&gt;कुंडल कंकन पहिरे  ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।&lt;BR&gt;ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत  भुजंगा।।&lt;BR&gt;गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।&lt;BR&gt;कर त्रिसूल अरु  डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।&lt;BR&gt;देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर  लायक दुलहिनि जग नाहीं।।&lt;BR&gt;बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले  बराता।।&lt;BR&gt;सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।&lt;BR&gt;दो0-बिष्नु कहा  अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।&lt;BR&gt;बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित  समाज।।92।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।।&lt;BR&gt;बिष्नु  बचन सुनि सुर मुसकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने।।&lt;BR&gt;मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं।  हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।&lt;BR&gt;अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि  सकल गन टेरे।।&lt;BR&gt;सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।&lt;BR&gt;नाना  बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा।।&lt;BR&gt;कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद  कर कोउ बहु पद बाहू।।&lt;BR&gt;बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति  तनखीना।।&lt;BR&gt;छं0-तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।&lt;BR&gt;भूषन कराल कपाल कर  सब सद्य सोनित तन भरें।।&lt;BR&gt;खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।&lt;BR&gt;बहु  जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।&lt;BR&gt;सो0-नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी  भूत सब।&lt;BR&gt;देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि।।93।।&lt;BR&gt;जस दूलहु तसि बनी  बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।&lt;BR&gt;इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं  जाइ बखाना।।&lt;BR&gt;सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।&lt;BR&gt;बन  सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।&lt;BR&gt;कामरूप सुंदर तन धारी। सहित  समाज सहित बर नारी।।&lt;BR&gt;गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित  सनेहा।।&lt;BR&gt;प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।&lt;BR&gt;पुर सोभा  अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।&lt;BR&gt;छं0-लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि  पुर सोभा सही।&lt;BR&gt;बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही।।&lt;BR&gt;मंगल बिपुल तोरन  पताका केतु गृह गृह सोहहीं।।&lt;BR&gt;बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन  मोहहीं।।&lt;BR&gt;दो0-जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।&lt;BR&gt;रिद्धि सिद्धि संपत्ति  सुख नित नूतन अधिकाइ।।94।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा  अधिकाई।।&lt;BR&gt;करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना।।&lt;BR&gt;हियँ हरषे सुर सेन  निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी।।&lt;BR&gt;सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब  भागे।।&lt;BR&gt;धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने।।&lt;BR&gt;गएँ भवन पूछहिं पितु  माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता।।&lt;BR&gt;कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं  बरिआता।।&lt;BR&gt;बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।&lt;BR&gt;छं0-तन छार ब्याल  कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।&lt;BR&gt;सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख  रजनीचरा।।&lt;BR&gt;जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।&lt;BR&gt;देखिहि सो उमा  बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।&lt;BR&gt;दो0-समुझि महेस समाज सब जननि जनक  मुसुकाहिं।&lt;BR&gt;बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं।।95।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;लै  अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।&lt;BR&gt;मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल  गावहिं नारी।।&lt;BR&gt;कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी।।&lt;BR&gt;बिकट बेष  रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।&lt;BR&gt;भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए  महेसु जहाँ जनवासा।।&lt;BR&gt;मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि  गिरीसकुमारी।।&lt;BR&gt;अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी।।&lt;BR&gt;जेहिं बिधि  तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।&lt;BR&gt;छं0- कस कीन्ह बरु बौराह  बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।&lt;BR&gt;जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं  लागई।।&lt;BR&gt;तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।।&lt;BR&gt;घरु जाउ  अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।&lt;BR&gt;दो0-भई बिकल अबला सकल दुखित देखि  गिरिनारि।&lt;BR&gt;करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नारद कर  मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।&lt;BR&gt;अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे  बरहि लगि तपु कीन्हा।।&lt;BR&gt;साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न  जाया।।&lt;BR&gt;पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।।&lt;BR&gt;जननिहि बिकल  बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।&lt;BR&gt;अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ  जो रचइ बिधाता।।&lt;BR&gt;करम लिखा जौ बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।&lt;BR&gt;छं0-जनि लेहु  मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।&lt;BR&gt;दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ  पाउब तहीं।।&lt;BR&gt;सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।।&lt;BR&gt;बहु भाँति बिधिहि  लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं।।&lt;BR&gt;दो0-तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त  समेत।&lt;BR&gt;समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत।।97।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तब नारद सबहि  समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।&lt;BR&gt;मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता  भवानी।।&lt;BR&gt;अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि।।&lt;BR&gt;जग संभव पालन  लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।&lt;BR&gt;जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती  सुंदर तनु पाई।।&lt;BR&gt;तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।&lt;BR&gt;एक  बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।&lt;BR&gt;भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस  बेषु सीय कर लीन्हा।।&lt;BR&gt;छं0-सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।&lt;BR&gt;हर  बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं।।&lt;BR&gt;अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि  दारुन तपु किया।&lt;BR&gt;अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया।।&lt;BR&gt;दो0-सुनि  नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।&lt;BR&gt;छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह  संबाद।।98।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद  बंदे।।&lt;BR&gt;नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने।।&lt;BR&gt;लगे होन पुर  मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना।।&lt;BR&gt;भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु  ब्यवहारा।।&lt;BR&gt;सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।&lt;BR&gt;सादर बोले  सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।&lt;BR&gt;बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन  निपुन सुआरा।।&lt;BR&gt;नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु  बानी।।&lt;BR&gt;छं0-गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।&lt;BR&gt;भोजनु करहिं  सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं।।&lt;BR&gt;जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न  परै कह्यो।&lt;BR&gt;अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो।।&lt;BR&gt;दो0-बहुरि मुनिन्ह  हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।&lt;BR&gt;समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव  बोलाइ।।99।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन  दीन्हे।।&lt;BR&gt;बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी।।&lt;BR&gt;सिंघासनु अति  दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।।&lt;BR&gt;बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ  सुमिरि निज प्रभु रघुराई।।&lt;BR&gt;बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै  आई।।&lt;BR&gt;देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।।&lt;BR&gt;जगदंबिका जानि भव  भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।।&lt;BR&gt;सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन  बखानी।।&lt;BR&gt;छं0-कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।&lt;BR&gt;सकुचहिं कहत श्रुति  सेष सारद मंदमति तुलसी कहा।।&lt;BR&gt;छबिखानि मातु भवानि गवनी मध्य मंडप सिव  जहाँ।।&lt;BR&gt;अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ।।&lt;BR&gt;दो0-मुनि अनुसासन  गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। &lt;/P&gt; &lt;P&gt;कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि।।100।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।&lt;BR&gt;गहि गिरीस कुस कन्या  पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।।&lt;BR&gt;पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल  सुरेसा।।&lt;BR&gt;बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।।&lt;BR&gt;बाजहिं बाजन  बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।।&lt;BR&gt;हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन  भरि रहा उछाहू।।&lt;BR&gt;दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।।&lt;BR&gt;अन्न  कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।&lt;BR&gt;छं0-दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर  जोरि हिमभूधर कह्यो।&lt;BR&gt;का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो।।&lt;BR&gt;सिवँ  कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।&lt;BR&gt;पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम  परिपूरन हियो।।&lt;BR&gt;दो0-नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।&lt;BR&gt;छमेहु सकल अपराध अब  होइ प्रसन्न बरु देहु।।101।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन  सिरु नाई।।&lt;BR&gt;जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।।&lt;BR&gt;करेहु सदा  संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।।&lt;BR&gt;बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर  लीन्हि कुमारी।।&lt;BR&gt;कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु  नाहीं।।&lt;BR&gt;भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि  मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।।&lt;BR&gt;सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी।  जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।&lt;BR&gt;छं0-जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ  दईं।&lt;BR&gt;फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गई।।&lt;BR&gt;जाचक सकल संतोषि  संकरु उमा सहित भवन चले।&lt;BR&gt;सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले।।&lt;BR&gt;दो0-चले  संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।&lt;BR&gt;बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह  बृषकेतु।।102।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।&lt;BR&gt;आदर  दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।।&lt;BR&gt;जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब  निज निज लोक सिधाए।।&lt;BR&gt;जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ  बखानी।।&lt;BR&gt;करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।।&lt;BR&gt;हर गिरिजा  बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।।&lt;BR&gt;तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर  समर जेहिं मारा।।&lt;BR&gt;आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग  जाना।।&lt;BR&gt;छं0-जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।&lt;BR&gt;तेहि हेतु मैं  बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा।।&lt;BR&gt;यह उमा संगु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे  गावहीं।&lt;BR&gt;कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं।।&lt;BR&gt;दो0-चरित सिंधु गिरिजा  रमन बेद न पावहिं पारु।&lt;BR&gt;बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु।।103।।&lt;BR&gt;–*–*–  &lt;/P&gt; &lt;P&gt;संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।।&lt;BR&gt;बहु लालसा कथा पर  बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।।&lt;BR&gt;प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे  मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय  गौरीसा।।&lt;BR&gt;सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।।&lt;BR&gt;बिनु  छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।&lt;BR&gt;सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु  अघ तजी सती असि नारी।।&lt;BR&gt;पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय  भाई।।&lt;BR&gt;दो0-प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।&lt;BR&gt;सुचि सेवक तुम्ह राम  के रहित समस्त बिकार।।104।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब  रघुपति लीला।।&lt;BR&gt;सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।।&lt;BR&gt;राम  चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।।&lt;BR&gt;तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी।  सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।।&lt;BR&gt;सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर  अंतरजामी।।&lt;BR&gt;जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।।&lt;BR&gt;प्रनवउँ  सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।।&lt;BR&gt;परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा  जहाँ सिव उमा निवासू।।&lt;BR&gt;दो0-सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।&lt;BR&gt;बसहिं  तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हरि हर बिमुख धर्म रति  नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।&lt;BR&gt;तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन  सुंदर सब काला।।&lt;BR&gt;त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति  गाया।।&lt;BR&gt;एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।।&lt;BR&gt;निज कर डासि  नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।।&lt;BR&gt;कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब  परिधन मुनिचीरा।।&lt;BR&gt;तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।।&lt;BR&gt;भुजग  भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।&lt;BR&gt;दो0-जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन  नलिन बिसाल।&lt;BR&gt;नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बैठे सोह  कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।।&lt;BR&gt;पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं  मातु भवानी।।&lt;BR&gt;जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।।&lt;BR&gt;बैठीं  सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।।&lt;BR&gt;पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा  बोलीं प्रिय बानी।।&lt;BR&gt;कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह  सैलकुमारी।।&lt;BR&gt;बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।।&lt;BR&gt;चर अरु  अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला  गुन धाम।।&lt;BR&gt;जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जौं मो  पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।&lt;BR&gt;तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना।  कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।।&lt;BR&gt;जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु  सोई।।&lt;BR&gt;ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।&lt;BR&gt;प्रभु जे मुनि  परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।।&lt;BR&gt;सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं  रघुपति गुन गाना।।&lt;BR&gt;तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।।&lt;BR&gt;रामु  सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।&lt;BR&gt;दो0-जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि  नारि बिरहँ मति भोरि।&lt;BR&gt;देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति  मोरि।।108।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि  सोऊ।।&lt;BR&gt;अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।।&lt;BR&gt;मै बन दीखि  राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।।&lt;BR&gt;तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु  भली भाँति हम पावा।।&lt;BR&gt;अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर  जोरें।।&lt;BR&gt;प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।।&lt;BR&gt;तब  कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।।&lt;BR&gt;कहहु पुनीत राम गुन गाथा।  भुजगराज भूषन सुरनाथा।।&lt;BR&gt;दो0-बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।&lt;BR&gt;बरनहु  रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जदपि जोषिता नहिं  अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।&lt;BR&gt;गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी  जहँ पावहिं।।&lt;BR&gt;अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।।&lt;BR&gt;प्रथम सो  कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।।&lt;BR&gt;पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा।  बालचरित पुनि कहहु उदारा।।&lt;BR&gt;कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन  काहीं।।&lt;BR&gt;बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।।&lt;BR&gt;राज बैठि  कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला।।&lt;BR&gt;दो0-बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो  अचरज राम।&lt;BR&gt;प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।110।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पुनि  प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;भगति ग्यान बिग्यान  बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।।&lt;BR&gt;औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल  बिबेका।।&lt;BR&gt;जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।।&lt;BR&gt;तुम्ह  त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।&lt;BR&gt;प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल  बिहीन सुनि सिव मन भाई।।&lt;BR&gt;हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल  छाए।।&lt;BR&gt;श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।&lt;BR&gt;दो0-मगन ध्यानरस दंड  जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।&lt;BR&gt;रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै  लीन्ह।।111।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु  पहिचानें।।&lt;BR&gt;जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।।&lt;BR&gt;बंदउँ बालरूप  सोई रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।।&lt;BR&gt;मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ  अजिर बिहारी।।&lt;BR&gt;करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी।।&lt;BR&gt;धन्य  धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी।।&lt;BR&gt;पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा।  सकल लोक जग पावनि गंगा।।&lt;BR&gt;तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित  लागी।।&lt;BR&gt;दो0-रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।&lt;BR&gt;सोक मोह संदेह भ्रम मम  बिचार कछु नाहिं।।112।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित  होई।।&lt;BR&gt;जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना।।&lt;BR&gt;नयनन्हि संत  दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा।।&lt;BR&gt;ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि  गुर पद मूला।।&lt;BR&gt;जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।।&lt;BR&gt;जो  नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।&lt;BR&gt;कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती।  सुनि हरिचरित न जो हरषाती।।&lt;BR&gt;गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज  बिमोहनसीला।।&lt;BR&gt;दो0-रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।&lt;BR&gt;सतसमाज सुरलोक सब को न  सुनै अस जानि।।113।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।।&lt;BR&gt;रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर  सुनु गिरिराजकुमारी।।&lt;BR&gt;राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति  गाए।।&lt;BR&gt;जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना।।&lt;BR&gt;तदपि जथा श्रुत जसि मति  मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।।&lt;BR&gt;उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत  मोहि भाई।।&lt;BR&gt;एक बात नहि मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।।&lt;BR&gt;तुम जो कहा  राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।&lt;BR&gt;दो0-कहहि सुनहि अस अधम नर  ग्रसे जे मोह पिसाच।&lt;BR&gt;पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न  साच।।114।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।।&lt;BR&gt;लंपट  कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।&lt;BR&gt;कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह  कें सूझ लाभु नहिं हानी।।&lt;BR&gt;मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि  दीना।।&lt;BR&gt;जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।&lt;BR&gt;हरिमाया बस  जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।&lt;BR&gt;बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं  बोलहिं बचन बिचारे।।&lt;BR&gt;जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन् कर कहा करिअ नहिं  काना।।&lt;BR&gt;सो0-अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।&lt;BR&gt;सुनु गिरिराज कुमारि  भ्रम तम रबि कर बचन मम।।115।।&lt;BR&gt;सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान  बुध बेदा।।&lt;BR&gt;अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।&lt;BR&gt;जो गुन रहित  सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें।।&lt;BR&gt;जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि  किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।।&lt;BR&gt;राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा  लवलेसा।।&lt;BR&gt;सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना।।&lt;BR&gt;हरष बिषाद  ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।&lt;BR&gt;राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द  परेस पुराना।।&lt;BR&gt;दो0-पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।।&lt;BR&gt;रघुकुलमनि  मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ।।116।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;निज भ्रम नहिं समुझहिं  अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।&lt;BR&gt;जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ मानु  कहहिं कुबिचारी।।&lt;BR&gt;चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के  भाएँ।।&lt;BR&gt;उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।&lt;BR&gt;बिषय करन सुर जीव  समेता। सकल एक तें एक सचेता।।&lt;BR&gt;सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति  सोई।।&lt;BR&gt;जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।।&lt;BR&gt;जासु सत्यता तें  जड माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।&lt;BR&gt;दो0-रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर  बारि।&lt;BR&gt;जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि बिधि  जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।&lt;BR&gt;जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु  जागें न दूरि दुख होई।।&lt;BR&gt;जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल  रघुराई।।&lt;BR&gt;आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।&lt;BR&gt;बिनु पद चलइ  सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।&lt;BR&gt;आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी  बकता बड़ जोगी।।&lt;BR&gt;तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास  असेषा।।&lt;BR&gt;असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।&lt;BR&gt;दो0-जेहि इमि  गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।।&lt;BR&gt;सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति  भगवान।।118।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।&lt;BR&gt;सोइ  प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।&lt;BR&gt;बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम  अनेक रचित अघ दहहीं।।&lt;BR&gt;सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव  तरहीं।।&lt;BR&gt;राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।।&lt;BR&gt;अस संसय आनत उर  माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।&lt;BR&gt;सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब  कुतरक कै रचना।।&lt;BR&gt;भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना  बीती।।&lt;BR&gt;दो0-पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।&lt;BR&gt;बोली गिरिजा बचन बर  मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह  सरदातप भारी।।&lt;BR&gt;तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।।&lt;BR&gt;नाथ  कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।&lt;BR&gt;अब मोहि आपनि किंकरि जानी।  जदपि सहज जड नारि अयानी।।&lt;BR&gt;प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु  अहहू।।&lt;BR&gt;राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।&lt;BR&gt;नाथ धरेउ नरतनु  केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।&lt;BR&gt;उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर  प्रीति पुनीता।।&lt;BR&gt;दो0-हिँयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान&lt;BR&gt;बहु बिधि उमहि  प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।&lt;BR&gt;नवान्हपारायन,पहला विश्राम&lt;BR&gt;मासपारायण,  चौथा विश्राम&lt;BR&gt;सो0-सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।&lt;BR&gt;कहा भुसुंडि बखानि  सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।।&lt;BR&gt;सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।&lt;BR&gt;सुनहु  राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।।&lt;BR&gt;हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित  अमित।&lt;BR&gt;मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनु गिरिजा  हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।&lt;BR&gt;हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि  जाइ न सोई।।&lt;BR&gt;राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।।&lt;BR&gt;तदपि संत  मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।&lt;BR&gt;तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही।  समुझि परइ जस कारन मोही।।&lt;BR&gt;जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम  अभिमानी।।&lt;BR&gt;करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।&lt;BR&gt;तब तब  प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।&lt;BR&gt;दो0-असुर मारि थापहिं सुरन्ह  राखहिं निज श्रुति सेतु।&lt;BR&gt;जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर  हेतु।।121।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु  धरहीं।।&lt;BR&gt;राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।।&lt;BR&gt;जनम एक दुइ कहउँ  बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।।&lt;BR&gt;द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान  सब कोऊ।।&lt;BR&gt;बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।।&lt;BR&gt;कनककसिपु अरु  हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।।&lt;BR&gt;बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक  निपाता।।&lt;BR&gt;होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।&lt;BR&gt;दो0-भए  निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।&lt;BR&gt;कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122  ।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।&lt;BR&gt;एक बार  तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।।&lt;BR&gt;कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ  कौसल्या बिख्याता।।&lt;BR&gt;एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।।&lt;BR&gt;एक  कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।।&lt;BR&gt;संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज  महाबल मरइ न मारा।।&lt;BR&gt;परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं  पुरारी।।&lt;BR&gt;दो0-छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।।&lt;BR&gt;जब तेहि जानेउ  मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना।  कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।&lt;BR&gt;तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।।&lt;BR&gt;एक  जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।।&lt;BR&gt;प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु  मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।।&lt;BR&gt;नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि  अवतारा।।&lt;BR&gt;गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।।&lt;BR&gt;कारन कवन  श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।।&lt;BR&gt;यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि  मन मोह आचरज भारी।।&lt;BR&gt;दो0- बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।&lt;BR&gt;जेहि जस  रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।।&lt;BR&gt;सो0-कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर  सुनहु।&lt;BR&gt;भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हिमगिरि गुहा  एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।&lt;BR&gt;आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि  मन अति भावा।।&lt;BR&gt;निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।।&lt;BR&gt;सुमिरत  हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।।&lt;BR&gt;मुनि गति देखि सुरेस डेराना।  कामहि बोलि कीन्ह समाना।।&lt;BR&gt;सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ  जलचरकेतू।।&lt;BR&gt;सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।।&lt;BR&gt;जे कामी  लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।&lt;BR&gt;दो0-सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि  मृगराज।&lt;BR&gt;छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तेहि  आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।&lt;BR&gt;कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा।  कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।।&lt;BR&gt;चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु  बढ़ावनिहारी।।&lt;BR&gt;रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।।&lt;BR&gt;करहिं गान बहु  तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।।&lt;BR&gt;देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि  प्रपंच बिधि नाना।।&lt;BR&gt;काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव  पापी।।&lt;BR&gt;सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।&lt;BR&gt;दो0- सहित सहाय  सभीत अति मानि हारि मन मैन।&lt;BR&gt;गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत  बैन।।126।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम  परितोषा।।&lt;BR&gt;नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।।&lt;BR&gt;मुनि सुसीलता आपनि  करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।।&lt;BR&gt;सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि  हरिहि सिरु नावा।।&lt;BR&gt;तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।।&lt;BR&gt;मार  चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।&lt;BR&gt;बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं।  जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।।&lt;BR&gt;तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग  दुराएडु तबहूँ।।&lt;BR&gt;दो0-संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।&lt;BR&gt;भारद्वाज कौतुक  सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस  नहिं कोई।।&lt;BR&gt;संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।।&lt;BR&gt;एक बार करतल  बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।।&lt;BR&gt;छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास  श्रुतिमाथा।।&lt;BR&gt;हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।।&lt;BR&gt;बोले बिहसि  चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।&lt;BR&gt;काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम  बरजि सिवँ राखे।।&lt;BR&gt;अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग  जाया।।&lt;BR&gt;दो0-रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ।&lt;BR&gt;तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं  मोह मार मद मान।।128।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय  नहिं जाके।।&lt;BR&gt;ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।।&lt;BR&gt;नारद  कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।&lt;BR&gt;करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर  अंकुरेउ गरब तरु भारी।।&lt;BR&gt;बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक  हितकारी।।&lt;BR&gt;मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।।&lt;BR&gt;तब नारद हरि पद  सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।।&lt;BR&gt;श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन  करनी तेहि केरी।।&lt;BR&gt;दो0-बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन  बिस्तार।&lt;BR&gt;श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बसहिं नगर  सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।&lt;BR&gt;तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित  हय गय सेन समाजा।।&lt;BR&gt;सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति  निवासा।।&lt;BR&gt;बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।।&lt;BR&gt;सोइ हरिमाया  सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।।&lt;BR&gt;करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित  महिपाला।।&lt;BR&gt;मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।।&lt;BR&gt;सुनि सब चरित  भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।&lt;BR&gt;दो0-आनि देखाई नारदहि भूपति  राजकुमारि।&lt;BR&gt;कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखि  रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।&lt;BR&gt;लच्छन तासु बिलोकि भुलाने।  हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।&lt;BR&gt;जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न  कोई।।&lt;BR&gt;सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।।&lt;BR&gt;लच्छन सब बिचारि उर  राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।।&lt;BR&gt;सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन  माहीं।।&lt;BR&gt;करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।&lt;BR&gt;जप तप कछु न  होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।&lt;BR&gt;दो0-एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप  बिसाल।&lt;BR&gt;जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हरि सन मागौं  सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।।&lt;BR&gt;मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय  सोइ होऊ।।&lt;BR&gt;बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी  कृपाला।।&lt;BR&gt;प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने।।&lt;BR&gt;अति आरति  कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।।&lt;BR&gt;आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति  नहिं पावौं ओही।।&lt;BR&gt;जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं  तोरा।।&lt;BR&gt;निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।&lt;BR&gt;दो0-जेहि बिधि  होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।&lt;BR&gt;सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा  हमार।।132।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि  जोगी।।&lt;BR&gt;एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।।&lt;BR&gt;माया बिबस  भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।।&lt;BR&gt;गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ  स्वयंबर भूमि बनाई।।&lt;BR&gt;निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।।&lt;BR&gt;मुनि  मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।।&lt;BR&gt;मुनि हित कारन  कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।&lt;BR&gt;सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि  सबहिं सिर नावा।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;दो0-रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।&lt;BR&gt;बिप्रबेष देखत फिरहिं परम  कौतुकी तेउ।।133।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति  अधिकाई।।&lt;BR&gt;तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।&lt;BR&gt;करहिं कूटि नारदहि  सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।।&lt;BR&gt;रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि  जानि बिसेषी।।&lt;BR&gt;मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।&lt;BR&gt;जदपि  सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।।&lt;BR&gt;काहुँ न लखा सो चरित  बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।।&lt;BR&gt;मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा  तेही।।&lt;BR&gt;दो0-सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।&lt;BR&gt;देखत फिरइ महीप सब कर  सरोज जयमाल।।134।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी  भूली।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं।।&lt;BR&gt;धरि  नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।।&lt;BR&gt;दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा।  नृपसमाज सब भयउ निरासा।।&lt;BR&gt;मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु  गाँठी।।&lt;BR&gt;तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।&lt;BR&gt;अस कहि दोउ भागे  भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।।&lt;BR&gt;बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप  दीन्ह अति गाढ़ा।।&lt;BR&gt;दो0-होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।&lt;BR&gt;हँसेहु हमहि सो  लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि  हृदयँ संतोष न आवा।।&lt;BR&gt;फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं।।&lt;BR&gt;देहउँ  श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई।।&lt;BR&gt;बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा  सोइ राजकुमारी।।&lt;BR&gt;बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।।&lt;BR&gt;सुनत  बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।।&lt;BR&gt;पर संपदा सकहु नहिं देखी।  तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।।&lt;BR&gt;मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान  करायहु।।&lt;BR&gt;दो0-असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।&lt;BR&gt;स्वारथ साधक कुटिल  तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि  करहु तुम्ह सोई।।&lt;BR&gt;भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु  धरहू।।&lt;BR&gt;डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।।&lt;BR&gt;करम सुभासुभ  तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।।&lt;BR&gt;भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे  फल आपन कीन्हा।।&lt;BR&gt;बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।&lt;BR&gt;कपि  आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।&lt;BR&gt;मम अपकार कीन्ही तुम्ह  भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।&lt;BR&gt;दो0-श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु  बिनती कीन्हि।&lt;BR&gt;निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जब  हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।&lt;BR&gt;तब मुनि अति सभीत हरि चरना।  गहे पाहि प्रनतारति हरना।।&lt;BR&gt;मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह  दीनदयाला।।&lt;BR&gt;मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।&lt;BR&gt;जपहु  जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।।&lt;BR&gt;कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें।  असि परतीति तजहु जनि भोरें।।&lt;BR&gt;जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति  हमारी।।&lt;BR&gt;अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।&lt;BR&gt;दो0-बहुबिधि  मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।&lt;BR&gt;सत्यलोक नारद चले करत राम गुन  गान।।138।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।&lt;BR&gt;अति  सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।।&lt;BR&gt;हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध  कीन्ह फल पाया।।&lt;BR&gt;श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।।&lt;BR&gt;निसिचर जाइ  होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ।।&lt;BR&gt;भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं  बिष्नु मनुज तनु तहिआ।&lt;BR&gt;समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि  संसारा।।&lt;BR&gt;चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।&lt;BR&gt;दो0-एक कलप एहि  हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।&lt;BR&gt;सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि  भार।।139।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र  घनेरे।।&lt;BR&gt;कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं।।&lt;BR&gt;तब तब कथा  मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।।&lt;BR&gt;बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि  आचरजु सयाने।।&lt;BR&gt;हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब  संता।।&lt;BR&gt;रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।।&lt;BR&gt;यह प्रसंग मैं  कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।।सेवत  सुलभ सकल दुख हारी।।&lt;BR&gt;सो0-सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।।&lt;BR&gt;अस  बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।।&lt;BR&gt;अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ  बिचित्र कथा बिस्तारी।।&lt;BR&gt;जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर  भूपा।।&lt;BR&gt;जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।।&lt;BR&gt;जासु चरित  अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।।&lt;BR&gt;अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित  सुनु भ्रम रुज हारी।।&lt;BR&gt;लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति  अनुसारा।।&lt;BR&gt;भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।।&lt;BR&gt;लगे बहुरि  बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।&lt;BR&gt;दो0-सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु  मुनीस मन लाई।।&lt;BR&gt;राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि  सुहाइ।।141।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि  अनूपा।।&lt;BR&gt;दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।।&lt;BR&gt;नृप  उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।।&lt;BR&gt;लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत  ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही।।&lt;BR&gt;देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै  प्रिय नारी।।&lt;BR&gt;आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।।&lt;BR&gt;सांख्य  सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना।।&lt;BR&gt;तेहिं मनु राज कीन्ह बहु  काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।&lt;BR&gt;सो0-होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा  चौथपन।&lt;BR&gt;हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।&lt;BR&gt;बरबस राज सुतहि तब  दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।।&lt;BR&gt;तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि  दाता।।&lt;BR&gt;बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।।&lt;BR&gt;पंथ जात  सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।।&lt;BR&gt;पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि  नहाने निरमल नीरा।।&lt;BR&gt;आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि  जानी।।&lt;BR&gt;जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।।&lt;BR&gt;कृस सरीर मुनिपट  परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना ।&lt;BR&gt;दो0-द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित  अनुराग।&lt;BR&gt;बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;करहिं अहार साक  फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।&lt;BR&gt;पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार  मूल फल त्यागे।।&lt;BR&gt;उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।।&lt;BR&gt;अगुन अखंड  अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।&lt;BR&gt;नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद  निरुपाधि अनूपा।।&lt;BR&gt;संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें  नाना।।&lt;BR&gt;ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।&lt;BR&gt;जौं यह बचन सत्य  श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।&lt;BR&gt;दो0-एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि  आहार।&lt;BR&gt;संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।144।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बरष सहस दस  त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।&lt;BR&gt;बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु  बारा।।&lt;BR&gt;मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।।&lt;BR&gt;अस्थिमात्र होइ  रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।।&lt;BR&gt;प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य  तापस नृप रानी।।&lt;BR&gt;मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।।&lt;BR&gt;मृतक  जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई।।&lt;BR&gt;ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ  अबहिं भवन ते आए।।&lt;BR&gt;दो0-श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।&lt;BR&gt;बोले मनु  करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि  हरि हर बंदित पद रेनू।।&lt;BR&gt;सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।।&lt;BR&gt;जौं  अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।।&lt;BR&gt;जो सरूप बस सिव मन माहीं।  जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।।&lt;BR&gt;जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम  प्रसंसा।।&lt;BR&gt;देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।।&lt;BR&gt;दंपति बचन  परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।।&lt;BR&gt;भगत बछल प्रभु कृपानिधाना।  बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।&lt;BR&gt;दो0-नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।&lt;BR&gt;लाजहिं तन  सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम।।146।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल  चिबुक दर ग्रीवा।।&lt;BR&gt;अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा।।&lt;BR&gt;नव  अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की।।&lt;BR&gt;भुकुटि मनोज चाप छबि हारी।  तिलक ललाट पटल दुतिकारी।।&lt;BR&gt;कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप  समाजा।।&lt;BR&gt;उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला।।&lt;BR&gt;केहरि कंधर चारु  जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ।।&lt;BR&gt;करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर  कोदंडा।।&lt;BR&gt;दो0-तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।।&lt;BR&gt;नाभि मनोहर लेति जनु  जमुन भवँर छबि छीनि।।147।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप  बसहिं जेन्ह माहीं।।&lt;BR&gt;बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला।।&lt;BR&gt;जासु  अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।।&lt;BR&gt;भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम  बाम दिसि सीता सोई।।&lt;BR&gt;छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट  रोकी।।&lt;BR&gt;चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।&lt;BR&gt;हरष बिबस तन  दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी।।&lt;BR&gt;सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए  करुनापुंजा।।&lt;BR&gt;दो0-बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।&lt;BR&gt;मागहु बर जोइ  भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि  धीरजु बोली मृदु बानी।।&lt;BR&gt;नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।।&lt;BR&gt;एक  लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।।&lt;BR&gt;तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं।  अगम लाग मोहि निज कृपनाईं।।&lt;BR&gt;जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत  सकुचाई।।&lt;BR&gt;तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।।&lt;BR&gt;सो तुम्ह जानहु  अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।।&lt;BR&gt;सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय  कछु तोही।।&lt;BR&gt;दो0-दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।&lt;BR&gt;चाहउँ तुम्हहि समान  सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु  करुनानिधि बोले।।&lt;BR&gt;आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।।&lt;BR&gt;सतरूपहि  बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे।।&lt;BR&gt;जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ  कृपाल मोहि अति प्रिय लागा।।&lt;BR&gt;प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि  सोहाई।।&lt;BR&gt;तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी।।&lt;BR&gt;अस समुझत  मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।&lt;BR&gt;जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख  पावहिं जो गति लहहीं।।&lt;BR&gt;दो0-सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।।&lt;BR&gt;सोइ  बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनु मृदु गूढ़ रुचिर  बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।&lt;BR&gt;जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो  दीन्ह सब संसय नाहीं।।&lt;BR&gt;मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें  ।&lt;BR&gt;बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी।।&lt;BR&gt;सुत बिषइक तव पद रति  होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।।&lt;BR&gt;मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि  तुम्हहि अधीना।।&lt;BR&gt;अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ।।&lt;BR&gt;अब  तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।।&lt;BR&gt;सो0-तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ  कछु काल पुनि।&lt;BR&gt;होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।।&lt;BR&gt;इच्छामय नरबेष  सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।&lt;BR&gt;अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित  भगत सुखदाता।।&lt;BR&gt;जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी।।&lt;BR&gt;आदिसक्ति  जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।।&lt;BR&gt;पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य  सत्य पन सत्य हमारा।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए  भगवाना।।&lt;BR&gt;दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।।&lt;BR&gt;समय पाइ तनु  तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।।&lt;BR&gt;दो0-यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही  बृषकेतु।&lt;BR&gt;भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।।152।।&lt;BR&gt;मासपारायण,पाँचवाँ  विश्राम&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।।&lt;BR&gt;बिस्व बिदित एक  कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू।।&lt;BR&gt;धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील  बलवाना।।&lt;BR&gt;तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही।।&lt;BR&gt;अपर सुतहि अरिमर्दन नामा।  भुजबल अतुल अचल संग्रामा।।&lt;BR&gt;भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित  प्रीती।।&lt;BR&gt;जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा।।&lt;BR&gt;दो0-जब  प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।&lt;BR&gt;प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ  लेस।।153।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।&lt;BR&gt;सचिव  सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा।।&lt;BR&gt;सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब  समर जुझारा।।&lt;BR&gt;सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।।&lt;BR&gt;बिजय हेतु कटकई  बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।।&lt;BR&gt;जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप  बरिआई।।&lt;BR&gt;सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें।।&lt;BR&gt;सकल अवनि  मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला।।&lt;BR&gt;दो0-स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर  कीन्ह प्रबेसु।&lt;BR&gt;अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भूप  प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।&lt;BR&gt;सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील  सुंदर नर नारी।।&lt;BR&gt;सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित  नीती।।&lt;BR&gt;गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।।&lt;BR&gt;भूप धरम जे बेद  बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।।&lt;BR&gt;दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र  बर बेद पुराना।।&lt;BR&gt;नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।।&lt;BR&gt;बिप्रभवन  सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।।&lt;BR&gt;दो0-जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब  जाग।&lt;BR&gt;बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग।।155।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;हृदयँ न कछु  फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।।&lt;BR&gt;करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित  नृप ग्यानी।।&lt;BR&gt;चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा।।&lt;BR&gt;बिंध्याचल  गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ।।&lt;BR&gt;फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ  ससिहि ग्रसि राहू।।&lt;BR&gt;बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत  नाहीं।।&lt;BR&gt;कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई।।&lt;BR&gt;घुरुघुरात हय आरौ  पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ।।&lt;BR&gt;दो0-नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।&lt;BR&gt;चपरि  चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;आवत देखि अधिक रव बाजी।  चलेउ बराह मरुत गति भाजी।।&lt;BR&gt;तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत  बाना।।&lt;BR&gt;तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।।&lt;BR&gt;प्रगटत दुरत जाइ  मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।।&lt;BR&gt;गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि  निबाहू।।&lt;BR&gt;अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।।&lt;BR&gt;कोल बिलोकि भूप  बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा।।&lt;BR&gt;अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ  भुलाई।।&lt;BR&gt;दो0-खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।&lt;BR&gt;खोजत ब्याकुल सरित सर  जल बिनु भयउ अचेत।।157।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट  मुनिबेषा।।&lt;BR&gt;जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।।&lt;BR&gt;समय प्रतापभानु  कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।।&lt;BR&gt;गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप  अभिमानी।।&lt;BR&gt;रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा।।&lt;BR&gt;तासु समीप  गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा।।&lt;BR&gt;राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि  सुबेष महामुनि जाना।।&lt;BR&gt;उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज  नामा।।&lt;BR&gt;दो0 भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।&lt;BR&gt;मज्जन पान समेत हय  कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै  गयऊ।।&lt;BR&gt;आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।।&lt;BR&gt;को तुम्ह कस बन  फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें।।&lt;BR&gt;चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया  लागि अति मोरें।।&lt;BR&gt;नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।।&lt;BR&gt;फिरत  अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई।।&lt;BR&gt;हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत  हौं कछु भल होनिहारा।।&lt;BR&gt;कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु  तुम्हारा।।&lt;BR&gt;दो0- निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।&lt;BR&gt;बसहु आजु अस जानि  तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।।&lt;BR&gt;तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।&lt;BR&gt;आपुनु  आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा।  बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।&lt;BR&gt;नृप बहु भाति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य  सराही।।&lt;BR&gt;पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।।&lt;BR&gt;मोहि मुनिस  सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।।&lt;BR&gt;तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप  सुह्रद सो कपट सयाना।।&lt;BR&gt;बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज  काजा।।&lt;BR&gt;समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।।&lt;BR&gt;सरल बचन नृप के  सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;दो0-कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।&lt;BR&gt;नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित  निकेति।।160।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित  अभिमाना।।&lt;BR&gt;सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।।&lt;BR&gt;तेहि तें कहहि  संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।।&lt;BR&gt;तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत  बिरंचि सिवहि संदेहा।।&lt;BR&gt;जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब  स्वामी।।&lt;BR&gt;सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।।&lt;BR&gt;सब प्रकार  राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।।&lt;BR&gt;सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते  बहु काला।।&lt;BR&gt;दो0-अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।&lt;BR&gt;लोकमान्यता अनल  सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।।&lt;BR&gt;सो0-तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर  नर।&lt;BR&gt;सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तातें गुपुत  रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।&lt;BR&gt;प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु  कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।&lt;BR&gt;तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि  पर तोरें।।&lt;BR&gt;अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।&lt;BR&gt;जिमि जिमि  तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।&lt;BR&gt;देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब  बोला तापस बगध्यानी।।&lt;BR&gt;नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु  नाई।।&lt;BR&gt;कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।&lt;BR&gt;दो0-आदिसृष्टि उपजी  जबहिं तब उतपति भै मोरि।&lt;BR&gt;नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी  बहोरि।।162।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु  नाहीं।।&lt;BR&gt;तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।।&lt;BR&gt;तपबल संभु  करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।।&lt;BR&gt;भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा  पुरातन कहै सो लागा।।&lt;BR&gt;करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।।&lt;BR&gt;उदभव  पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।।&lt;BR&gt;सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत  तब लयऊ।।&lt;BR&gt;कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।&lt;BR&gt;सो0-सुनु महीस  असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।&lt;BR&gt;मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि  तव।।163।।&lt;BR&gt;नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।।&lt;BR&gt;गुर प्रसाद  सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।।&lt;BR&gt;देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति  नीति निपुनाई।।&lt;BR&gt;उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।।&lt;BR&gt;अब  प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।।&lt;BR&gt;सुनि सुबचन भूपति हरषाना।  गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।।&lt;BR&gt;कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल  मोरें।।&lt;BR&gt;प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।&lt;BR&gt;दो0-जरा मरन  दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।&lt;BR&gt;एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत  होउ।।164।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।।&lt;BR&gt;कालउ तुअ  पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।।&lt;BR&gt;तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न  कोउ रखवारा।।&lt;BR&gt;जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।।&lt;BR&gt;चल  न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।।&lt;BR&gt;बिप्र श्राप बिनु सुनु  महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।।&lt;BR&gt;हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब  नासू।।&lt;BR&gt;तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।&lt;BR&gt;दो0-एवमस्तु  कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।&lt;BR&gt;मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न  खोरि।।165।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।।&lt;BR&gt;यह प्रगटें अथवा  द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।।&lt;BR&gt;आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर  कोपहिं मन माहीं।।&lt;BR&gt;सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को  राखा।।&lt;BR&gt;राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।।&lt;BR&gt;जौं न चलब  हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।।&lt;BR&gt;एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु  महिदेव श्राप अति घोरा।।&lt;BR&gt;दो0-होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि  सोउ।&lt;BR&gt;तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ।।166।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनु नृप  बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।&lt;BR&gt;अहइ एक अति सुगम उपाई।  तहाँ परंतु एक कठिनाई।।&lt;BR&gt;मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।।&lt;BR&gt;आजु  लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।।&lt;BR&gt;जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना  आइ असमंजस आजू।।&lt;BR&gt;सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।।&lt;BR&gt;बड़े  सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।।&lt;BR&gt;जलधि अगाध मौलि बह फेनू।  संतत धरनि धरत सिर रेनू।।&lt;BR&gt;दो0- अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।&lt;BR&gt;मोहि  लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जानि नृपहि आपन आधीना। बोला  तापस कपट प्रबीना।।&lt;BR&gt;सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु  मोही।।&lt;BR&gt;अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।।&lt;BR&gt;जोग जुगुति तप  मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।।&lt;BR&gt;जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु  मोहि जान न कोई।।&lt;BR&gt;अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।।&lt;BR&gt;पुनि  तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।।&lt;BR&gt;जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत  भरि संकलप करेहू।।&lt;BR&gt;दो0-नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।&lt;BR&gt;मैं तुम्हरे  संकलप लगि दिनहिंûकरिब जेवनार।।168।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें।  होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।।&lt;BR&gt;करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं  बस देवा।।&lt;BR&gt;और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ।।&lt;BR&gt;तुम्हरे उपरोहित  कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।।&lt;BR&gt;तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ  बरष परवाना।।&lt;BR&gt;मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।।&lt;BR&gt;गै  निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।।&lt;BR&gt;मैं तपबल तोहि तुरग  समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता।।&lt;BR&gt;दो0-मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब  मोहि।&lt;BR&gt;जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि।।169।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सयन कीन्ह नृप  आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।&lt;BR&gt;श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच  अधिकाई।।&lt;BR&gt;कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।।&lt;BR&gt;परम मित्र  तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।।&lt;BR&gt;तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय  देव दुखदाई।।&lt;BR&gt;प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।।&lt;BR&gt;तेहिं खल  पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।।&lt;BR&gt;जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ।  भावी बस न जान कछु राऊ।।&lt;BR&gt;दो0-रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।&lt;BR&gt;अजहुँ  देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तापस नृप निज सखहि निहारी।  हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।&lt;BR&gt;मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख  पाई।।&lt;BR&gt;अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।।&lt;BR&gt;परिहरि सोच  रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।।&lt;BR&gt;कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस  मिलब मैं आई।।&lt;BR&gt;तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।।&lt;BR&gt;भानुप्रतापहि  बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।।&lt;BR&gt;नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ  बाँधेसि बाजि बनाई।।&lt;BR&gt;दो0-राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।&lt;BR&gt;लै राखेसि गिरि  खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि।।171।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ  तेहि सेज अनूपा।।&lt;BR&gt;जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना।।&lt;BR&gt;मुनि  महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी।।&lt;BR&gt;कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं।  पुर नर नारि न जानेउ केहीं।।&lt;BR&gt;गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज  बधावा।।&lt;BR&gt;उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा।।&lt;BR&gt;जुग सम नृपहि  गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी।।&lt;BR&gt;समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब  कहि समुझावा।।&lt;BR&gt;दो0-नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।&lt;BR&gt;बरे तुरत सत  सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि  जसि श्रुति गाई।।&lt;BR&gt;मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।।&lt;BR&gt;बिबिध  मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।।&lt;BR&gt;भोजन कहुँ सब बिप्र  बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए।।&lt;BR&gt;परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि  काला।।&lt;BR&gt;बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।।&lt;BR&gt;भयउ रसोईं  भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।।&lt;BR&gt;भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस  आव मुख बानी।।&lt;BR&gt;दो0-बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।&lt;BR&gt;जाइ निसाचर होहु  नृप मूढ़ सहित परिवार।।173।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित  समुदाई।।&lt;BR&gt;ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।।&lt;BR&gt;संबत मध्य नास तव  होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।।&lt;BR&gt;नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर  गिरा अकासा।।&lt;BR&gt;बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु  कीन्हा।।&lt;BR&gt;चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी।।&lt;BR&gt;तहँ न असन नहिं  बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा।।&lt;BR&gt;सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ  अवनीं अकुलाई।।&lt;BR&gt;दो0-भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।&lt;BR&gt;किएँ अन्यथा होइ  नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।174।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार  पुरलोगन्ह पाए।।&lt;BR&gt;सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय  जेहीं।।&lt;BR&gt;उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई।।&lt;BR&gt;तेहिं खल जहँ तहँ  पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए।।&lt;BR&gt;घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित  होई लराई।।&lt;BR&gt;जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।।&lt;BR&gt;सत्यकेतु कुल  कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।।&lt;BR&gt;रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज  पुर गवने जय जसु पाई।।&lt;BR&gt;दो0-भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।&lt;BR&gt;धूरि मेरुसम  जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।।175।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ  निसाचर सहित समाजा।।&lt;BR&gt;दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा।।&lt;BR&gt;भूप  अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा।।&lt;BR&gt;सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ  बिमात्र बंधु लघु तासू।।&lt;BR&gt;नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान  निधाना।।&lt;BR&gt;रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।।&lt;BR&gt;कामरूप खल जिनस  अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।।&lt;BR&gt;कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व  परितापी।।&lt;BR&gt;दो0-उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।&lt;BR&gt;तदपि महीसुर श्राप बस भए  सकल अघरूप।।176।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो  जाई।।&lt;BR&gt;गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।।&lt;BR&gt;हम काहू के मरहिं न  मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।।&lt;BR&gt;एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ  मिलि तेहि बर दीन्हा।।&lt;BR&gt;पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय  भयऊ।।&lt;BR&gt;जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।।&lt;BR&gt;सारद प्रेरि तासु  मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी।।&lt;BR&gt;दो0-गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर  मागु।&lt;BR&gt;तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तिन्हि देइ बर  ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।।&lt;BR&gt;मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि  ललामा।।&lt;BR&gt;सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।।&lt;BR&gt;हरषित भयउ नारि  भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।।&lt;BR&gt;गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि  निर्मित दुर्गम अति भारी।।&lt;BR&gt;सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन  अपारा।।&lt;BR&gt;भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा।।&lt;BR&gt;तिन्ह तें अधिक  रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।&lt;BR&gt;दो0-खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ  दिसि फिरि आव।&lt;BR&gt;कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।।&lt;BR&gt;हरिप्रेरित  जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।&lt;BR&gt;सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस  सोइ।।178(ख)।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर  संघारे।।&lt;BR&gt;अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।।&lt;BR&gt;दसमुख  कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।।&lt;BR&gt;देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव  लै गए पराई।।&lt;BR&gt;फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।।&lt;BR&gt;सुंदर सहज  अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।।&lt;BR&gt;जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल  रजनीचर कीन्हे।।&lt;BR&gt;एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै  आवा।।&lt;BR&gt;दो0-कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।&lt;BR&gt;मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला  बहुत सुख पाइ।।179।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि  बड़ाई।।&lt;BR&gt;नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।&lt;BR&gt;अतिबल कुंभकरन अस  भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।।&lt;BR&gt;करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ  पुर त्रासा।।&lt;BR&gt;जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।।&lt;BR&gt;समर धीर  नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।।&lt;BR&gt;बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ  प्रथम लीक जग जासू।।&lt;BR&gt;जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन  होई।।&lt;BR&gt;दो0-कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।&lt;BR&gt;एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट  निकाय।।180।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।&lt;BR&gt;दसमुख बैठ सभाँ एक  बारा। देखि अमित आपन परिवारा।।&lt;BR&gt;सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर  जाती।।&lt;BR&gt;सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।।&lt;BR&gt;ते सनमुख नहिं करही लराई।  देखि सबल रिपु जाहिं पराई।।&lt;BR&gt;तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब  सोई।।&lt;BR&gt;द्विजभोजन मख होम सराधा।।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।&lt;BR&gt;दो0-छुधा छीन  बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।&lt;BR&gt;तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति  अपनाइ।।181।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।।&lt;BR&gt;तिन्हहि जीति रन आनेसु  बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।।&lt;BR&gt;एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ  गदा कर लीन्ही।।&lt;BR&gt;चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।।&lt;BR&gt;रावन  आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।।&lt;BR&gt;दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल  दसानन पाए।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी।।&lt;BR&gt;रन मद  मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।।&lt;BR&gt;रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि  काल जम सब अधिकारी।।&lt;BR&gt;किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं  लागा।।&lt;BR&gt;ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।।&lt;BR&gt;आयसु करहिं  सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।&lt;BR&gt;दो0-भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न  सुतंत्र।&lt;BR&gt;मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(ख)।।&lt;BR&gt;देव जच्छ गंधर्व नर  किंनर नाग कुमारि।&lt;BR&gt;जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182ख।।&lt;BR&gt;–*–*–  &lt;/P&gt; &lt;P&gt;इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।&lt;BR&gt;प्रथमहिं जिन्ह कहुँ  आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।।&lt;BR&gt;देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर  देव परितापी।।&lt;BR&gt;करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।।&lt;BR&gt;जेहि बिधि  होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।&lt;BR&gt;जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज  पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।&lt;BR&gt;सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू  मान न कोई।।&lt;BR&gt;नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद  पुराना।।&lt;BR&gt;छं0-जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।&lt;BR&gt;आपुनु उठि धावइ  रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।&lt;BR&gt;अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि  काना।&lt;BR&gt;तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।&lt;BR&gt;सो0-बरनि न जाइ  अनीति घोर निसाचर जो करहिं।&lt;BR&gt;हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि  मिति।।183।।&lt;BR&gt;मासपारायण, छठा विश्राम&lt;BR&gt;बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन  परदारा।।&lt;BR&gt;मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।&lt;BR&gt;जिन्ह के  यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।&lt;BR&gt;अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम  सभीत धरा अकुलानी।।&lt;BR&gt;गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक  परद्रोही।।&lt;BR&gt;सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता।।&lt;BR&gt;धेनु रूप धरि  हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।।&lt;BR&gt;निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु  काज न होई।।&lt;BR&gt;छं0-सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।&lt;BR&gt;सँग  गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।।&lt;BR&gt;ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू  न बसाई।&lt;BR&gt;जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।&lt;BR&gt;सो0-धरनि धरहि मन धीर  कह बिरंचि हरिपद सुमिरु।&lt;BR&gt;जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन  बिपति।।184।।&lt;BR&gt;बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।&lt;BR&gt;पुर  बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।&lt;BR&gt;जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति।  प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।।&lt;BR&gt;तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक  कहेऊँ।।&lt;BR&gt;हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।&lt;BR&gt;देस काल  दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।&lt;BR&gt;अग जगमय सब रहित बिरागी।  प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।&lt;BR&gt;मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म  बखाना।।&lt;BR&gt;दो0-सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।&lt;BR&gt;अस्तुति करत जोरि कर  सावधान मतिधीर।।185।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;छं0-जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल  भगवंता।&lt;BR&gt;गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।&lt;BR&gt;जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ  अनुग्रह सोई।।&lt;BR&gt;जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।&lt;BR&gt;अबिगत गोतीतं चरित  पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।&lt;BR&gt;जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह  मुनिबृंदा।&lt;BR&gt;निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।&lt;BR&gt;जेहिं  सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।&lt;BR&gt;सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति  न पूजा।।&lt;BR&gt;जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।&lt;BR&gt;मन बच क्रम बानी छाड़ि  सयानी सरन सकल सुर जूथा।।&lt;BR&gt;सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि  जाना।&lt;BR&gt;जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।।&lt;BR&gt;भव बारिधि मंदर सब  बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।&lt;BR&gt;मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद  कंजा।।&lt;BR&gt;दो0-जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।&lt;BR&gt;गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक  संदेह।।186।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर  बेसा।।&lt;BR&gt;अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।।&lt;BR&gt;कस्यप अदिति महातप  कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।।&lt;BR&gt;ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट  नरभूपा।।&lt;BR&gt;तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।।&lt;BR&gt;नारद बचन  सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।।&lt;BR&gt;हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु  देव समुदाई।।&lt;BR&gt;गगन ब्रह्मबानी सुनी काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।।&lt;BR&gt;तब  ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा।।&lt;BR&gt;दो0-निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह  इहइ सिखाइ।&lt;BR&gt;बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।187।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;गए देव सब  निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ।&lt;BR&gt;जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे  देव बिलंब न कीन्हा।।&lt;BR&gt;बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह  पाहीं।।&lt;BR&gt;गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।।&lt;BR&gt;गिरि कानन जहँ  तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।।&lt;BR&gt;यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो  सुनहु जो बीचहिं राखा।।&lt;BR&gt;अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ  नाऊँ।।&lt;BR&gt;धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।&lt;BR&gt;दो0-कौसल्यादि  नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।&lt;BR&gt;पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल  बिनीत।।188।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत  नाहीं।।&lt;BR&gt;गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।।&lt;BR&gt;निज दुख सुख  सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।।&lt;BR&gt;धरहु धीर होइहहिं सुत चारी।  त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।&lt;BR&gt;सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य  करावा।।&lt;BR&gt;भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।&lt;BR&gt;जो  बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।।&lt;BR&gt;यह हबि बाँटि देहु नृप  जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।&lt;BR&gt;दो0-तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि  समुझाइ।।&lt;BR&gt;परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तबहिं रायँ प्रिय  नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।।&lt;BR&gt;अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे  कर कीन्हा।।&lt;BR&gt;कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।।&lt;BR&gt;कौसल्या  कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।।&lt;BR&gt;एहि बिधि गर्भसहित सब नारी।  भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।।&lt;BR&gt;जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति  छाए।।&lt;BR&gt;मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं।।&lt;BR&gt;सुख जुत कछुक काल  चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ।।&lt;BR&gt;दो0-जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए  अनुकूल।&lt;BR&gt;चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।190।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नौमी तिथि मधु  मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।&lt;BR&gt;मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल  लोक बिश्रामा।।&lt;BR&gt;सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।।&lt;BR&gt;बन कुसुमित  गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा।।&lt;BR&gt;सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल  सुर साजि बिमाना।।&lt;BR&gt;गगन बिमल सकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।।&lt;BR&gt;बरषहिं  सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।।&lt;BR&gt;अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा।  बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।&lt;BR&gt;दो0-सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज  धाम।&lt;BR&gt;जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।191।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;छं0-भए प्रगट  कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।&lt;BR&gt;हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप  बिचारी।।&lt;BR&gt;लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।&lt;BR&gt;भूषन बनमाला नयन  बिसाला सोभासिंधु खरारी।।&lt;BR&gt;कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं  अनंता।&lt;BR&gt;माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।&lt;BR&gt;करुना सुख सागर सब गुन  आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।&lt;BR&gt;सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट  श्रीकंता।।&lt;BR&gt;ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।&lt;BR&gt;मम उर सो  बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।&lt;BR&gt;उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित  बहुत बिधि कीन्ह चहै।&lt;BR&gt;कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम  लहै।।&lt;BR&gt;माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।&lt;BR&gt;कीजै सिसुलीला अति  प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।&lt;BR&gt;सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक  सुरभूपा।&lt;BR&gt;यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।&lt;BR&gt;दो0-बिप्र धेनु  सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।&lt;BR&gt;निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो  पार।।192।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब  रानी।।&lt;BR&gt;हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।।&lt;BR&gt;दसरथ पुत्रजन्म सुनि  काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।।&lt;BR&gt;परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति  धीरा।।&lt;BR&gt;जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।।&lt;BR&gt;परमानंद पूरि मन  राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा।।&lt;BR&gt;गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित  नृपद्वारा।।&lt;BR&gt;अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न  सिराई।।&lt;BR&gt;दो0-नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।&lt;BR&gt;हाटक धेनु बसन मनि नृप  बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।193।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि  भाँति बनावा।।&lt;BR&gt;सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई।।&lt;BR&gt;बृंद बृंद  मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई।।&lt;BR&gt;कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं  भूप दुआरा।।&lt;BR&gt;करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं।।&lt;BR&gt;मागध सूत  बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।।&lt;BR&gt;सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा  राखा नहिं ताहू।।&lt;BR&gt;मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच  बीचा।।&lt;BR&gt;दो0-गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।&lt;BR&gt;हरषवंत सब जहँ तहँ नगर  नारि नर बृंद।।194।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं  ओऊ।।&lt;BR&gt;वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा।।&lt;BR&gt;अवधपुरी सोहइ एहि  भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती।।&lt;BR&gt;देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या  अनुमानी।।&lt;BR&gt;अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी।।&lt;BR&gt;मंदिर मनि समूह  जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा।।&lt;BR&gt;भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर  समयँ जनु सानी।।&lt;BR&gt;कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना।।&lt;BR&gt;दो0-मास  दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।&lt;BR&gt;रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि  होइ।।195।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत  गुनगाना।।&lt;BR&gt;देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।।&lt;BR&gt;औरउ एक कहउँ  निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।।&lt;BR&gt;काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ  नहिं कोऊ।।&lt;BR&gt;परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।।&lt;BR&gt;यह सुभ चरित  जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।।&lt;BR&gt;तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो  जेहि मन भावा।।&lt;BR&gt;गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।&lt;BR&gt;दो0-मन  संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।&lt;BR&gt;सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के  ईस।।196।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।।&lt;BR&gt;नामकरन कर अवसरु जानी।  भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि  राखा।।&lt;BR&gt;इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा।।&lt;BR&gt;जो आनंद सिंधु  सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।&lt;BR&gt;सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक  बिश्रामा।।&lt;BR&gt;बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।।&lt;BR&gt;जाके सुमिरन तें  रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।।&lt;BR&gt;दो0-लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत  आधार।&lt;BR&gt;गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।197।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;धरे नाम गुर  हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।।&lt;BR&gt;मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि  तेहिं सुख माना।।&lt;BR&gt;बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।।&lt;BR&gt;भरत  सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई।।&lt;BR&gt;स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी।  निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।&lt;BR&gt;चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर  रामा।।&lt;BR&gt;हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।।&lt;BR&gt;कबहुँ उछंग कबहुँ  बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना।।&lt;BR&gt;दो0-ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत  बिनोद।&lt;BR&gt;सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद।।198।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;काम कोटि छबि  स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।।&lt;BR&gt;अरुन चरन पकंज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे  जनु मोती।।&lt;BR&gt;रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे।।&lt;BR&gt;कटि  किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा।।&lt;BR&gt;भुज बिसाल भूषन जुत भूरी।  हियँ हरि नख अति सोभा रूरी।।&lt;BR&gt;उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन  लोभा।।&lt;BR&gt;कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई।।&lt;BR&gt;दुइ दुइ दसन अधर  अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे।।&lt;BR&gt;सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर  तोतरे बोला।।&lt;BR&gt;चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे।।&lt;BR&gt;पीत  झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई।।&lt;BR&gt;रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति  सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा।।&lt;BR&gt;दो0-सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा  गोतीत।&lt;BR&gt;दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत।।199।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एहि बिधि राम  जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।।&lt;BR&gt;जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की  यह गति प्रगट भवानी।।&lt;BR&gt;रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी।।&lt;BR&gt;जीव  चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे।।&lt;BR&gt;भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस  प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही।।&lt;BR&gt;मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं  रघुराई।।&lt;BR&gt;एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा।।&lt;BR&gt;लै  उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै।।&lt;BR&gt;दो0-प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन  जात न जान।&lt;BR&gt;सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।200।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;एक बार जननीं  अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।&lt;BR&gt;करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा।  आपु गई जहँ पाक बनावा।।&lt;BR&gt;बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।।&lt;BR&gt;गै  जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।।&lt;BR&gt;बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ  कंप मन धीर न होई।।&lt;BR&gt;इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन  बिसेषा।।&lt;BR&gt;देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर  मुसुकानी।।&lt;BR&gt;दो0-देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।&lt;BR&gt;रोम रोम प्रति लागे कोटि  कोटि ब्रह्मंड।। 201।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु  महि कानन।।&lt;BR&gt;काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।।&lt;BR&gt;देखी माया सब  बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।।&lt;BR&gt;देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ  ताही।।&lt;BR&gt;तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।&lt;BR&gt;बिसमयवंत देखि  महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।।&lt;BR&gt;अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत  करि जाना।।&lt;BR&gt;हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।&lt;BR&gt;दो0-बार  बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।।&lt;BR&gt;अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।।  202।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ  दीन्हा।।&lt;BR&gt;कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।।&lt;BR&gt;चूड़ाकरन कीन्ह गुरु  जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।।&lt;BR&gt;परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ  सुकुमारा।।&lt;BR&gt;मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।।&lt;BR&gt;भोजन करत बोल  जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।।&lt;BR&gt;कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु  चलहिं पराई।।&lt;BR&gt;निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।।&lt;BR&gt;धूरस धूरि  भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।&lt;BR&gt;दो0-भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु  पाइ।&lt;BR&gt;भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बालचरित अति सरल  सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।।&lt;BR&gt;जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित  किए बिधाता।।&lt;BR&gt;भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।।&lt;BR&gt;गुरगृहँ  गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।।&lt;BR&gt;जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़  यह कौतुक भारी।।&lt;BR&gt;बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला।।&lt;BR&gt;करतल  बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।।&lt;BR&gt;जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित  होहिं सब लोग लुगाई।।&lt;BR&gt;दो0- कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।&lt;BR&gt;प्रानहु ते  प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन  मृगया नित खेलहिं जाई।।&lt;BR&gt;पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं  आनी।।&lt;BR&gt;जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।।&lt;BR&gt;अनुज सखा सँग भोजन  करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।।&lt;BR&gt;जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं  कृपानिधि सोइ संजोगा।।&lt;BR&gt;बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह  समुझाई।।&lt;BR&gt;प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।&lt;BR&gt;आयसु मागि  करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।&lt;BR&gt;दो0-ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न  रूप।&lt;BR&gt;भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।।205।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;यह सब चरित कहा मैं  गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।।&lt;BR&gt;बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ  आश्रम जानी।।&lt;BR&gt;जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।।&lt;BR&gt;देखत जग्य  निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं।।&lt;BR&gt;गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु  मरहि न निसिचर पापी।।&lt;BR&gt;तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि  भारा।।&lt;BR&gt;एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई।।&lt;BR&gt;ग्यान बिराग सकल गुन  अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना।।&lt;BR&gt;दो0-बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं  बार।&lt;BR&gt;करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मुनि आगमन सुना जब राजा।  मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।।&lt;BR&gt;करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि  आनी।।&lt;BR&gt;चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।।&lt;BR&gt;बिबिध भाँति  भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।।&lt;BR&gt;पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि  मुनि देह बिसारी।।&lt;BR&gt;भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।।&lt;BR&gt;तब मन  हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।।&lt;BR&gt;केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु  सो करत न लावउँ बारा।।&lt;BR&gt;असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही।।&lt;BR&gt;अनुज  समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।&lt;BR&gt;दो0-देहु भूप मन हरषित तजहु मोह  अग्यान।&lt;BR&gt;धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि  राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।।&lt;BR&gt;चौथेंपन पायउँ सुत चारी।  बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।।&lt;BR&gt;मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु  सहरोसा।।&lt;BR&gt;देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही।।&lt;BR&gt;सब  सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई।।&lt;BR&gt;कहँ निसिचर अति घोर  कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।।&lt;BR&gt;सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना  मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।।&lt;BR&gt;अति आदर  दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।।&lt;BR&gt;मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि  पिता आन नहिं कोऊ।।&lt;BR&gt;दो0-सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस।&lt;BR&gt;जननी भवन गए  प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।।&lt;BR&gt;सो0-पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय  हरन।।&lt;BR&gt;कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अरुन नयन उर  बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।।&lt;BR&gt;कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप  सायक दुहुँ हाथा।।&lt;BR&gt;स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई।।&lt;BR&gt;प्रभु  ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना।।&lt;BR&gt;चले जात मुनि दीन्हि  दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।।&lt;BR&gt;एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि  निज पद दीन्हा।।&lt;BR&gt;तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या  दीन्ही।।&lt;BR&gt;जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।&lt;BR&gt;दो0-आयुष सब  समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।&lt;BR&gt;कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित  जानि।।209।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह  जाई।।&lt;BR&gt;होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।।&lt;BR&gt;सुनि मारीच निसाचर  क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।।&lt;BR&gt;बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर  पारा।।&lt;BR&gt;पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।।&lt;BR&gt;मारि असुर द्विज  निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।।&lt;BR&gt;तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे  कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।।&lt;BR&gt;भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु  जाना।।&lt;BR&gt;तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।।&lt;BR&gt;धनुषजग्य मुनि  रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।।&lt;BR&gt;आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु  तहँ नाहीं।।&lt;BR&gt;पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा  बिसेषी।।&lt;BR&gt;दो0-गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।&lt;BR&gt;चरन कमल रज चाहति कृपा  करहु रघुबीर।।210।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;छं0-परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज  सही।&lt;BR&gt;देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।&lt;BR&gt;अति प्रेम अधीरा पुलक  सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।&lt;BR&gt;अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार  बही।।&lt;BR&gt;धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।&lt;BR&gt;अति निर्मल  बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।।&lt;BR&gt;मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन  रिपु जन सुखदाई।&lt;BR&gt;राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।&lt;BR&gt;मुनि श्राप  जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।&lt;BR&gt;देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ  लाभ संकर जाना।।&lt;BR&gt;बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।&lt;BR&gt;पद कमल  परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।&lt;BR&gt;जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई  सिव सीस धरी।&lt;BR&gt;सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।।&lt;BR&gt;एहि भाँति  सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।&lt;BR&gt;जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक  अनंद भरी।।&lt;BR&gt;दो0-अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।&lt;BR&gt;तुलसिदास सठ तेहि भजु  छाड़ि कपट जंजाल।।211।।&lt;BR&gt;मासपारायण, सातवाँ विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;चले राम लछिमन  मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।।&lt;BR&gt;गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि  महि आई।।&lt;BR&gt;तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।।&lt;BR&gt;हरषि चले  मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।।&lt;BR&gt;पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज  समेत बिसेषी।।&lt;BR&gt;बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।।&lt;BR&gt;गुंजत मंजु  मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।।&lt;BR&gt;बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर  सदा सुखदाता।।&lt;BR&gt;दो0-सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।&lt;BR&gt;फूलत फलत सुपल्लवत  सोहत पुर चहुँ पास।।212।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ  लोभाई।।&lt;BR&gt;चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।।&lt;BR&gt;धनिक बनिक  बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।।&lt;BR&gt;चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध  सिंचाई।।&lt;BR&gt;मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।।&lt;BR&gt;पुर नर नारि  सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।।&lt;BR&gt;अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं  बिबुध बिलोकि बिलासू।।&lt;BR&gt;होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु  रोकी।।&lt;BR&gt;दो0-धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।&lt;BR&gt;सिय निवास सुंदर सदन सोभा  किमि कहि जाति।।213।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध  भाटा।।&lt;BR&gt;बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।।&lt;BR&gt;सूर सचिव सेनप  बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।।&lt;BR&gt;पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ  बिपुल महीपा।।&lt;BR&gt;देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।।&lt;BR&gt;कौसिक कहेउ  मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।।&lt;BR&gt;भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ  मुनिबृंद समेता।।&lt;BR&gt;बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।&lt;BR&gt;दो0-संग  सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।&lt;BR&gt;चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि  भाँति।।214।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित  मुनिनाथा।।&lt;BR&gt;बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।।&lt;BR&gt;कुसल प्रस्न  कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।।&lt;BR&gt;तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन  फुलवाई।।&lt;BR&gt;स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।।&lt;BR&gt;उठे सकल जब  रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।।&lt;BR&gt;भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन  पुलकित गाता।।&lt;BR&gt;मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।&lt;BR&gt;दो0-प्रेम  मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।&lt;BR&gt;बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा  गभीर।।215।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल  पालक।।&lt;BR&gt;ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।।&lt;BR&gt;सहज बिरागरुप  मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।।&lt;BR&gt;ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि  करहु दुराऊ।।&lt;BR&gt;इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।।&lt;BR&gt;कह  मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।।&lt;BR&gt;ए प्रिय सबहि जहाँ लगि  प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।।&lt;BR&gt;रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि  नरेस पठाए।।&lt;BR&gt;दो0-रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।&lt;BR&gt;मख राखेउ सबु साखि जगु  जिते असुर संग्राम।।216।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।।&lt;BR&gt;सुंदर स्याम गौर  दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।।&lt;BR&gt;इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन  भाव सुहावनि।।&lt;BR&gt;सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।।&lt;BR&gt;पुनि  पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।&lt;BR&gt;म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद  सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।।&lt;BR&gt;सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह  भुआला।।&lt;BR&gt;करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।&lt;BR&gt;दो0-रिषय संग  रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।&lt;BR&gt;बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि  जामु।।217।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।&lt;BR&gt;प्रभु  भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।।&lt;BR&gt;राम अनुज मन की गति  जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।।&lt;BR&gt;परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन  पाई।।&lt;BR&gt;नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।।&lt;BR&gt;जौं राउर  आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।।&lt;BR&gt;सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम  तुम्ह राखहु नीती।।&lt;BR&gt;धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक  सुखदाता।।&lt;BR&gt;दो0-जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।&lt;BR&gt;करहु सुफल सब के नयन  सुंदर बदन देखाइ।।218।।&lt;BR&gt;मासपारायण, आठवाँ विश्राम&lt;BR&gt;नवान्हपारायण, दूसरा  विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।।&lt;BR&gt;बालक  बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।।&lt;BR&gt;पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप  सर सोहत हाथा।।&lt;BR&gt;तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।।&lt;BR&gt;केहरि कंधर  बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।।&lt;BR&gt;सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक  तापत्रय मोचन।।&lt;BR&gt;कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु  लेहीं।।&lt;BR&gt;चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।&lt;BR&gt;दो0-रुचिर  चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।&lt;BR&gt;नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल  सुदेस।।219।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।।&lt;BR&gt;धाए धाम  काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी।।&lt;BR&gt;निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी  लोचन फल पाई।।&lt;BR&gt;जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं।।&lt;BR&gt;कहहिं  परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती।।&lt;BR&gt;सुर नर असुर नाग मुनि माहीं।  सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं।।&lt;BR&gt;बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच  पुरारी।।&lt;BR&gt;अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही।।&lt;BR&gt;दो0-बय किसोर सुषमा  सदन स्याम गौर सुख घाम ।&lt;BR&gt;अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत  काम।।220।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।।&lt;BR&gt;कोउ  सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी।।&lt;BR&gt;ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल  मरालन्हि के कल जोटा।।&lt;BR&gt;मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर  मारे।।&lt;BR&gt;स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन।।&lt;BR&gt;कौसल्या सुत सो  सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी।।&lt;BR&gt;गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के  पाछें।।&lt;BR&gt;लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा  माता।।&lt;BR&gt;दो0-बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।&lt;BR&gt;आए देखन चापमख सुनि  हरषीं सब नारि।।221।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु  अहई।।&lt;BR&gt;जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।।&lt;BR&gt;कोउ कह ए भूपति  पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने।।&lt;BR&gt;सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि  अबिबेकहि भजई।।&lt;BR&gt;कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता।।&lt;BR&gt;तौ  जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू।।&lt;BR&gt;जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ  कृतकृत्य होइ सब लोगू।।&lt;BR&gt;सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि  नातें।।&lt;BR&gt;दो0-नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।&lt;BR&gt;यह संघटु तब होइ  जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति  हित सबहीं का।।&lt;BR&gt;कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा।।&lt;BR&gt;सबु असमंजस  अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी।।&lt;BR&gt;सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़  प्रभाउ देखत लघु अहहीं।।&lt;BR&gt;परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ  भूरी।।&lt;BR&gt;सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।।&lt;BR&gt;जेहिं  बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी।।&lt;BR&gt;तासु बचन सुनि सब  हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी।।&lt;BR&gt;दो0-हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि  सुलोचनि बृंद।&lt;BR&gt;जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद।।223।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पुर  पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।।&lt;BR&gt;अति बिस्तार चारु गच ढारी।  बिमल बेदिका रुचिर सँवारी।।&lt;BR&gt;चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं  महिपाला।।&lt;BR&gt;तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा।।&lt;BR&gt;कछुक ऊँचि सब  भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई।।&lt;BR&gt;तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम  बहुबरन बनाए।।&lt;BR&gt;जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी।।&lt;BR&gt;पुर  बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना।।&lt;BR&gt;दो0-सब सिसु एहि मिस  प्रेमबस परसि मनोहर गात।&lt;BR&gt;तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ  भ्रात।।224।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत  बखाने।।&lt;BR&gt;निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई।।&lt;BR&gt;राम  देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना।।&lt;BR&gt;लव निमेष महँ भुवन निकाया।  रचइ जासु अनुसासन माया।।&lt;BR&gt;भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष  मखसाला।।&lt;BR&gt;कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं।।&lt;BR&gt;जासु  त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई।।&lt;BR&gt;कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए  बिदा बालक बरिआई।।&lt;BR&gt;दो0-सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।&lt;BR&gt;गुर पद पंकज  नाइ सिर बैठे आयसु पाइ।।225।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं  संध्याबंदनु कीन्हा।।&lt;BR&gt;कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम  सिरानी।।&lt;BR&gt;मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।।&lt;BR&gt;जिन्ह के चरन  सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।।&lt;BR&gt;तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद  कमल पलोटत प्रीते।।&lt;BR&gt;बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब  कीन्ही।।&lt;BR&gt;चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि प्रभु  कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता।।&lt;BR&gt;दो0-उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा  धुनि कान।।&lt;BR&gt;गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।।226।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सकल सौच  करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।।&lt;BR&gt;समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून  चले दोउ भाई।।&lt;BR&gt;भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई।।&lt;BR&gt;लागे बिटप  मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।।&lt;BR&gt;नव पल्लव फल सुमान सुहाए। निज संपति सुर  रूख लजाए।।&lt;BR&gt;चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।।&lt;BR&gt;मध्य बाग सरु सोह  सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा।।&lt;BR&gt;बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत  भृंगा।।&lt;BR&gt;दो0-बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।&lt;BR&gt;परम रम्य आरामु यहु जो  रामहि सुख देत।।227।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल  मुदित मन।।&lt;BR&gt;तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।।&lt;BR&gt;संग सखीं सब सुभग  सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी।।&lt;BR&gt;सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु  मोहा।।&lt;BR&gt;मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।।&lt;BR&gt;पूजा कीन्हि  अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा।।&lt;BR&gt;एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन  फुलवाई।।&lt;BR&gt;तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।&lt;BR&gt;दो0-तासु दसा  देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।&lt;BR&gt;कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु  बैन।।228।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति  सुहाए।।&lt;BR&gt;स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।&lt;BR&gt;सुनि हरषीँ सब  सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी।।&lt;BR&gt;एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि  सँग आए काली।।&lt;BR&gt;जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी।।&lt;BR&gt;बरनत छबि  जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।&lt;BR&gt;तासु वचन अति सियहि सुहाने। दरस  लागि लोचन अकुलाने।।&lt;BR&gt;चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न  कोई।।&lt;BR&gt;दो0-सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।।&lt;BR&gt;चकित बिलोकति सकल दिसि  जनु सिसु मृगी सभीत।।229।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन  रामु हृदयँ गुनि।।&lt;BR&gt;मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।।मनसा बिस्व बिजय कहँ  कीन्ही।।&lt;BR&gt;अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।।&lt;BR&gt;भए बिलोचन  चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।।&lt;BR&gt;देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ  सराहत बचनु न आवा।।&lt;BR&gt;जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि  देखाई।।&lt;BR&gt;सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।।&lt;BR&gt;सब उपमा कबि रहे  जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।।&lt;BR&gt;दो0-सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा  बिचारि।&lt;BR&gt;बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तात जनकतनया  यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।।&lt;BR&gt;पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ  फुलवाई।।&lt;BR&gt;जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।।&lt;BR&gt;सो सबु कारन जान  बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।।&lt;BR&gt;रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु  धरइ न काऊ।।&lt;BR&gt;मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न  हेरी।।&lt;BR&gt;जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।&lt;BR&gt;मंगन  लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।&lt;BR&gt;दो0-करत बतकहि अनुज सन मन सिय  रूप लोभान।&lt;BR&gt;मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान।।231।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;चितवहि चकित  चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।&lt;BR&gt;जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ  बरिस कमल सित श्रेनी।।&lt;BR&gt;लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।।&lt;BR&gt;देखि  रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।।&lt;BR&gt;थके नयन रघुपति छबि देखें।  पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।&lt;BR&gt;अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव  चकोरी।।&lt;BR&gt;लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।&lt;BR&gt;जब सिय सखिन्ह  प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।&lt;BR&gt;दो0-लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर  दोउ भाइ।&lt;BR&gt;निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ।।232।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सोभा सीवँ  सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।।&lt;BR&gt;मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच  कुसुम कली के।।&lt;BR&gt;भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए।।&lt;BR&gt;बिकट  भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।।&lt;BR&gt;चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास  लेत मनु मोला।।&lt;BR&gt;मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं।।&lt;BR&gt;उर  मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा।।&lt;BR&gt;सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर  कुअँर सखी सुठि लोना।।&lt;BR&gt;दो0-केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।&lt;BR&gt;देखि  भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।233।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता  सन बोली गहि पानी।।&lt;BR&gt;बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन  लेहू।।&lt;BR&gt;सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।।&lt;BR&gt;नख सिख देखि राम  कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।&lt;BR&gt;परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब  कहहि सभीता।।&lt;BR&gt;पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।।&lt;BR&gt;गूढ़ गिरा  सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।।&lt;BR&gt;धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि  अपनपउ पितुबस जाने।।&lt;BR&gt;दो0-देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।&lt;BR&gt;निरखि  निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।। 234।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जानि कठिन सिवचाप  बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।।&lt;BR&gt;प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा  गुन खानी।।&lt;BR&gt;परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही।।&lt;BR&gt;गई  भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी।।&lt;BR&gt;जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख  चंद चकोरी।।&lt;BR&gt;जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।&lt;BR&gt;नहिं तव आदि  मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।&lt;BR&gt;भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व  बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।&lt;BR&gt;दो0-पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।&lt;BR&gt;महिमा  अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।&lt;BR&gt;देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।  सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।&lt;BR&gt;मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही  कें।।&lt;BR&gt;कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।&lt;BR&gt;बिनय प्रेम बस  भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।।&lt;BR&gt;सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु  हियँ भरेऊ।।&lt;BR&gt;सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।&lt;BR&gt;नारद बचन  सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।&lt;BR&gt;छं0-मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो  बरु सहज सुंदर साँवरो।&lt;BR&gt;करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।।&lt;BR&gt;एहि भाँति  गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।&lt;BR&gt;तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन  मंदिर चली।।&lt;BR&gt;सो0-जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।&lt;BR&gt;मंजुल मंगल मूल  बाम अंग फरकन लगे।।236।।&lt;BR&gt;हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।।&lt;BR&gt;राम  कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।।&lt;BR&gt;सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही।  पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।।&lt;BR&gt;सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए  सुखारे।।&lt;BR&gt;करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।।&lt;BR&gt;बिगत दिवसु  गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।।&lt;BR&gt;प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख  सरिस देखि सुखु पावा।।&lt;BR&gt;बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर  नाहीं।।&lt;BR&gt;दो0-जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।&lt;BR&gt;सिय मुख समता पाव  किमि चंदु बापुरो रंक।।237।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज  संधिहिं पाई।।&lt;BR&gt;कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।।&lt;BR&gt;बैदेही  मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।।&lt;BR&gt;सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी।  गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।&lt;BR&gt;करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह  बिश्रामा।।&lt;BR&gt;बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।।&lt;BR&gt;उदउ अरुन  अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।।&lt;BR&gt;बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ  सूचक मृदु बानी।।&lt;BR&gt;दो0-अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।&lt;BR&gt;जिमि तुम्हार  आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न  सकहिं चाप तम भारी।।&lt;BR&gt;कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।&lt;BR&gt;ऐसेहिं  प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।।&lt;BR&gt;उयउ भानु बिनु श्रम तम  नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।&lt;BR&gt;रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब  नृपन्ह दिखाया।।&lt;BR&gt;तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।&lt;BR&gt;बंधु  बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।।&lt;BR&gt;नित्यक्रिया करि गुरु पहिं  आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।।&lt;BR&gt;सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत  पठाए।।&lt;BR&gt;जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।&lt;BR&gt;दो0-सतानंदûपद बंदि  प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।&lt;BR&gt;चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक  बोलाइ।।239।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।&lt;BR&gt;लखन  कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।।&lt;BR&gt;हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि  असीस सबहिं सुखु मानी।।&lt;BR&gt;पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख  साला।।&lt;BR&gt;रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।।&lt;BR&gt;चले सकल गृह काज  बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।&lt;BR&gt;देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए  हँकारी।।&lt;BR&gt;तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।&lt;BR&gt;दो0-कहि मृदु  बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।&lt;BR&gt;उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल  अनुहारि।।240।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।&lt;BR&gt;गुन  सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।।&lt;BR&gt;राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ  जनु जुग बिधु पूरे।।&lt;BR&gt;जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी  तैसी।।&lt;BR&gt;देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।।&lt;BR&gt;डरे कुटिल नृप  प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।&lt;BR&gt;रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु  प्रगट कालसम देखा।।&lt;BR&gt;पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।&lt;BR&gt;दो0-नारि  बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।&lt;BR&gt;जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम  अनूप।।241।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन  सीसा।।&lt;BR&gt;जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।।&lt;BR&gt;सहित बिदेह  बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।।&lt;BR&gt;जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत  सुद्ध सम सहज प्रकासा।।&lt;BR&gt;हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख  दाता।।&lt;BR&gt;रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।।&lt;BR&gt;उर अनुभवति न  कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।।&lt;BR&gt;एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ  कोसलराऊ।।&lt;BR&gt;दो0-राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।&lt;BR&gt;सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व  बिलोचन चोर।।242।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु  सोऊ।।&lt;BR&gt;सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।।&lt;BR&gt;चितवत चारु मार मनु  हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।।&lt;BR&gt;कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर  मृदु बोला।।&lt;BR&gt;कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।।&lt;BR&gt;भाल बिसाल  तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।।&lt;BR&gt;पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम  कलीं बिच बीच बनाईं।।&lt;BR&gt;रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की  सीवाँ।।&lt;BR&gt;दो0-कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।&lt;BR&gt;बृषभ कंध केहरि ठवनि बल  निधि बाहु बिसाल।।243।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर  काँधे।।&lt;BR&gt;पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।।&lt;BR&gt;देखि लोग सब भए  सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।।&lt;BR&gt;हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब  जाई।।&lt;BR&gt;करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।।&lt;BR&gt;जहँ जहँ जाहि  कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।।&lt;BR&gt;निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न  जान कछु मरमु बिसेषा।।&lt;BR&gt;भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख  लहेऊ।।&lt;BR&gt;दो0-सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।&lt;BR&gt;मुनि समेत दोउ बंधु तहँ  बैठारे महिपाल।।244।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;प्रभुहि देखि सब नृप हिँयँ हारे। जनु राकेस उदय  भएँ तारे।।&lt;BR&gt;असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।।&lt;BR&gt;बिनु  भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।&lt;BR&gt;अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु  प्रतापु बलु तेजु गवाँई।।&lt;BR&gt;बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध  अभिमानी।।&lt;BR&gt;तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।।&lt;BR&gt;एक बार  कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।।&lt;BR&gt;यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील  हरिभगत सयाने।।&lt;BR&gt;सो0-सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।।&lt;BR&gt;जीति को सक  संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।&lt;BR&gt;ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि  भूख बुताई।।&lt;BR&gt;सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।।&lt;BR&gt;जगत पिता  रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।।&lt;BR&gt;सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ  बंधु संभु उर बासी।।&lt;BR&gt;सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत  धाई।।&lt;BR&gt;करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।।&lt;BR&gt;अस कहि भले भूप  अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।।&lt;BR&gt;देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं  कल गाना।।&lt;BR&gt;दो0-जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।&lt;BR&gt;चतुर सखीं सुंदर सकल सादर  चलीं लवाईं।।246।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन  खानी।।&lt;BR&gt;उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।।&lt;BR&gt;सिय बरनिअ तेइ  उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।।&lt;BR&gt;जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ  कमनीया।।&lt;BR&gt;गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।।&lt;BR&gt;बिष बारुनी  बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।।&lt;BR&gt;जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय  कच्छप सोई।।&lt;BR&gt;सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।&lt;BR&gt;दो0-एहि बिधि  उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।&lt;BR&gt;तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय  समतूल।।247।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।।&lt;BR&gt;सोह  नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।।&lt;BR&gt;भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग  रचि सखिन्ह बनाए।।&lt;BR&gt;रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।।&lt;BR&gt;हरषि  सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।।&lt;BR&gt;पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए  सकल भुआला।।&lt;BR&gt;सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।।&lt;BR&gt;मुनि समीप देखे  दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।&lt;BR&gt;दो0-गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय  सकुचानि।।&lt;BR&gt;लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राम रूपु  अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।&lt;BR&gt;सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि  सन बिनय करहिं मन माहीं।।&lt;BR&gt;हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि  सुहाई।।&lt;BR&gt;बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।।&lt;BR&gt;जग भल कहहि भाव  सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।।&lt;BR&gt;एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी  जोगू।।&lt;BR&gt;तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।।&lt;BR&gt;कह नृप जाइ कहहु पन  मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।&lt;BR&gt;दो0-बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।&lt;BR&gt;पन  बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू।  गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।&lt;BR&gt;रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं  सिधारे।।&lt;BR&gt;सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।।&lt;BR&gt;त्रिभुवन जय समेत  बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।&lt;BR&gt;सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन  माखे।।&lt;BR&gt;परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।&lt;BR&gt;तमकि ताकि तकि  सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।।&lt;BR&gt;जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप  समीप महीप न जाहीं।।&lt;BR&gt;दो0-तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।&lt;BR&gt;मनहुँ पाइ  भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन  टरइ न टारा।।&lt;BR&gt;डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।।&lt;BR&gt;सब नृप भए  जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।।&lt;BR&gt;कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर  बरबस हारी।।&lt;BR&gt;श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।।&lt;BR&gt;नृपन्ह  बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।।&lt;BR&gt;दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि  हम जो पनु ठाना।।&lt;BR&gt;देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।&lt;BR&gt;दो0-कुअँरि  मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।&lt;BR&gt;पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु  दमनीय।।251।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप  चढ़ावा।।&lt;BR&gt;रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।।&lt;BR&gt;अब जनि कोउ माखै भट  मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।।&lt;BR&gt;तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि  बिबाहू।।&lt;BR&gt;सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।।&lt;BR&gt;जो जनतेउँ  बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।।&lt;BR&gt;जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि  जानकिहि भए दुखारी।।&lt;BR&gt;माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन  रिसौंहें।।&lt;BR&gt;दो0-कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।&lt;BR&gt;नाइ राम पद कमल सिरु  बोले गिरा प्रमान।।252।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस  कहइ न कोई।।&lt;BR&gt;कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।।&lt;BR&gt;सुनहु  भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।।&lt;BR&gt;जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं।  कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।।&lt;BR&gt;काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि  तोरी।।&lt;BR&gt;तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।।&lt;BR&gt;नाथ जानि अस आयसु  होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।।&lt;BR&gt;कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै  धावौं।।&lt;BR&gt;दो0-तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।&lt;BR&gt;जौं न करौं प्रभु पद सपथ  कर न धरौं धनु भाथ।।253।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज  डोले।।&lt;BR&gt;सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।।&lt;BR&gt;गुर रघुपति सब  मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।।&lt;BR&gt;सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम  समेत निकट बैठारे।।&lt;BR&gt;बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।।&lt;BR&gt;उठहु  राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।।&lt;BR&gt;सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु  बिषादु न कछु उर आवा।।&lt;BR&gt;ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु  लजाएँ।।&lt;BR&gt;दो0-उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।&lt;BR&gt;बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन  भृंग।।254।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न  प्रकासी।।&lt;BR&gt;मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।।&lt;BR&gt;भए बिसोक कोक  मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।।&lt;BR&gt;गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह  सन आयसु मागा।।&lt;BR&gt;सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।।&lt;BR&gt;चलत राम  सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।।&lt;BR&gt;बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु  पुन्य प्रभाउ हमारे।।&lt;BR&gt;तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस  गोसाईं।।&lt;BR&gt;दो0-रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।&lt;BR&gt;सीता मातु सनेह बस बचन  कहइ बिलखाइ।।255।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू  हमारे।।&lt;BR&gt;कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।।&lt;BR&gt;रावन बान छुआ  नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।।&lt;BR&gt;सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर  लेहीं।।&lt;BR&gt;भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।&lt;BR&gt;बोली चतुर सखी  मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।।&lt;BR&gt;कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु  सकल संसारा।।&lt;BR&gt;रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा।।&lt;BR&gt;दो0-मंत्र  परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।&lt;BR&gt;महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस  खर्ब।।256।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस  कीन्हे।।&lt;BR&gt;देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी।।&lt;BR&gt;सखी बचन सुनि  भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।।&lt;BR&gt;तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ  बिनवति जेहि तेही।।&lt;BR&gt;मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।&lt;BR&gt;करहु  सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।&lt;BR&gt;गननायक बरदायक देवा। आजु लगें  कीन्हिउँ तुअ सेवा।।&lt;BR&gt;बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति  थोरी।।&lt;BR&gt;दो0-देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।।&lt;BR&gt;भरे बिलोचन प्रेम जल  पुलकावली सरीर।।257।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि  मनु छोभा।।&lt;BR&gt;अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।&lt;BR&gt;सचिव सभय  सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।।&lt;BR&gt;कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ  स्यामल मृदुगात किसोरा।।&lt;BR&gt;बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ  हीरा।।&lt;BR&gt;सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।।&lt;BR&gt;निज जड़ता लोगन्ह  पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।।&lt;BR&gt;अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब  सय जाहीं।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।&lt;BR&gt;खेलत मनसिज मीन  जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज  निसा अवलोकी।।&lt;BR&gt;लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।।&lt;BR&gt;सकुची  ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।।&lt;BR&gt;तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति  पद सरोज चितु राचा।।&lt;BR&gt;तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै  दासी।।&lt;BR&gt;जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।।&lt;BR&gt;प्रभु तन  चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।&lt;BR&gt;सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव  गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।&lt;BR&gt;दो0-लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।&lt;BR&gt;पुलकि गात  बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु  धरनि धरि धीर न डोला।।&lt;BR&gt;रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु  मोरा।।&lt;BR&gt;चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।।&lt;BR&gt;सब कर संसउ अरु  अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।।&lt;BR&gt;भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि  कदराई।।&lt;BR&gt;सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।&lt;BR&gt;संभुचाप बड  बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई।।&lt;BR&gt;राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ  कड़हारू।।&lt;BR&gt;दो0-राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।&lt;BR&gt;चितई सीय कृपायतन जानी  बिकल बिसेषि।।260।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम  तेही।।&lt;BR&gt;तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।&lt;BR&gt;का बरषा सब  कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।।&lt;BR&gt;अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु  पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।&lt;BR&gt;गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु  लीन्हा।।&lt;BR&gt;दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।।&lt;BR&gt;लेत चढ़ावत  खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।।&lt;BR&gt;तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन  धुनि घोर कठोरा।।&lt;BR&gt;छं0-भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु  चले।&lt;BR&gt;चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।।&lt;BR&gt;सुर असुर मुनि कर कान  दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।&lt;BR&gt;कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन  उचारही।।&lt;BR&gt;सो0-संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।&lt;BR&gt;बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो  प्रथमहिं मोह बस।।261।।&lt;BR&gt;प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।&lt;BR&gt;रामरूप राकेसु निहारी।  बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।।&lt;BR&gt;बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि  गाना।।&lt;BR&gt;ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।।&lt;BR&gt;बरिसहिं  सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला।।&lt;BR&gt;रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग  धुनि जात न जानी।।&lt;BR&gt;मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु  भारी।।&lt;BR&gt;दो0-बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।&lt;BR&gt;करहिं निछावरि लोग सब हय गय  धन मनि चीर।।262।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी  सुहाई।।&lt;BR&gt;बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।।&lt;BR&gt;सखिन्ह सहित  हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।।&lt;BR&gt;जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें  थाह जनु पाई।।&lt;BR&gt;श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।।&lt;BR&gt;सीय सुखहि  बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।।&lt;BR&gt;रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि  चकोर किसोरकु जैसें।।&lt;BR&gt;सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं  कीन्हा।।&lt;BR&gt;दो0-संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।&lt;BR&gt;गवनी बाल मराल गति सुषमा  अंग अपार।।263।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि  जैसें।।&lt;BR&gt;कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।।&lt;BR&gt;तन सकोचु मन परम  उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।&lt;BR&gt;जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि  चित्र अवरेखी।।&lt;BR&gt;चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।।&lt;BR&gt;सुनत जुगल  कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।&lt;BR&gt;सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत  जयमाला।।&lt;BR&gt;गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।&lt;BR&gt;सो0-रघुबर उर  जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।&lt;BR&gt;सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि  कुमुदगन।।264।।&lt;BR&gt;पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।।&lt;BR&gt;सुर  किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।।&lt;BR&gt;नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं।  बार बार कुसुमांजलि छूटीं।।&lt;BR&gt;जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि  उच्चरहीं।।&lt;BR&gt;महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।।&lt;BR&gt;करहिं आरती  पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।&lt;BR&gt;सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु  मनहुँ एक ठोरी।।&lt;BR&gt;सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति  भीता।।&lt;BR&gt;दो0-गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।&lt;BR&gt;मन बिहसे रघुबंसमनि  प्रीति अलौकिक जानि।।265।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन  माखे।।&lt;BR&gt;उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।&lt;BR&gt;लेहु छड़ाइ सीय कह  कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।।&lt;BR&gt;तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को  बरई।।&lt;BR&gt;जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।।&lt;BR&gt;साधु भूप बोले सुनि  बानी। राजसमाजहि लाज लजानी।।&lt;BR&gt;बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग  सिधाई।।&lt;BR&gt;सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि  लाई।।&lt;BR&gt;दो0-देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।&lt;BR&gt;लखन रोषु पावकु प्रबल  जानि सलभ जनि होहु।।266।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग  अरि भागू।।&lt;BR&gt;जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।&lt;BR&gt;लोभी लोलुप कल  कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।।&lt;BR&gt;हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु  नरनाहा।।&lt;BR&gt;कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।।&lt;BR&gt;रामु सुभायँ चले  गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।।&lt;BR&gt;रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि  काह करनीया।।&lt;BR&gt;भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।&lt;BR&gt;दो0-अरुन  नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।&lt;BR&gt;मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि  चोप।।267।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह  गारीं।।&lt;BR&gt;तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।।&lt;BR&gt;देखि महीप  सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।।&lt;BR&gt;गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल  त्रिपुंड बिराजा।।&lt;BR&gt;सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।।&lt;BR&gt;भृकुटी  कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।&lt;BR&gt;बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु  जनेउ माल मृगछाला।।&lt;BR&gt;कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल  काँधें।।&lt;BR&gt;दो0-सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।&lt;BR&gt;धरि मुनितनु जनु बीर रसु  आयउ जहँ सब भूप।।268।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल  भुआला।।&lt;BR&gt;पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।&lt;BR&gt;जेहि सुभायँ  चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।।&lt;BR&gt;जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ  प्रनामु करावा।।&lt;BR&gt;आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई  सयानीं।।&lt;BR&gt;बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।।&lt;BR&gt;रामु लखनु दसरथ  के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।&lt;BR&gt;रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद  मोचन।।&lt;BR&gt;दो0-बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।।&lt;BR&gt;पूछत जानि अजान जिमि  ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब  आए।।&lt;BR&gt;सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।&lt;BR&gt;अति रिस बोले बचन  कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।&lt;BR&gt;बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव  राजू।।&lt;BR&gt;अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।&lt;BR&gt;सुर मुनि नाग  नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।&lt;BR&gt;मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी  बात बिगारी।।&lt;BR&gt;भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।&lt;BR&gt;दो0-सभय  बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।&lt;BR&gt;हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले  श्रीरघुबीरु।।270।।&lt;BR&gt;मासपारायण, नवाँ विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नाथ संभुधनु भंजनिहारा।  होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।&lt;BR&gt;आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि  कोही।।&lt;BR&gt;सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।&lt;BR&gt;सुनहु राम जेहिं  सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।&lt;BR&gt;सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं  सब राजा।।&lt;BR&gt;सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।&lt;BR&gt;बहु धनुहीं  तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।&lt;BR&gt;एहि धनु पर ममता केहि हेतू।  सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।&lt;BR&gt;दो0-रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न  सँमार।।&lt;BR&gt;धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;लखन कहा हँसि  हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।&lt;BR&gt;का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन  के भोरें।।&lt;BR&gt;छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।&lt;BR&gt;बोले  चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।&lt;BR&gt;बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल  मुनि जड़ जानहि मोही।।&lt;BR&gt;बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल  द्रोही।।&lt;BR&gt;भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।&lt;BR&gt;सहसबाहु  भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।&lt;BR&gt;दो0-मातु पितहि जनि सोचबस करसि  महीसकिसोर।&lt;BR&gt;गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बिहसि  लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।।&lt;BR&gt;पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत  उड़ावन फूँकि पहारू।।&lt;BR&gt;इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि  जाहीं।।&lt;BR&gt;देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।&lt;BR&gt;भृगुसुत समुझि  जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।&lt;BR&gt;सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल  इन्ह पर न सुराई।।&lt;BR&gt;बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ  तुम्हारें।।&lt;BR&gt;कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान  कुठारा।।&lt;BR&gt;दो0-जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।&lt;BR&gt;सुनि सरोष भृगुबंसमनि  बोले गिरा गभीर।।273।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल  घालकु।।&lt;BR&gt;भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।।&lt;BR&gt;काल कवलु होइहि छन  माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।।&lt;BR&gt;तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु  बलु रोषु हमारा।।&lt;BR&gt;लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै  पारा।।&lt;BR&gt;अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।&lt;BR&gt;नहिं संतोषु त  पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।।&lt;BR&gt;बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी  देत न पावहु सोभा।।&lt;BR&gt;दो0-सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।&lt;BR&gt;बिद्यमान रन  पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार  बार मोहि लागि बोलावा।।&lt;BR&gt;सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर  घोरा।।&lt;BR&gt;अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।&lt;BR&gt;बाल बिलोकि बहुत  मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।&lt;BR&gt;कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं  न साधू।।&lt;BR&gt;खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।&lt;BR&gt;उतर देत छोड़उँ  बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।।&lt;BR&gt;न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन  होतेउँ श्रम थोरें।।&lt;BR&gt;दो0-गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।&lt;BR&gt;अयमय  खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को  नहि जान बिदित संसारा।।&lt;BR&gt;माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़  जीकें।।&lt;BR&gt;सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।&lt;BR&gt;अब आनिअ  ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।&lt;BR&gt;सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय  सब सभा पुकारा।।&lt;BR&gt;भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ  नृपद्रोही।।&lt;BR&gt;मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।&lt;BR&gt;अनुचित  कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।&lt;BR&gt;दो0-लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर  कोपु कृसानु।&lt;BR&gt;बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;नाथ करहु  बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।&lt;BR&gt;जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि  बराबरि करत अयाना।।&lt;BR&gt;जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन  भरहीं।।&lt;BR&gt;करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।&lt;BR&gt;राम बचन  सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।&lt;BR&gt;हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी।  राम तोर भ्राता बड़ पापी।।&lt;BR&gt;गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख  नाहीं।।&lt;BR&gt;सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।&lt;BR&gt;दो0-लखन कहेउ  हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।&lt;BR&gt;जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व  प्रतिकूल।।277।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब  दाया।।&lt;BR&gt;टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।&lt;BR&gt;जौ अति प्रिय  तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।&lt;BR&gt;बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु  अनुचित भल नाहीं।।&lt;BR&gt;थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़  भारी।।&lt;BR&gt;भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।&lt;BR&gt;बोले रामहि  देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।&lt;BR&gt;मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा  कनक घटु जैसैं।।&lt;BR&gt;दो0- सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।&lt;BR&gt;गुर समीप गवने  सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु  जोरि जुग पानी।।&lt;BR&gt;सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं  काना।।&lt;BR&gt;बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।&lt;BR&gt;तेहिं नाहीं कछु  काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।।&lt;BR&gt;कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ  दास की नाई।।&lt;BR&gt;कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।&lt;BR&gt;कह मुनि  राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।&lt;BR&gt;एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ  मैं काह कोपु करि कीन्हा।।&lt;BR&gt;दो0-गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति  घोर।&lt;BR&gt;परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बहइ न हाथु दहइ रिस  छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।&lt;BR&gt;भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा  कसि काऊ।।&lt;BR&gt;आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।।&lt;BR&gt;बाउ कृपा  मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।&lt;BR&gt;जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध  भएँ तनु राख बिधाता।।&lt;BR&gt;देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।&lt;BR&gt;बेगि  करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।।&lt;BR&gt;बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें  आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।&lt;BR&gt;दो0-परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।&lt;BR&gt;संभु  सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू  छल बिनय करसि कर जोरें।।&lt;BR&gt;करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब  रामा।।&lt;BR&gt;छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।।&lt;BR&gt;भृगुपति  बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ।।&lt;BR&gt;गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ  सुधाइहु ते बड़ दोषू।।&lt;BR&gt;टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न  राहू।।&lt;BR&gt;राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।।&lt;BR&gt;जेंहिं रिस जाइ  करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु  बिप्रबर रोसु।&lt;BR&gt;बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देखि  कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।&lt;BR&gt;नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा।  बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा।।&lt;BR&gt;जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु  धरत गोसाईं।।&lt;BR&gt;छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।&lt;BR&gt;हमहि तुम्हहि  सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।&lt;BR&gt;राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु  सहित बड़ नाम तोहारा।।&lt;BR&gt;देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत  तुम्हारें।।&lt;BR&gt;सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।&lt;BR&gt;दो0-बार  बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।&lt;BR&gt;बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम  बाम।।282।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ  तोही।।&lt;BR&gt;चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु।।&lt;BR&gt;समिधि सेन  चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।।&lt;BR&gt;मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप  कोटिन्ह कीन्हे।।&lt;BR&gt;मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के  भोरें।।&lt;BR&gt;भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।&lt;BR&gt;राम कहा मुनि  कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।&lt;BR&gt;छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि  हेतु करौं अभिमाना।।&lt;BR&gt;दो0-जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।&lt;BR&gt;तौ अस  को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;देव दनुज भूपति भट नाना।  समबल अधिक होउ बलवाना।।&lt;BR&gt;जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन  होऊ।।&lt;BR&gt;छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।।&lt;BR&gt;कहउँ सुभाउ न  कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।।&lt;BR&gt;बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ  जो तुम्हहि डेराई।।&lt;BR&gt;सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति  के।।&lt;BR&gt;राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।&lt;BR&gt;देत चापु आपुहिं चलि  गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।&lt;BR&gt;दो0-जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित  गात।&lt;BR&gt;जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात।।284।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जय रघुबंस बनज  बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।&lt;BR&gt;जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह  भ्रम हारी।।&lt;BR&gt;बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।।&lt;BR&gt;सेवक सुखद  सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।&lt;BR&gt;करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन  मानस हंसा।।&lt;BR&gt;अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।।&lt;BR&gt;कहि जय  जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।।&lt;BR&gt;अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ  कायर गवँहिं पराने।।&lt;BR&gt;दो0-देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।&lt;BR&gt;हरषे  पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं  मनोहर मंगल साजे।।&lt;BR&gt;जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं। करहिं गान कल  कोकिलबयनी।।&lt;BR&gt;सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई।।&lt;BR&gt;गत त्रास  भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी।।&lt;BR&gt;जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु  प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।&lt;BR&gt;मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ  गोसाई।।&lt;BR&gt;कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।।&lt;BR&gt;टूटतहीं धनु भयउ  बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु।।&lt;BR&gt;दो0-तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस  ब्यवहारु।&lt;BR&gt;बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु।।286।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;दूत  अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।।&lt;BR&gt;मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए  दूत बोलि तेहि काला।।&lt;BR&gt;बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।।&lt;BR&gt;हाट  बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा।।&lt;BR&gt;हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि  परिचारक बोलि पठाए।।&lt;BR&gt;रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।।&lt;BR&gt;पठए  बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।।&lt;BR&gt;बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह  अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।&lt;BR&gt;दो0-हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के  फूल।&lt;BR&gt;रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।287।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बेनि हरित  मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।&lt;BR&gt;कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि  परइ सपरन सुहाई।।&lt;BR&gt;तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए।।&lt;BR&gt;मानिक  मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।।&lt;BR&gt;किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं  कूजहिं पवन प्रसंगा।।&lt;BR&gt;सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब  ठाढ़ी।।&lt;BR&gt;चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई।।&lt;BR&gt;दो0-सौरभ पल्लव  सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।।&lt;BR&gt;हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय  डोरि।।288।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद  सँवारे।।&lt;BR&gt;मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए।।&lt;BR&gt;दीप मनोहर मनिमय  नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।।&lt;BR&gt;जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति  कबि केही।।&lt;BR&gt;दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।।&lt;BR&gt;जनक भवन कै  सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।।&lt;BR&gt;जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि  लघु लगहिं भुवन दस चारी।।&lt;BR&gt;जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक  मोहा।।&lt;BR&gt;दो0-बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।।&lt;BR&gt;तेहि पुर कै सोभा कहत  सकुचहिं सारद सेषु।।289।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि  सुहावन।।&lt;BR&gt;भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।&lt;BR&gt;करि प्रनामु  तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।&lt;BR&gt;बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक  गात आई भरि छाती।।&lt;BR&gt;रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।&lt;BR&gt;पुनि  धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।&lt;BR&gt;खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए  भरतु सहित हित भाई।।&lt;BR&gt;पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।&lt;BR&gt;दो0-कुसल  प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।&lt;BR&gt;सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि  नरेस।।290।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न  गाता।।&lt;BR&gt;प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी।।&lt;BR&gt;तब नृप दूत  निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।।&lt;BR&gt;भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज  नयन निहारे।।&lt;BR&gt;स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।।&lt;BR&gt;पहिचानहु  तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।।&lt;BR&gt;जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब  तें आजु साँचि सुधि पाई।।&lt;BR&gt;कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत  मुसकाने।।&lt;BR&gt;दो0-सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।&lt;BR&gt;रामु लखनु जिन्ह  के तनय बिस्व बिभूषन दोउ।।291।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ  तिहु पुर उजिआरे।।&lt;BR&gt;जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल  लागे।।&lt;BR&gt;तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे।।&lt;BR&gt;सीय  स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका।।&lt;BR&gt;संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल  बीर बरिआरा।।&lt;BR&gt;तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।।&lt;BR&gt;सकइ उठाइ  सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू।।&lt;BR&gt;जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि  सभाँ पराभउ पावा।।&lt;BR&gt;दो0-तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।&lt;BR&gt;भंजेउ चाप  प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।292।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत  भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।&lt;BR&gt;देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन  कीन्हा।।&lt;BR&gt;राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।।&lt;BR&gt;कंपहि भूप  बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।।&lt;BR&gt;देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर  आवत कोऊ।।&lt;BR&gt;दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।।&lt;BR&gt;सभा समेत राउ  अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।।&lt;BR&gt;कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि  सबहिं सुख माना।।&lt;BR&gt;दो0-तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।&lt;BR&gt;कथा सुनाई  गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।293।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य  पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।&lt;BR&gt;जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना  नाहीं।।&lt;BR&gt;तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।&lt;BR&gt;तुम्ह गुर  बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।।&lt;BR&gt;सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ  न है कोउ होनेउ नाहीं।।&lt;BR&gt;तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत  जाकें।।&lt;BR&gt;बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी।।&lt;BR&gt;तुम्ह कहुँ सर्ब  काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।।&lt;BR&gt;दो0-चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ  सिरु नाइ।&lt;BR&gt;भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;राजा सबु  रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।&lt;BR&gt;सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब  भूप बखानीं।।&lt;BR&gt;प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद  बनी।।&lt;BR&gt;मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।।&lt;BR&gt;लेहिं परस्पर अति  प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।&lt;BR&gt;राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार  भूपबर बरनी।।&lt;BR&gt;मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।&lt;BR&gt;दिए  दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।&lt;BR&gt;सो0-जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि  कोटि बिधि।&lt;BR&gt;चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।&lt;BR&gt;कहत चले पहिरें  पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।&lt;BR&gt;समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने  बधाए।।&lt;BR&gt;भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।&lt;BR&gt;सुनि सुभ कथा लोग  अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।।&lt;BR&gt;जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय  पावनि।।&lt;BR&gt;तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।&lt;BR&gt;ध्वज पताक पट  चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू।।&lt;BR&gt;कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत  माला।।&lt;BR&gt;दो0-मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।&lt;BR&gt;बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें  चारु पुराइ।।296।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति  दामिनि।।&lt;BR&gt;बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि।।&lt;BR&gt;गावहिं मंगल  मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं।।&lt;BR&gt;भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन  रचेउ बिताना।।&lt;BR&gt;मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।।&lt;BR&gt;कतहुँ बिरिद  बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।।&lt;BR&gt;गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै  नामु रामु अरु सीता।।&lt;BR&gt;बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु  ओरा।।&lt;BR&gt;दो0-सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।&lt;BR&gt;जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह  अवतार।।297।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु  जाई।।&lt;BR&gt;चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।&lt;BR&gt;भरत सकल साहनी  बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।।&lt;BR&gt;रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर  बाजि बिराजे।।&lt;BR&gt;सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।।&lt;BR&gt;नाना जाति न  जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।।&lt;BR&gt;तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय  राजकुमारा।।&lt;BR&gt;सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।&lt;BR&gt;दो0- छरे छबीले  छयल सब सूर सुजान नबीन।&lt;BR&gt;जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला  प्रबीन।।298।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर  ठाढ़े।।&lt;BR&gt;फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना।।&lt;BR&gt;रथ  सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।।&lt;BR&gt;चवँर चारु किंकिन धुनि करही।  भानु जान सोभा अपहरहीं।।&lt;BR&gt;सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह  जोते।।&lt;BR&gt;सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।&lt;BR&gt;जे जल चलहिं  थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।।&lt;BR&gt;अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह  लिए बोलाई।।&lt;BR&gt;दो0-चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।&lt;BR&gt;होत सगुन सुन्दर सबहि  जो जेहि कारज जात।।299।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं  जेहि भाँति सँवारीं।।&lt;BR&gt;चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।&lt;BR&gt;बाहन  अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।&lt;BR&gt;तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु  तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।&lt;BR&gt;मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि  लायक।।&lt;BR&gt;बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।&lt;BR&gt;कोटिन्ह काँवरि  चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।&lt;BR&gt;चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु  बनाई।।&lt;BR&gt;दो0-सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।&lt;BR&gt;कबहिं देखिबे नयन भरि  रामु लखनू दोउ बीर।।300।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस  चहु ओरा।।&lt;BR&gt;निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।&lt;BR&gt;महा  भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।&lt;BR&gt;चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं।  लिँएँ आरती मंगल थारी।।&lt;BR&gt;गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।&lt;BR&gt;तब  सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।&lt;BR&gt;दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने।  नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।&lt;BR&gt;राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति  भ्राजा।।&lt;BR&gt;दो0-तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।&lt;BR&gt;आपु चढ़ेउ स्पंदन  सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर  संग पुरंदर जैसें।।&lt;BR&gt;करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति  बनाऊ।।&lt;BR&gt;सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।।&lt;BR&gt;हरषे बिबुध बिलोकि  बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।&lt;BR&gt;भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने  बाजे।।&lt;BR&gt;सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।&lt;BR&gt;घंट घंटि धुनि बरनि न  जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।।&lt;BR&gt;करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान  सुजाना ।&lt;BR&gt;दो0-तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।।&lt;BR&gt;नागर नट चितवहिं चकित  डगहिं न ताल बँधान।।302।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर  सुभदाता।।&lt;BR&gt;चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।&lt;BR&gt;दाहिन काग सुखेत  सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।&lt;BR&gt;सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर  नारी।।&lt;BR&gt;लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।&lt;BR&gt;मृगमाला फिरि  दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।&lt;BR&gt;छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु  पर देखी।।&lt;BR&gt;सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।&lt;BR&gt;दो0-मंगलमय  कल्यानमय अभिमत फल दातार।&lt;BR&gt;जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक  बार।।303।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत  जाकें।।&lt;BR&gt;राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।।&lt;BR&gt;सुनि अस ब्याहु  सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।&lt;BR&gt;एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय  गाजहिं हने निसाना।।&lt;BR&gt;आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।&lt;BR&gt;बीच  बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।&lt;BR&gt;असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज  निज मन भाए।।&lt;BR&gt;नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।&lt;BR&gt;दो0-आवत  जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।&lt;BR&gt;सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले  अगवान।।304।।&lt;BR&gt;मासपारायण,दसवाँ विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन  ललित अनेक प्रकारा।।&lt;BR&gt;भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।&lt;BR&gt;फल  अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।।&lt;BR&gt;भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग  हय गय बहुबिधि जाना।।&lt;BR&gt;मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।।&lt;BR&gt;दधि  चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।&lt;BR&gt;अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु  पुलक भर गाता।।&lt;BR&gt;देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।&lt;BR&gt;दो0-हरषि  परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।&lt;BR&gt;जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ  सुबेल।।305।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं  बजावहिं।।&lt;BR&gt;बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें।।&lt;BR&gt;प्रेम  समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।।&lt;BR&gt;करि पूजा मान्यता बड़ाई।  जनवासे कहुँ चले लवाई।।&lt;BR&gt;बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु  परिहरहीं।।&lt;BR&gt;अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।।&lt;BR&gt;जानी  सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।।&lt;BR&gt;हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई।  भूप पहुनई करन पठाई।।&lt;BR&gt;दो0-सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।&lt;BR&gt;लिएँ संपदा  सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।306।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख  सकल सुलभ सब भाँती।।&lt;BR&gt;बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।&lt;BR&gt;सिय  महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।&lt;BR&gt;पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ  न अति आनंदु अमाई।।&lt;BR&gt;सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन  माहीं।।&lt;BR&gt;बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।&lt;BR&gt;हरषि बंधु दोउ  हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।।&lt;BR&gt;चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ  पिआसे।।&lt;BR&gt;दो0- भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।&lt;BR&gt;उठे हरषि सुखसिंधु महुँ  चले थाह सी लेत।।307।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि  सीसा।।&lt;BR&gt;कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।।&lt;BR&gt;पुनि दंडवत करत दोउ  भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।।&lt;BR&gt;सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान  जनु भेंटे।।&lt;BR&gt;पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर  लाए।।&lt;BR&gt;बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं।।&lt;BR&gt;भरत सहानुज कीन्ह  प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा।।&lt;BR&gt;हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित  गाता।।&lt;BR&gt;दो0-पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।&lt;BR&gt;मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम  कृपाल बिनीत।।308।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति  बखानी।।&lt;BR&gt;नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।।&lt;BR&gt;सुतन्ह समेत  दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।।&lt;BR&gt;सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं  नाचहिं करि गाना।।&lt;BR&gt;सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।।&lt;BR&gt;सहित  बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।।&lt;BR&gt;प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर  प्रमोदु अधिकाई।।&lt;BR&gt;ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन  कहहीं।।&lt;BR&gt;दो0-रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।&lt;BR&gt;जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस  मिलि नर नारि समाज।।।309।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु  धरें देही।।&lt;BR&gt;इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिँ न इन्ह समान फल लाधे।।&lt;BR&gt;इन्ह  सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।&lt;BR&gt;हम सब सकल सुकृत कै रासी।  भए जग जनमि जनकपुर बासी।।&lt;BR&gt;जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस  बिसेषी।।&lt;BR&gt;पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।&lt;BR&gt;कहहिं परसपर  कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।।&lt;BR&gt;बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि  होइहहिं दोउ भाई।।&lt;BR&gt;दो0-बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।&lt;BR&gt;लेन आइहहिं बंधु  दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस  सासुर माई।।&lt;BR&gt;तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।&lt;BR&gt;सखि जस राम  लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।&lt;BR&gt;स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि  जे आए।।&lt;BR&gt;कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।&lt;BR&gt;भरतु रामही की  अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।&lt;BR&gt;लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग  अनूपा।।&lt;BR&gt;मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ  नाहीं।।&lt;BR&gt;छं0-उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।&lt;BR&gt;बल बिनय बिद्या  सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।।&lt;BR&gt;पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन  सुनावहीं।।&lt;BR&gt;ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।&lt;BR&gt;सो0-कहहिं  परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।&lt;BR&gt;सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप  दोउ।।311।।&lt;BR&gt;एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।&lt;BR&gt;जे नृप सीय  स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।&lt;BR&gt;कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन  गए महिपाला।।&lt;BR&gt;गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।&lt;BR&gt;मंगल  मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।&lt;BR&gt;ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू।  लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।&lt;BR&gt;पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह  जोई।।&lt;BR&gt;सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।&lt;BR&gt;दो0-धेनुधूरि  बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।&lt;BR&gt;बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन  अनुकुल।।312।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु  काहा।।&lt;BR&gt;सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।&lt;BR&gt;संख निसान पनव बहु  बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।&lt;BR&gt;सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र  पुनीता।।&lt;BR&gt;लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।।&lt;BR&gt;कोसलपति कर देखि  समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।&lt;BR&gt;भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा  निसानहिं घाऊ।।&lt;BR&gt;गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु  समाजा।।&lt;BR&gt;दो0-भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।&lt;BR&gt;लगे सराहन सहस मुख जानि  जनम निज बादि।।313।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ  निसाना।।&lt;BR&gt;सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।&lt;BR&gt;प्रेम पुलक  तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।।&lt;BR&gt;देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक  सबहिं लघु लागे।।&lt;BR&gt;चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।।&lt;BR&gt;नगर  नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।&lt;BR&gt;तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं।  भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।।&lt;BR&gt;बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न  देखी।।&lt;BR&gt;दो0-सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।&lt;BR&gt;हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय  रघुबीर बिआहु।।314।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल  नसाहीं।।&lt;BR&gt;करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।।&lt;BR&gt;एहि बिधि संभु  सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।।&lt;BR&gt;देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन  पुलकित गाता।।&lt;BR&gt;साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।।&lt;BR&gt;सोहत  साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।।&lt;BR&gt;मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह  भै प्रीति न थोरी।।&lt;BR&gt;पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह  बरषे।।&lt;BR&gt;दो0-राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।&lt;BR&gt;पुलक गात लोचन सजल उमा  समेत पुरारि।।315।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन  सुरंगा।।&lt;BR&gt;ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।।&lt;BR&gt;सरद बिमल बिधु  बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।।&lt;BR&gt;सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन  भाई।।&lt;BR&gt;बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।।&lt;BR&gt;राजकुअँर बर बाजि  देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।&lt;BR&gt;जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि  खगनायकु लाजे।।&lt;BR&gt;कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम  बनावा।।&lt;BR&gt;छं0-जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।&lt;BR&gt;आपनें बय बल रूप  गुन गति सकल भुवन बिमोहई।।&lt;BR&gt;जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक  लगे।&lt;BR&gt;किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।&lt;BR&gt;दो0-प्रभु मनसहिं  लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।&lt;BR&gt;भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि  नचाव।।316।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै  पारा।।&lt;BR&gt;संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।&lt;BR&gt;हरि हित सहित रामु  जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।।&lt;BR&gt;निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि  पछिताने।।&lt;BR&gt;सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।&lt;BR&gt;रामहि चितव  सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।।&lt;BR&gt;देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर  सम कोउ नाहीं।।&lt;BR&gt;मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।&lt;BR&gt;छं0-अति  हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।&lt;BR&gt;बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति  जय रघुकुलमनी।।&lt;BR&gt;एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।&lt;BR&gt;रानि सुआसिनि बोलि  परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।&lt;BR&gt;दो0-सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।&lt;BR&gt;चलीं  मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।317।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि।  सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।&lt;BR&gt;पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें  सरीरा।।&lt;BR&gt;सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।&lt;BR&gt;कंकन किंकिनि नूपुर  बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।&lt;BR&gt;बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर  सुमंगलचारा।।&lt;BR&gt;सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।&lt;BR&gt;कपट नारि बर  बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।&lt;BR&gt;करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब  काहुँ न जानी।।&lt;BR&gt;छं0-को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।&lt;BR&gt;कल गान  मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।।&lt;BR&gt;आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित  भई।।&lt;BR&gt;अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।&lt;BR&gt;दो0-जो सुख भा सिय मातु मन  देखि राम बर बेषु।&lt;BR&gt;सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु।।318।।&lt;BR&gt;–*–*– &lt;/P&gt; &lt;P&gt;नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।&lt;BR&gt;बेद बिहित अरु कुल  आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।&lt;BR&gt;पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं  बिधि नाना।।&lt;BR&gt;करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।&lt;BR&gt;दसरथु  सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।।&lt;BR&gt;समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति  पढ़हिं महिसुर अनुकूला।।&lt;BR&gt;नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।।&lt;BR&gt;एहि  बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।&lt;BR&gt;छं0-बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु  सुखु पावहीं।।&lt;BR&gt;मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं।।&lt;BR&gt;ब्रह्मादि सुरबर  बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।&lt;BR&gt;अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन  लेखहीं।।&lt;BR&gt;दो0-नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।&lt;BR&gt;मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न  हृदयँ समाइ।।319।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब  रीतीं।।&lt;BR&gt;मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।।&lt;BR&gt;लही न कतहुँ  हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।।&lt;BR&gt;सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु  गावन लागे।।&lt;BR&gt;जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।।&lt;BR&gt;सकल  भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू।।&lt;BR&gt;देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति  अलौकिक दुहु दिसि माची।।&lt;BR&gt;देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं  ल्याए।।&lt;BR&gt;छं0-मंडपु बिलोकि बिचीत्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।।&lt;BR&gt;निज पानि जनक  सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे।।&lt;BR&gt;कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष  लही।&lt;BR&gt;कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही।।&lt;BR&gt;दो0-बामदेव आदिक रिषय  पूजे मुदित महीस।&lt;BR&gt;दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस।।320।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;बहुरि  कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।&lt;BR&gt;कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज  भाग्य बिभव बहुताई।।&lt;BR&gt;पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।।&lt;BR&gt;आसन उचित  दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।।&lt;BR&gt;सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर  बानी।।&lt;BR&gt;बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।&lt;BR&gt;कपट बिप्र बर  बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।।&lt;BR&gt;पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु  पहिचानें।।&lt;BR&gt;छं0-पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई।&lt;BR&gt;आनंद कंदु  बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई।।&lt;BR&gt;सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन  दए।&lt;BR&gt;अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।&lt;BR&gt;दो0-रामचंद्र मुख  चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।&lt;BR&gt;करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न  थोर।।321।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।&lt;BR&gt;बेगि  कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।।&lt;BR&gt;रानी सुनि उपरोहित बानी।  प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।।&lt;BR&gt;बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल  गाईं।।&lt;BR&gt;नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।।&lt;BR&gt;तिन्हहि देखि  सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।।&lt;BR&gt;बार बार सनमानहिं रानी।  उमा रमा सारद सम जानी।।&lt;BR&gt;सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं  लवाई।।&lt;BR&gt;छं0-चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।&lt;BR&gt;नवसप्त साजें  सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं।।&lt;BR&gt;कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल  लाजहीं।&lt;BR&gt;मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गती बर बाजहीं।।&lt;BR&gt;दो0-सोहति बनिता बृंद  महुँ सहज सुहावनि सीय।&lt;BR&gt;छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय  कमनीय।।322।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।&lt;BR&gt;आवत  दीखि बरातिन्ह सीता।।रूप रासि सब भाँति पुनीता।।&lt;BR&gt;सबहि मनहिं मन किए प्रनामा।  देखि राम भए पूरनकामा।।&lt;BR&gt;हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु  जेता।।&lt;BR&gt;सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।।&lt;BR&gt;गान निसान  कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।।&lt;BR&gt;एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित  सांति पढ़हिं मुनिराई।।&lt;BR&gt;तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह  अचारू।।&lt;BR&gt;छं0-आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।&lt;BR&gt;सुर प्रगटि पूजा  लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।।&lt;BR&gt;मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन  महुँ चहैं।&lt;BR&gt;भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं।।1।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। &lt;/P&gt; &lt;P&gt;एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।।&lt;/P&gt; &lt;P&gt;मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै।।2।।&lt;BR&gt;दो0-होम समय तनु धरि अनलु  अति सुख आहुति लेहिं।&lt;BR&gt;बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि  देहिं।।323।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ  बखानी।।&lt;BR&gt;सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।।&lt;BR&gt;समउ जानि  मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।।&lt;BR&gt;जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि  संग बनि जनु मयना।।&lt;BR&gt;कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे।।&lt;BR&gt;निज कर  मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी।।&lt;BR&gt;पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन  झरि अवसरु जानी।।&lt;BR&gt;बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।&lt;BR&gt;छं0-लागे  पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।&lt;BR&gt;नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि  चली।।&lt;BR&gt;जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।&lt;BR&gt;जे सकृत सुमिरत बिमलता मन  सकल कलि मल भाजहीं।।1।।&lt;BR&gt;जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।&lt;BR&gt;मकरंदु  जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई।।&lt;BR&gt;करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत  गति लहैं।&lt;BR&gt;ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै।।2।।&lt;BR&gt;बर कुअँरि करतल  जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।&lt;BR&gt;भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आँनद  भरैं।।&lt;BR&gt;सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।&lt;BR&gt;करि लोक बेद बिधानु  कन्यादानु नृपभूषन कियो।।3।।&lt;BR&gt;हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर  दई।&lt;BR&gt;तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई।।&lt;BR&gt;क्यों करै बिनय बिदेहु  कियो बिदेहु मूरति सावँरी।&lt;BR&gt;करि होम बिधिवत गाँठि जोरी होन लागी  भावँरी।।4।।&lt;BR&gt;दो0-जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।&lt;BR&gt;सुनि हरषहिं बरषहिं  बिबुध सुरतरु सुमन सुजान।।324।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन  लाभु सब सादर लेहीं।।&lt;BR&gt;जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।।&lt;BR&gt;राम  सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं ।&lt;BR&gt;मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा।  देखत राम बिआहु अनूपा।।&lt;BR&gt;दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।।&lt;BR&gt;भए  मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।।&lt;BR&gt;प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी।  नेगसहित सब रीति निबेरीं।।&lt;BR&gt;राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि  केहीं।।&lt;BR&gt;अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।।&lt;BR&gt;बहुरि बसिष्ठ  दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।&lt;BR&gt;छं0-बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन  दसरथु भए।&lt;BR&gt;तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए।।&lt;BR&gt;भरि भुवन रहा  उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।&lt;BR&gt;केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु  महा।।1।।&lt;BR&gt;तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।&lt;BR&gt;माँडवी श्रुतिकीरति  उरमिला कुअँरि लईं हँकारि के।।&lt;BR&gt;कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख  सोभामई।&lt;BR&gt;सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई।।2।।&lt;BR&gt;जानकी लघु  भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।&lt;BR&gt;सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि  कै।।&lt;BR&gt;जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।&lt;BR&gt;सो दई रिपुसूदनहि  भूपति रूप सील उजागरी।।3।।&lt;BR&gt;अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ  हरषहीं।&lt;BR&gt;सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं।।&lt;BR&gt;सुंदरी सुंदर बरन्ह  सह सब एक मंडप राजहीं।&lt;BR&gt;जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिमुन सहित  बिराजहीं।।4।।&lt;BR&gt;दो0-मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।&lt;BR&gt;जनु पार महिपाल  मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।325।।&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल  कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।&lt;BR&gt;कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु  पूरी।।&lt;BR&gt;कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।।&lt;BR&gt;गज रथ तुरग दास  अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।।&lt;BR&gt;बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ  जानहिं जिन्ह देखा।।&lt;BR&gt;लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु  माने।।&lt;BR&gt;दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।।&lt;BR&gt;तब कर जोरि  जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।&lt;BR&gt;छं0-सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ  कै।&lt;BR&gt;प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।।&lt;BR&gt;सिरु नाइ देव मनाइ सब  सन कहत कर संपुट किएँ।&lt;BR&gt;सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।1।।&lt;BR&gt;कर  जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।&lt;BR&gt;बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय  सों।।&lt;BR&gt;संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।&lt;BR&gt;एहि राज साज समेत सेवक जानिबे  बिनु गथ लए।।2।।&lt;BR&gt;ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।&lt;BR&gt;अपराधु छमिबो बोलि  पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।।&lt;BR&gt;पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।&lt;BR&gt;कहि  जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।3।।&lt;BR&gt;बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ  जनवासेहि चले।&lt;BR&gt;दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।।&lt;BR&gt;तब सखीं मंगल  गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।&lt;BR&gt;दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ  कै।।4।।&lt;BR&gt;दो0-पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।&lt;BR&gt;हरत मनोहर मीन छबि  प्रेम पिआसे नैन।।326।।&lt;BR&gt;मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम&lt;BR&gt;–*–*–&lt;BR&gt;स्याम सरीरु  सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।।&lt;BR&gt;जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत  जिन्ह छाए।।&lt;BR&gt;पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।।&lt;BR&gt;कल किंकिनि  कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।&lt;BR&gt;पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका  चोरि चितु लेई।।&lt;BR&gt;सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।।&lt;BR&gt;पिअर उपरना  काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।।&lt;BR&gt;नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल  सौंदर्ज निधाना।।&lt;BR&gt;सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।।&lt;BR&gt;सोहत  मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।&lt;BR&gt;छं0-गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब  चित चोरहीं।&lt;BR&gt;पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं।।&lt;BR&gt;मनि बसन भूषन  वारि आरति करहिं मंगल गावहिं।&lt;BR&gt;सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु  सुनावहीं।।1।।&lt;BR&gt;कोहबरहिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।&lt;BR&gt;अति प्रीति  लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।।&lt;BR&gt;लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद  कहैं।&lt;BR&gt;रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं।।2।।&lt;BR&gt;निज पानि मनि महुँ  देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।&lt;BR&gt;चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस  जानकी।।&lt;BR&gt;कौतुक बिनोद प्र