रामचरित मानस

इन्टरनेट संस्करण : राहुल त्यागी

Thursday, January 31, 2008

अरण्यकाण्ड

श्री गणेशाय नमः


श्री जानकीवल्लभो विजयते श्री रामचरितमानस तृतीय सोपान (अरण्यकाण्ड)


श्लोक
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम ।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम ॥ १ ॥

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ २ ॥

सो॰
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति ।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई ।
मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन ।
करत जे बन सुर नर मुनि भावन ॥
एक बार चुनि कुसुम सुहाए ।
निज कर भूषन राम बनाए ॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर ।
बैठे फटिक सिला पर सुंदर ॥
सुरपति सुत धरि बायस बेषा ।
सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा ।
महा मंदमति पावन चाहा ॥
सीता चरन चौंच हति भागा ।
मूढ़ मंदमति कारन कागा ॥
चला रुधिर रघुनायक जाना ।
सींक धनुष सायक संधाना ॥

दो॰ अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह ।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह ॥ १ ॥

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा ।
चला भाजि बायस भय पावा ॥
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं ।
राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥
भा निरास उपजी मन त्रासा ।
जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका ।
फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका ॥
काहूँ बैठन कहा न ओही ।
राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना ।
सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना ॥
मित्र करइ सत रिपु कै करनी ।
ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता ।
जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥
नारद देखा बिकल जयंता ।
लागि दया कोमल चित संता ॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही ।
कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥
आतुर सभय गहेसि पद जाई ।
त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई ।
मैं मतिमंद जानि नहिं पाई ॥
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ ।
अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ ॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी ।
एकनयन करि तजा भवानी ॥

सो॰ कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित ।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ २ ॥

रघुपति चित्रकूट बसि नाना ।
चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना ।
होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई ।
सीता सहित चले द्वौ भाई ॥
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ ।
सुनत महामुनि हरषित भयऊ ॥
पुलकित गात अत्रि उठि धाए ।
देखि रामु आतुर चलि आए ॥
करत दंडवत मुनि उर लाए ।
प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने ।
सादर निज आश्रम तब आने ॥
करि पूजा कहि बचन सुहाए ।
दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥
सो॰ प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि ।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ ३ ॥

छं॰ नमामि भक्त वत्सलं ।
कृपालु शील कोमलं ॥
भजामि ते पदांबुजं ।
अकामिनां स्वधामदं ॥
निकाम श्याम सुंदरं ।
भवाम्बुनाथ मंदरं ॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं ।
मदादि दोष मोचनं ॥
प्रलंब बाहु विक्रमं ।
प्रभोऽप्रमेय वैभवं ॥
निषंग चाप सायकं ।
धरं त्रिलोक नायकं ॥
दिनेश वंश मंडनं ।
महेश चाप खंडनं ॥
मुनींद्र संत रंजनं ।
सुरारि वृंद भंजनं ॥
मनोज वैरि वंदितं ।
अजादि देव सेवितं ॥
विशुद्ध बोध विग्रहं ।
समस्त दूषणापहं ॥
नमामि इंदिरा पतिं ।
सुखाकरं सतां गतिं ॥
भजे सशक्ति सानुजं ।
शची पतिं प्रियानुजं ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः ।
भजंति हीन मत्सरा ॥
पतंति नो भवार्णवे ।
वितर्क वीचि संकुले ॥
विविक्त वासिनः सदा ।
भजंति मुक्तये मुदा ॥
निरस्य इंद्रियादिकं ।
प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥
तमेकमभ्दुतं प्रभुं ।
निरीहमीश्वरं विभुं ॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं ।
तुरीयमेव केवलं ॥
भजामि भाव वल्लभं ।
कुयोगिनां सुदुर्लभं ॥
स्वभक्त कल्प पादपं ।
समं सुसेव्यमन्वहं ॥
अनूप रूप भूपतिं ।
नतोऽहमुर्विजा पतिं ॥
प्रसीद मे नमामि ते ।
पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥
पठंति ये स्तवं इदं ।
नरादरेण ते पदं ॥
व्रजंति नात्र संशयं ।
त्वदीय भक्ति संयुता ॥
दो॰ बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि ।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ ४ ॥

अनुसुइया के पद गहि सीता ।
मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई ।
आसिष देइ निकट बैठाई ॥
दिब्य बसन भूषन पहिराए ।
जे नित नूतन अमल सुहाए ॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी ।
नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥
मातु पिता भ्राता हितकारी ।
मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥
अमित दानि भर्ता बयदेही ।
अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी ।
आपद काल परिखिअहिं चारी ॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना ।
अधं बधिर क्रोधी अति दीना ॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना ।
नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा ।
कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं ।
बेद पुरान संत सब कहहिं ॥
उत्तम के अस बस मन माहीं ।
सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥
मध्यम परपति देखइ कैसें ।
भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें ॥
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई ।
सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई ।
जानेहु अधम नारि जग सोई ॥
पति बंचक परपति रति करई ।
रौरव नरक कल्प सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटि ।
दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई ।
पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई ॥
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई ।
बिधवा होई पाई तरुनाई ॥
सो॰ सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय ॥ ५क ॥

सनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि ।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित ॥ ५ख ॥

सुनि जानकीं परम सुखु पावा ।
सादर तासु चरन सिरु नावा ॥
तब मुनि सन कह कृपानिधाना ।
आयसु होइ जाउँ बन आना ॥
संतत मो पर कृपा करेहू ।
सेवक जानि तजेहु जनि नेहू ॥
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी ।
सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी ॥
जासु कृपा अज सिव सनकादी ।
चहत सकल परमारथ बादी ॥
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे ।
दीन बंधु मृदु बचन उचारे ॥
अब जानी मैं श्री चतुराई ।
भजी तुम्हहि सब देव बिहाई ॥
जेहि समान अतिसय नहिं कोई ।
ता कर सील कस न अस होई ॥
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी ।
कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी ॥
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा ।
लोचन जल बह पुलक सरीरा ॥
छं॰ तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए ।
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई ।
रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई ॥
दो॰ कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल ।
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल ॥ ६(क) ॥

सो॰ कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥ ६(ख) ॥

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा ।
चले बनहि सुर नर मुनि ईसा ॥
आगे राम अनुज पुनि पाछें ।
मुनि बर बेष बने अति काछें ॥
उमय बीच श्री सोहइ कैसी ।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसी ॥
सरिता बन गिरि अवघट घाटा ।
पति पहिचानी देहिं बर बाटा ॥
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया ।
करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया ॥
मिला असुर बिराध मग जाता ।
आवतहीं रघुवीर निपाता ॥
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा ।
देखि दुखी निज धाम पठावा ॥
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा ।
सुंदर अनुज जानकी संगा ॥
दो॰ देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग ।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग ॥ ७ ॥

कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला ।
संकर मानस राजमराला ॥
जात रहेउँ बिरंचि के धामा ।
सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा ॥
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती ।
अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥
नाथ सकल साधन मैं हीना ।
कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥
सो कछु देव न मोहि निहोरा ।
निज पन राखेउ जन मन चोरा ॥
तब लगि रहहु दीन हित लागी ।
जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी ॥
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा ।
प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा ॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा ।
बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा ॥
दो॰ सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम ।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम ॥ ८ ॥

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा ।
राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा ॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ ।
प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ ॥
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि ।
सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी ॥
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा ।
जयति प्रनत हित करुना कंदा ॥
पुनि रघुनाथ चले बन आगे ।
मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे ॥
अस्थि समूह देखि रघुराया ।
पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी ।
सबदरसी तुम्ह अंतरजामी ॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए ।
सुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥
दो॰ निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह ।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥ ९ ॥

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना ।
नाम सुतीछन रति भगवाना ॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक ।
सपनेहुँ आन भरोस न देवक ॥
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा ।
करत मनोरथ आतुर धावा ॥
हे बिधि दीनबंधु रघुराया ।
मो से सठ पर करिहहिं दाया ॥
सहित अनुज मोहि राम गोसाई ।
मिलिहहिं निज सेवक की नाई ॥
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं ।
भगति बिरति न ग्यान मन माहीं ॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा ।
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥
एक बानि करुनानिधान की ।
सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥
होइहैं सुफल आजु मम लोचन ।
देखि बदन पंकज भव मोचन ॥
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी ।
कहि न जाइ सो दसा भवानी ॥
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा ।
को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा ॥
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई ।
कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ॥
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई ।
प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ॥
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा ।
प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ॥
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा ।
पुलक सरीर पनस फल जैसा ॥
तब रघुनाथ निकट चलि आए ।
देखि दसा निज जन मन भाए ॥
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा ।
जाग न ध्यानजनित सुख पावा ॥
भूप रूप तब राम दुरावा ।
हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा ॥
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें ।
बिकल हीन मनि फनि बर जैसें ॥
आगें देखि राम तन स्यामा ।
सीता अनुज सहित सुख धामा ॥
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी ।
प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी ॥
भुज बिसाल गहि लिए उठाई ।
परम प्रीति राखे उर लाई ॥
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला ।
कनक तरुहि जनु भेंट तमाला ॥
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा ।
मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ॥
दो॰ तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार ।
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार ॥ १० ॥

कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी ।
अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी ॥
महिमा अमित मोरि मति थोरी ।
रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी ॥
श्याम तामरस दाम शरीरं ।
जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥
पाणि चाप शर कटि तूणीरं ।
नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः ।
संत सरोरुह कानन भानुः ॥
निशिचर करि वरूथ मृगराजः ।
त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं ।
सीता नयन चकोर निशेशं ॥
हर ह्रदि मानस बाल मरालं ।
नौमि राम उर बाहु विशालं ॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः ।
शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः ।
त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं ।
ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं ॥
अमलमखिलमनवद्यमपारं ।
नौमि राम भंजन महि भारं ॥
भक्त कल्पपादप आरामः ।
तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥
अति नागर भव सागर सेतुः ।
त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः ।
कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः ।
संतत शं तनोतु मम रामः ॥
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी ।
सब के हृदयँ निरंतर बासी ॥
तदपि अनुज श्री सहित खरारी ।
बसतु मनसि मम काननचारी ॥
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी ।
सगुन अगुन उर अंतरजामी ॥
जो कोसल पति राजिव नयना ।
करउ सो राम हृदय मम अयना ।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे ।
मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥
सुनि मुनि बचन राम मन भाए ।
बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए ॥
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही ।
जो बर मागहु देउ सो तोही ॥
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा ।
समुझि न परइ झूठ का साचा ॥
तुम्हहि नीक लागै रघुराई ।
सो मोहि देहु दास सुखदाई ॥
अबिरल भगति बिरति बिग्याना ।
होहु सकल गुन ग्यान निधाना ॥
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा ।
अब सो देहु मोहि जो भावा ॥
दो॰ अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम ।
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम ॥ ११ ॥

एवमस्तु करि रमानिवासा ।
हरषि चले कुभंज रिषि पासा ॥
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ ।
भए मोहि एहिं आश्रम आएँ ॥
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं ।
तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं ॥
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई ।
लिए संग बिहसै द्वौ भाई ॥
पंथ कहत निज भगति अनूपा ।
मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा ॥
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ ।
करि दंडवत कहत अस भयऊ ॥
नाथ कौसलाधीस कुमारा ।
आए मिलन जगत आधारा ॥
राम अनुज समेत बैदेही ।
निसि दिनु देव जपत हहु जेही ॥
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए ।
हरि बिलोकि लोचन जल छाए ॥
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई ।
रिषि अति प्रीति लिए उर लाई ॥
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी ।
आसन बर बैठारे आनी ॥
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा ।
मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा ॥
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा ।
हरषे सब बिलोकि सुखकंदा ॥
दो॰ मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर ।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर ॥ १२ ॥

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं ।
तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही ॥
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ ।
ताते तात न कहि समुझायउँ ॥
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही ।
जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही ॥
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी ।
पूछेहु नाथ मोहि का जानी ॥
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी ।
जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥
ऊमरि तरु बिसाल तव माया ।
फल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥
जीव चराचर जंतु समाना ।
भीतर बसहि न जानहिं आना ॥
ते फल भच्छक कठिन कराला ।
तव भयँ डरत सदा सोउ काला ॥
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं ।
पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं ॥
यह बर मागउँ कृपानिकेता ।
बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता ॥
अबिरल भगति बिरति सतसंगा ।
चरन सरोरुह प्रीति अभंगा ॥
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता ।
अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता ॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ ।
फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥
संतत दासन्ह देहु बड़ाई ।
तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ ।
पावन पंचबटी तेहि नाऊँ ॥
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू ।
उग्र साप मुनिबर कर हरहू ॥
बास करहु तहँ रघुकुल राया ।
कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया ॥
चले राम मुनि आयसु पाई ।
तुरतहिं पंचबटी निअराई ॥
दो॰ गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ ॥
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ ॥ १३ ॥

जब ते राम कीन्ह तहँ बासा ।
सुखी भए मुनि बीती त्रासा ॥
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए ।
दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए ॥
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं ।
मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं ॥
सो बन बरनि न सक अहिराजा ।
जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा ॥
एक बार प्रभु सुख आसीना ।
लछिमन बचन कहे छलहीना ॥
सुर नर मुनि सचराचर साईं ।
मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई ॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा ।
सब तजि करौं चरन रज सेवा ॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया ।
कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ॥
दो॰ ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ ॥
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ॥ १४ ॥

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई ।
सुनहु तात मति मन चित लाई ॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया ।
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई ।
सो सब माया जानेहु भाई ॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ ।
बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा ।
जा बस जीव परा भवकूपा ॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें ।
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं ।
देख ब्रह्म समान सब माही ॥
कहिअ तात सो परम बिरागी ।
तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥
दो॰ माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव ।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव ॥ १५ ॥

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना ।
ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई ।
सो मम भगति भगत सुखदाई ॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना ।
तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥
भगति तात अनुपम सुखमूला ।
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी ।
सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती ।
निज निज कर्म निरत श्रुति रीती ॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा ।
तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं ।
मम लीला रति अति मन माहीं ॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा ।
मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा ।
सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा ।
गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥
काम आदि मद दंभ न जाकें ।
तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
दो॰ बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ॥
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥ १६ ॥

भगति जोग सुनि अति सुख पावा ।
लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती ।
कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी ।
दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥
पंचबटी सो गइ एक बारा ।
देखि बिकल भइ जुगल कुमारा ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी ।
पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी ।
जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई ।
बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी ।
यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं ।
देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं ॥
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी ।
मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता ।
अहइ कुआर मोर लघु भ्राता ॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी ।
प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा ।
पराधीन नहिं तोर सुपासा ॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा ।
जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥
सेवक सुख चह मान भिखारी ।
ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥
लोभी जसु चह चार गुमानी ।
नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई ।
प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई ।
जो तृन तोरि लाज परिहरई ॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई ।
रूप भयंकर प्रगटत भई ॥
सीतहि सभय देखि रघुराई ।
कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥
दो॰ लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि ।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥ १७ ॥

नाक कान बिनु भइ बिकरारा ।
जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा ॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता ।
धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई ।
जातुधान सुनि सेन बनाई ॥
धाए निसिचर निकर बरूथा ।
जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा ॥
नाना बाहन नानाकारा ।
नानायुध धर घोर अपारा ॥
सुपनखा आगें करि लीनी ।
असुभ रूप श्रुति नासा हीनी ॥
असगुन अमित होहिं भयकारी ।
गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी ॥
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं ।
देखि कटकु भट अति हरषाहीं ॥
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई ।
धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई ॥
धूरि पूरि नभ मंडल रहा ।
राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर ।
आवा निसिचर कटकु भयंकर ॥
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी ।
चले सहित श्री सर धनु पानी ॥
देखि राम रिपुदल चलि आवा ।
बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा ॥
छं॰ कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों ।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों ॥
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै ॥
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै ॥
सो॰ आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट ।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज ॥ १८ ॥

प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी ।
थकित भई रजनीचर धारी ॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन ।
यह कोउ नृपबालक नर भूषन ॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते ।
देखे जिते हते हम केते ॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई ।
देखी नहिं असि सुंदरताई ॥
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा ।
बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥
देहु तुरत निज नारि दुराई ।
जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु ।
तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥
दूतन्ह कहा राम सन जाई ।
सुनत राम बोले मुसकाई ॥
हम छत्री मृगया बन करहीं ।
तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं ॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं ।
एक बार कालहु सन लरहीं ॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक ।
मुनि पालक खल सालक बालक ॥
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू ।
समर बिमुख मैं हतउँ न काहू ॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई ।
रिपु पर कृपा परम कदराई ॥
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ ।
सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ ॥
छं॰ उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा ।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥
प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा ।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा ॥
दो॰ सावधान होइ धाए जानि सबल आराति ।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति ॥ १९(क) ॥

तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर ।
तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर ॥ १९(ख) ॥

छं॰ तब चले जान बबान कराल ।
फुंकरत जनु बहु ब्याल ॥
कोपेउ समर श्रीराम ।
चले बिसिख निसित निकाम ॥
अवलोकि खरतर तीर ।
मुरि चले निसिचर बीर ॥
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ ।
जो भागि रन ते जाइ ॥
तेहि बधब हम निज पानि ।
फिरे मरन मन महुँ ठानि ॥
आयुध अनेक प्रकार ।
सनमुख ते करहिं प्रहार ॥
रिपु परम कोपे जानि ।
प्रभु धनुष सर संधानि ॥
छाँड़े बिपुल नाराच ।
लगे कटन बिकट पिसाच ॥
उर सीस भुज कर चरन ।
जहँ तहँ लगे महि परन ॥
चिक्करत लागत बान ।
धर परत कुधर समान ॥
भट कटत तन सत खंड ।
पुनि उठत करि पाषंड ॥
नभ उड़त बहु भुज मुंड ।
बिनु मौलि धावत रुंड ॥
खग कंक काक सृगाल ।
कटकटहिं कठिन कराल ॥
छं॰ कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं ।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं ॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा ।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा ॥
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं ॥
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं ॥
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे ।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं ।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं ॥
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका ।
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका ॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी ।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर यो ।
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर यो ॥
दो॰ राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ २०(क) ॥

हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान ।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २०(ख) ॥

जब रघुनाथ समर रिपु जीते ।
सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥
तब लछिमन सीतहि लै आए ।
प्रभु पद परत हरषि उर लाए ।
सीता चितव स्याम मृदु गाता ।
परम प्रेम लोचन न अघाता ॥
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक ।
करत चरित सुर मुनि सुखदायक ॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा ।
जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥
बोलि बचन क्रोध करि भारी ।
देस कोस कै सुरति बिसारी ॥
करसि पान सोवसि दिनु राती ।
सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा ।
हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ ।
श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ ॥
संग ते जती कुमंत्र ते राजा ।
मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी ।
नासहि बेगि नीति अस सुनी ॥
सो॰ रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि ।
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन ॥ २१(क) ॥

दो॰ सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ ।
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ ॥ २१(ख) ॥

सुनत सभासद उठे अकुलाई ।
समुझाई गहि बाहँ उठाई ॥
कह लंकेस कहसि निज बाता ।
केँइँ तव नासा कान निपाता ॥
अवध नृपति दसरथ के जाए ।
पुरुष सिंघ बन खेलन आए ॥
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी ।
रहित निसाचर करिहहिं धरनी ॥
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन ।
अभय भए बिचरत मुनि कानन ॥
देखत बालक काल समाना ।
परम धीर धन्वी गुन नाना ॥
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता ।
खल बध रत सुर मुनि सुखदाता ॥
सोभाधाम राम अस नामा ।
तिन्ह के संग नारि एक स्यामा ॥
रुप रासि बिधि नारि सँवारी ।
रति सत कोटि तासु बलिहारी ॥
तासु अनुज काटे श्रुति नासा ।
सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा ॥
खर दूषन सुनि लगे पुकारा ।
छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा ॥
खर दूषन तिसिरा कर घाता ।
सुनि दससीस जरे सब गाता ॥
दो॰ सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति ।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति ॥ २२ ॥

सुर नर असुर नाग खग माहीं ।
मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं ॥
खर दूषन मोहि सम बलवंता ।
तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता ॥
सुर रंजन भंजन महि भारा ।
जौं भगवंत लीन्ह अवतारा ॥
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ ।
प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ॥
होइहि भजनु न तामस देहा ।
मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ॥
जौं नररुप भूपसुत कोऊ ।
हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ ॥
चला अकेल जान चढि तहवाँ ।
बस मारीच सिंधु तट जहवाँ ॥
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई ।
सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥
दो॰ लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद ।
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद ॥ २३ ॥

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला ।
मैं कछु करबि ललित नरलीला ॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा ।
जौ लगि करौं निसाचर नासा ॥
जबहिं राम सब कहा बखानी ।
प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता ।
तैसइ सील रुप सुबिनीता ॥
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना ।
जो कछु चरित रचा भगवाना ॥
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा ।
नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥
नवनि नीच कै अति दुखदाई ।
जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ॥
भयदायक खल कै प्रिय बानी ।
जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥
दो॰ करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात ।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ २४ ॥

दसमुख सकल कथा तेहि आगें ।
कही सहित अभिमान अभागें ॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी ।
जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी ॥
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा ।
ते नररुप चराचर ईसा ॥
तासों तात बयरु नहिं कीजे ।
मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥
मुनि मख राखन गयउ कुमारा ।
बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥
सत जोजन आयउँ छन माहीं ।
तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ॥
भइ मम कीट भृंग की नाई ।
जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई ॥
जौं नर तात तदपि अति सूरा ।
तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ॥
दो॰ जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड ॥
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ॥ २५ ॥

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी ।
सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा ।
कहु जग मोहि समान को जोधा ॥
तब मारीच हृदयँ अनुमाना ।
नवहि बिरोधें नहिं कल्याना ॥
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी ।
बैद बंदि कबि भानस गुनी ॥
उभय भाँति देखा निज मरना ।
तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥
उतरु देत मोहि बधब अभागें ।
कस न मरौं रघुपति सर लागें ॥
अस जियँ जानि दसानन संगा ।
चला राम पद प्रेम अभंगा ॥
मन अति हरष जनाव न तेही ।
आजु देखिहउँ परम सनेही ॥
छं॰ निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं ।
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ॥
निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी ।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥
दो॰ मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान ।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन ॥ २६ ॥

तेहि बन निकट दसानन गयऊ ।
तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई ।
कनक देह मनि रचित बनाई ॥
सीता परम रुचिर मृग देखा ।
अंग अंग सुमनोहर बेषा ॥
सुनहु देव रघुबीर कृपाला ।
एहि मृग कर अति सुंदर छाला ॥
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही ।
आनहु चर्म कहति बैदेही ॥
तब रघुपति जानत सब कारन ।
उठे हरषि सुर काजु सँवारन ॥
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा ।
करतल चाप रुचिर सर साँधा ॥
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई ।
फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥
सीता केरि करेहु रखवारी ।
बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी ।
धाए रामु सरासन साजी ॥
निगम नेति सिव ध्यान न पावा ।
मायामृग पाछें सो धावा ॥
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई ।
कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥
प्रगटत दुरत करत छल भूरी ।
एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी ॥
तब तकि राम कठिन सर मारा ।
धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा ।
पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा ॥
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा ।
सुमिरेसि रामु समेत सनेहा ॥
अंतर प्रेम तासु पहिचाना ।
मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥
दो॰ बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ ॥ २७ ॥

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा ।
सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥
आरत गिरा सुनी जब सीता ।
कह लछिमन सन परम सभीता ॥
जाहु बेगि संकट अति भ्राता ।
लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई ।
सपनेहुँ संकट परइ कि सोई ॥
मरम बचन जब सीता बोला ।
हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥
बन दिसि देव सौंपि सब काहू ।
चले जहाँ रावन ससि राहू ॥
सून बीच दसकंधर देखा ।
आवा निकट जती कें बेषा ॥
जाकें डर सुर असुर डेराहीं ।
निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ॥
सो दससीस स्वान की नाई ।
इत उत चितइ चला भड़िहाई ॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा ।
रह न तेज बुधि बल लेसा ॥
नाना बिधि करि कथा सुहाई ।
राजनीति भय प्रीति देखाई ॥
कह सीता सुनु जती गोसाईं ।
बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ॥
तब रावन निज रूप देखावा ।
भई सभय जब नाम सुनावा ॥
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा ।
आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा ।
भएसि कालबस निसिचर नाहा ॥
सुनत बचन दससीस रिसाना ।
मन महुँ चरन बंदि सुख माना ॥
दो॰ क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ॥ २८ ॥

हा जग एक बीर रघुराया ।
केहिं अपराध बिसारेहु दाया ॥
आरति हरन सरन सुखदायक ।
हा रघुकुल सरोज दिननायक ॥
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा ।
सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा ॥
बिबिध बिलाप करति बैदेही ।
भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ॥
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा ।
पुरोडास चह रासभ खावा ॥
सीता कै बिलाप सुनि भारी ।
भए चराचर जीव दुखारी ॥
गीधराज सुनि आरत बानी ।
रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ॥
अधम निसाचर लीन्हे जाई ।
जिमि मलेछ बस कपिला गाई ॥
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा ।
करिहउँ जातुधान कर नासा ॥
धावा क्रोधवंत खग कैसें ।
छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे ॥
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही ।
निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ॥
आवत देखि कृतांत समाना ।
फिरि दसकंधर कर अनुमाना ॥
की मैनाक कि खगपति होई ।
मम बल जान सहित पति सोई ॥
जाना जरठ जटायू एहा ।
मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा ॥
सुनत गीध क्रोधातुर धावा ।
कह सुनु रावन मोर सिखावा ॥
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू ।
नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ॥
राम रोष पावक अति घोरा ।
होइहि सकल सलभ कुल तोरा ॥
उतरु न देत दसानन जोधा ।
तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ॥
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा ।
सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ॥
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही ।
दंड एक भइ मुरुछा तेही ॥
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना ।
काढ़ेसि परम कराल कृपाना ॥
काटेसि पंख परा खग धरनी ।
सुमिरि राम करि अदभुत करनी ॥
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी ।
चला उताइल त्रास न थोरी ॥
करति बिलाप जाति नभ सीता ।
ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता ॥
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी ।
कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ॥
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ ।
बन असोक महँ राखत भयऊ ॥
दो॰ हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ॥ २९(क) ॥

नवान्हपारायण, छठा विश्राम जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम ।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ २९(ख) ॥

रघुपति अनुजहि आवत देखी ।
बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी ॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली ।
आयहु तात बचन मम पेली ॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं ।
मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥
गहि पद कमल अनुज कर जोरी ।
कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ ।
गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥
आश्रम देखि जानकी हीना ।
भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥
हा गुन खानि जानकी सीता ।
रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥
लछिमन समुझाए बहु भाँती ।
पूछत चले लता तरु पाँती ॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी ।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना ।
मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी ।
कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा ।
गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं ।
नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू ।
हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं।
प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी ।
मनहुँ महा बिरही अति कामी ॥
पूरनकाम राम सुख रासी ।
मनुज चरित कर अज अबिनासी ॥
आगे परा गीधपति देखा ।
सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥
दो॰ कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर ॥
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥

तब कह गीध बचन धरि धीरा।
सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही ।
तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई ।
बिलपति अति कुररी की नाई ॥
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना ।
चलन चहत अब कृपानिधाना ॥
राम कहा तनु राखहु ताता ।
मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता ॥
जा कर नाम मरत मुख आवा ।
अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा ॥
सो मम लोचन गोचर आगें ।
राखौं देह नाथ केहि खाँगेँ ॥
जल भरि नयन कहहिँ रघुराई ।
तात कर्म निज ते गतिं पाई ॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीँ ।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ ॥
तनु तजि तात जाहु मम धामा ।
देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥
दो॰ सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ ॥
जौँ मैँ राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ ॥ ३१ ॥

गीध देह तजि धरि हरि रुपा ।
भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥
स्याम गात बिसाल भुज चारी ।
अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥
छं॰ जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही ।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही ॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं ।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं ॥ १ ॥

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं ।
गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं ।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥
२ ।
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं ॥
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥
सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई ।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई ॥ ३ ॥

जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा ।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी ।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥

दो॰ अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम ।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ ३२ ॥

कोमल चित अति दीनदयाला ।
कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी ।
गति दीन्हि जो जाचत जोगी ॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी ।
हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई ।
चले बिलोकत बन बहुताई ॥
संकुल लता बिटप घन कानन ।
बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ॥
आवत पंथ कबंध निपाता ।
तेहिं सब कही साप कै बाता ॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा ।
प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही ।
मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥
दो॰ मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव ।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥ ३३ ॥

सापत ताड़त परुष कहंता ।
बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना ।
सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥
कहि निज धर्म ताहि समुझावा ।
निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई ।
गयउ गगन आपनि गति पाई ॥
ताहि देइ गति राम उदारा ।
सबरी कें आश्रम पगु धारा ॥
सबरी देखि राम गृहँ आए ।
मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला ।
जटा मुकुट सिर उर बनमाला ॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई ।
सबरी परी चरन लपटाई ॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा ।
पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ॥
सादर जल लै चरन पखारे ।
पुनि सुंदर आसन बैठारे ॥
दो॰ कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ॥ ३४ ॥

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी ।
प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ॥
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी ।
अधम जाति मैं जड़मति भारी ॥
अधम ते अधम अधम अति नारी ।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता ।
मानउँ एक भगति कर नाता ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई ।
धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा ।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं ।
सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
दो॰ गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥ ३५ ॥

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा ।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा ।
निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा ।
मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
आठवँ जथालाभ संतोषा ।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
नवम सरल सब सन छलहीना ।
मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई ।
नारि पुरुष सचराचर कोई ॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे ।
सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई ।
तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥
मम दरसन फल परम अनूपा ।
जीव पाव निज सहज सरूपा ॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी ।
जानहि कहु करिबरगामिनी ॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई ।
तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा ।
जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई ।
प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥
छं॰ कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे ।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥
दो॰ जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि ।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥ ३६ ॥

चले राम त्यागा बन सोऊ ।
अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा ।
कहत कथा अनेक संबादा ॥
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा ।
देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग मृग बृंदा ।
मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं ।
मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए ।
कंचन मृग खोजन ए आए ॥
संग लाइ करिनीं करि लेहीं ।
मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ॥
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ ।
भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥
राखिअ नारि जदपि उर माहीं ।
जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु तात बसंत सुहावा ।
प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥
दो॰ बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल ।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ ३७(क) ॥

देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात ।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ ३७(ख) ॥

बिटप बिसाल लता अरुझानी ।
बिबिध बितान दिए जनु तानी ॥
कदलि ताल बर धुजा पताका ।
दैखि न मोह धीर मन जाका ॥
बिबिध भाँति फूले तरु नाना ।
जनु बानैत बने बहु बाना ॥
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए ।
जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ॥
कूजत पिक मानहुँ गज माते ।
ढेक महोख ऊँट बिसराते ॥
मोर चकोर कीर बर बाजी ।
पारावत मराल सब ताजी ॥
तीतिर लावक पदचर जूथा ।
बरनि न जाइ मनोज बरुथा ॥
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना ।
चातक बंदी गुन गन बरना ॥
मधुकर मुखर भेरि सहनाई ।
त्रिबिध बयारि बसीठीं आई ॥
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें ।
बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें ॥
लछिमन देखत काम अनीका ।
रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका ॥
एहि कें एक परम बल नारी ।
तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी ॥
दो॰ तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥ ३८(क) ॥

लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि ।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥ ३८(ख) ॥

गुनातीत सचराचर स्वामी ।
राम उमा सब अंतरजामी ॥
कामिन्ह कै दीनता देखाई ।
धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया ।
छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला ।
जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना ।
सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा ।
पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
संत हृदय जस निर्मल बारी ।
बाँधे घाट मनोहर चारी ॥
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा ।
जनु उदार गृह जाचक भीरा ॥
दो॰ पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म ।
मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥ ३९(क) ॥

सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं ।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं ॥ ३९(ख) ॥

बिकसे सरसिज नाना रंगा ।
मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा ॥
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा ।
प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा ॥
चक्रवाक बक खग समुदाई ।
देखत बनइ बरनि नहिं जाई ॥
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई ।
जात पथिक जनु लेत बोलाई ॥
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए ।
चहु दिसि कानन बिटप सुहाए ॥
चंपक बकुल कदंब तमाला ।
पाटल पनस परास रसाला ॥
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना ।
चंचरीक पटली कर गाना ॥
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ ।
संतत बहइ मनोहर बाऊ ॥
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं ।
सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं ॥
दो॰ फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ ॥ ४० ॥

देखि राम अति रुचिर तलावा ।
मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ॥
देखी सुंदर तरुबर छाया ।
बैठे अनुज सहित रघुराया ॥
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए ।
अस्तुति करि निज धाम सिधाए ॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला ।
कहत अनुज सन कथा रसाला ॥
बिरहवंत भगवंतहि देखी ।
नारद मन भा सोच बिसेषी ॥
मोर साप करि अंगीकारा ।
सहत राम नाना दुख भारा ॥
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई ।
पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥
यह बिचारि नारद कर बीना ।
गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥
गावत राम चरित मृदु बानी ।
प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥
करत दंडवत लिए उठाई ।
राखे बहुत बार उर लाई ॥
स्वागत पूँछि निकट बैठारे ।
लछिमन सादर चरन पखारे ॥
दो॰ नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ ४१ ॥

सुनहु उदार सहज रघुनायक ।
सुंदर अगम सुगम बर दायक ॥
देहु एक बर मागउँ स्वामी ।
जद्यपि जानत अंतरजामी ॥
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ ।
जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी ।
जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें ।
अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥
तब नारद बोले हरषाई।
अस बर मागउँ करउँ ढिठाई ॥
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका ।
श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥
राम सकल नामन्ह ते अधिका ।
होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥
दो॰ राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम ।
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम ॥ ४२(क) ॥

एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ ॥ ४२(ख) ॥

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी ।
पुनि नारद बोले मृदु बानी ॥
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया ।
मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ॥
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा ।
प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा ।
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी ।
जिमि बालक राखइ महतारी ॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई ।
तहँ राखइ जननी अरगाई ॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता ।
प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी ।
बालक सुत सम दास अमानी ॥
जनहि मोर बल निज बल ताही ।
दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं ।
पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥
दो॰ काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि ।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥ ४३ ॥

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता ।
मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता ॥
जप तप नेम जलाश्रय झारी ।
होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी ॥
काम क्रोध मद मत्सर भेका ।
इन्हहि हरषप्रद बरषा एका ॥
दुर्बासना कुमुद समुदाई ।
तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई ॥
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा ।
होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा ॥
पुनि ममता जवास बहुताई ।
पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई ॥
पाप उलूक निकर सुखकारी ।
नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ॥
बुधि बल सील सत्य सब मीना ।
बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ॥
दो॰ अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि ।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ॥ ४४ ॥

सुनि रघुपति के बचन सुहाए ।
मुनि तन पुलक नयन भरि आए ॥
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती ।
सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी ।
ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥
पुनि सादर बोले मुनि नारद ।
सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा ।
कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ ।
जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥
षट बिकार जित अनघ अकामा ।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
अमितबोध अनीह मितभोगी ।
सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥
सावधान मानद मदहीना ।
धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥
दो॰ गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह ॥
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह ॥ ४५ ॥

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं ।
पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती ।
सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती ॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा ।
गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया ।
मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना ।
बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ ।
भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला ।
हेतु रहित परहित रत सीला ॥
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते ।
कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ॥
छं॰ कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे ।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ॥
सिरु नाह बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए ॥
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए ॥
दो॰ रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग ।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥ ४६(क) ॥

दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥
४६(ख) ॥

मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीयः सोपानः समाप्तः.

(अरण्यकाण्ड समाप्त)

किष्किन्धाकाण्ड

श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस चतुर्थ सोपान ( किष्किन्धाकाण्ड)

श्लोक कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ, मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः || १ ||
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा, संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम || २ ||


सो -
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ||
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय, तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस ||
आगें चले बहुरि रघुराया, रिष्यमूक परवत निअराया ||
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा, आवत देखि अतुल बल सींवा ||
अति सभीत कह सुनु हनुमाना, पुरुष जुगल बल रूप निधाना ||
धरि बटु रूप देखु तैं जाई, कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई ||
पठए बालि होहिं मन मैला, भागौं तुरत तजौं यह सैला ||
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ, माथ नाइ पूछत अस भयऊ ||
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा, छत्री रूप फिरहु बन बीरा ||
कठिन भूमि कोमल पद गामी, कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी ||
मृदुल मनोहर सुंदर गाता, सहत दुसह बन आतप बाता ||
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ, नर नारायन की तुम्ह दोऊ ||

दो -
जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार, की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार ||
१ ||
कोसलेस दसरथ के जाए , हम पितु बचन मानि बन आए ||
नाम राम लछिमन दौउ भाई, संग नारि सुकुमारि सुहाई ||
इहाँ हरि निसिचर बैदेही, बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही ||
आपन चरित कहा हम गाई, कहहु बिप्र निज कथा बुझाई ||
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना, सो सुख उमा नहिं बरना ||
पुलकित तन मुख आव न बचना, देखत रुचिर बेष कै रचना ||
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही, हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही ||
मोर न्याउ मैं पूछा साईं, तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं ||
तव माया बस फिरउँ भुलाना, ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ||

दो -
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान, पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान ||
२ ||
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें, सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ||
नाथ जीव तव मायाँ मोहा, सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ||
ता पर मैं रघुबीर दोहाई, जानउँ नहिं कछु भजन उपाई ||
सेवक सुत पति मातु भरोसें, रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ||
अस कहि परेउ चरन अकुलाई, निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई ||
तब रघुपति उठाइ उर लावा, निज लोचन जल सींचि जुड़ावा ||
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना, तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ||
समदरसी मोहि कह सब कोऊ, सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ ||

दो -
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत, मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ||
३ ||
देखि पवन सुत पति अनुकूला, हृदयँ हरष बीती सब सूला ||
नाथ सैल पर कपिपति रहई, सो सुग्रीव दास तव अहई ||
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे, दीन जानि तेहि अभय करीजे ||
सो सीता कर खोज कराइहि, जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि ||
एहि बिधि सकल कथा समुझाई, लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई ||
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा, अतिसय जन्म धन्य करि लेखा ||
सादर मिलेउ नाइ पद माथा, भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा ||
कपि कर मन बिचार एहि रीती, करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती ||

दो -
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ ||
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ ||
४ ||
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा, लछमिन राम चरित सब भाषा ||
कह सुग्रीव नयन भरि बारी, मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी ||
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा, बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा ||
गगन पंथ देखी मैं जाता, परबस परी बहुत बिलपाता ||
राम राम हा राम पुकारी, हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ||
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा, पट उर लाइ सोच अति कीन्हा ||
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा, तजहु सोच मन आनहु धीरा ||
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई, जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई ||

दो -
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव, कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ||
५ ||
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई, प्रीति रही कछु बरनि न जाई ||
मय सुत मायावी तेहि नाऊँ, आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ ||
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा, बाली रिपु बल सहै न पारा ||
धावा बालि देखि सो भागा, मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा ||
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई, तब बालीं मोहि कहा बुझाई ||
परिखेसु मोहि एक पखवारा, नहिं आवौं तब जानेसु मारा ||
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी, निसरी रुधिर धार तहँ भारी ||
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई, सिला देइ तहँ चलेउँ पराई ||
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं, दीन्हेउ मोहि राज बरिआई ||
बालि ताहि मारि गृह आवा, देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा ||
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी, हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी ||
ताकें भय रघुबीर कृपाला, सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला ||
इहाँ साप बस आवत नाहीं, तदपि सभीत रहउँ मन माहीँ ||
सुनि सेवक दुख दीनदयाला, फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला ||

दो -
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान, ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ||
६ ||
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ||
निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना ||
जिन्ह कें असि मति सहज न आई, ते सठ कत हठि करत मिताई ||
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा ||
देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई ||
बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ||
आगें कह मृदु बचन बनाई, पाछें अनहित मन कुटिलाई ||
जा कर चित अहि गति सम भाई, अस कुमित्र परिहरेहि भलाई ||
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी, कपटी मित्र सूल सम चारी ||
सखा सोच त्यागहु बल मोरें, सब बिधि घटब काज मैं तोरें ||
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा, बालि महाबल अति रनधीरा ||
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए, बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए ||
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती, बालि बधब इन्ह भइ परतीती ||
बार बार नावइ पद सीसा, प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा ||
उपजा ग्यान बचन तब बोला, नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ||
सुख संपति परिवार बड़ाई, सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ||
ए सब रामभगति के बाधक, कहहिं संत तब पद अवराधक ||
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं, माया कृत परमारथ नाहीं ||
बालि परम हित जासु प्रसादा, मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ||
सपनें जेहि सन होइ लराई, जागें समुझत मन सकुचाई ||
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती, सब तजि भजनु करौं दिन राती ||
सुनि बिराग संजुत कपि बानी, बोले बिहँसि रामु धनुपानी ||
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई, सखा बचन मम मृषा न होई ||
नट मरकट इव सबहि नचावत, रामु खगेस बेद अस गावत ||
लै सुग्रीव संग रघुनाथा, चले चाप सायक गहि हाथा ||
तब रघुपति सुग्रीव पठावा, गर्जेसि जाइ निकट बल पावा ||
सुनत बालि क्रोधातुर धावा, गहि कर चरन नारि समुझावा ||
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा, ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा ||
कोसलेस सुत लछिमन रामा, कालहु जीति सकहिं संग्रामा ||

दो -
कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ, जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ ||
७ ||
अस कहि चला महा अभिमानी, तृन समान सुग्रीवहि जानी ||
भिरे उभौ बाली अति तर्जा , मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ||
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा, मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा ||
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला, बंधु न होइ मोर यह काला ||
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ, तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ ||
कर परसा सुग्रीव सरीरा, तनु भा कुलिस गई सब पीरा ||
मेली कंठ सुमन कै माला, पठवा पुनि बल देइ बिसाला ||
पुनि नाना बिधि भई लराई, बिटप ओट देखहिं रघुराई ||

दो -
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि, मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि ||
८ ||
परा बिकल महि सर के लागें, पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें ||
स्याम गात सिर जटा बनाएँ, अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ ||
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा, सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ||
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा, बोला चितइ राम की ओरा ||
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई, मारेहु मोहि ब्याध की नाई ||
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा, अवगुन कबन नाथ मोहि मारा ||
अनुज बधू भगिनी सुत नारी, सुनु सठ कन्या सम ए चारी ||
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई, ताहि बधें कछु पाप न होई ||
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना, नारि सिखावन करसि न काना ||
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी, मारा चहसि अधम अभिमानी ||

दो -
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि, प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि ||
९ ||
सुनत राम अति कोमल बानी, बालि सीस परसेउ निज पानी ||
अचल करौं तनु राखहु प्राना, बालि कहा सुनु कृपानिधाना ||
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं, अंत राम कहि आवत नाहीं ||
जासु नाम बल संकर कासी, देत सबहि सम गति अविनासी ||
मम लोचन गोचर सोइ आवा, बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ||
छं -
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं, जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं ||
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही, अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही ||
१ ||
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ, जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ ||
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ, गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ ||
२ ||

दो -
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग, सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ||
१० ||
राम बालि निज धाम पठावा, नगर लोग सब ब्याकुल धावा ||
नाना बिधि बिलाप कर तारा, छूटे केस न देह सँभारा ||
तारा बिकल देखि रघुराया , दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ||
छिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा ||
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा, जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ||
उपजा ग्यान चरन तब लागी, लीन्हेसि परम भगति बर मागी ||
उमा दारु जोषित की नाई, सबहि नचावत रामु गोसाई ||
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा, मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा ||
राम कहा अनुजहि समुझाई, राज देहु सुग्रीवहि जाई ||
रघुपति चरन नाइ करि माथा, चले सकल प्रेरित रघुनाथा ||

दो -
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज, राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज ||
११ ||
उमा राम सम हित जग माहीं, गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ||
सुर नर मुनि सब कै यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ||
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती, तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती ||
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ, अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ ||
जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं, काहे न बिपति जाल नर परहीं ||
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई, बहु प्रकार नृपनीति सिखाई ||
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा, पुर न जाउँ दस चारि बरीसा ||
गत ग्रीषम बरषा रितु आई, रहिहउँ निकट सैल पर छाई ||
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू, संतत हृदय धरेहु मम काजू ||
जब सुग्रीव भवन फिरि आए, रामु प्रबरषन गिरि पर छाए ||

दो -
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ, राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ ||
१२ ||
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा, गुंजत मधुप निकर मधु लोभा ||
कंद मूल फल पत्र सुहाए, भए बहुत जब ते प्रभु आए ||
देखि मनोहर सैल अनूपा, रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा ||
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा, करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा ||
मंगलरुप भयउ बन तब ते , कीन्ह निवास रमापति जब ते ||
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई, सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई ||
कहत अनुज सन कथा अनेका, भगति बिरति नृपनीति बिबेका ||
बरषा काल मेघ नभ छाए, गरजत लागत परम सुहाए ||

दो -
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि, गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि ||
१३ ||
घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा ||
दामिनि दमक रह न घन माहीं, खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ||
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ, जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ||
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें , खल के बचन संत सह जैसें ||
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई, जस थोरेहुँ धन खल इतराई ||
भूमि परत भा ढाबर पानी, जनु जीवहि माया लपटानी ||
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा, जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा ||
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई, होई अचल जिमि जिव हरि पाई ||

दो -
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ, जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ||
१४ ||
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई, बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई ||
नव पल्लव भए बिटप अनेका, साधक मन जस मिलें बिबेका ||
अर्क जबास पात बिनु भयऊ, जस सुराज खल उद्यम गयऊ ||
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी, करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ||
ससि संपन्न सोह महि कैसी, उपकारी कै संपति जैसी ||
निसि तम घन खद्योत बिराजा, जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा ||
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं , जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ||
कृषी निरावहिं चतुर किसाना, जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ||
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं, कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ||
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा, जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ||
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा, प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ||
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना, जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना ||

दो -
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं, जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ||
१५(क) ||
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग, बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ||
१५(ख) ||
बरषा बिगत सरद रितु आई, लछिमन देखहु परम सुहाई ||
फूलें कास सकल महि छाई, जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ||
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा, जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ||
सरिता सर निर्मल जल सोहा, संत हृदय जस गत मद मोहा ||
रस रस सूख सरित सर पानी, ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी ||
जानि सरद रितु खंजन आए, पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए ||
पंक न रेनु सोह असि धरनी, नीति निपुन नृप कै जसि करनी ||
जल संकोच बिकल भइँ मीना, अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना ||
बिनु धन निर्मल सोह अकासा, हरिजन इव परिहरि सब आसा ||
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी, कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ||

दो -
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि, जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि ||
१६ ||
सुखी मीन जे नीर अगाधा, जिमि हरि सरन न एकउ बाधा ||
फूलें कमल सोह सर कैसा, निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा ||
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा, सुंदर खग रव नाना रूपा ||
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी, जिमि दुर्जन पर संपति देखी ||
चातक रटत तृषा अति ओही, जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ||
सरदातप निसि ससि अपहरई, संत दरस जिमि पातक टरई ||
देखि इंदु चकोर समुदाई, चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई ||
मसक दंस बीते हिम त्रासा, जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा ||

दो -
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ, सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ||
१७ ||
बरषा गत निर्मल रितु आई, सुधि न तात सीता कै पाई ||
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं, कालहु जीत निमिष महुँ आनौं ||
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई, तात जतन करि आनेउँ सोई ||
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी, पावा राज कोस पुर नारी ||
जेहिं सायक मारा मैं बाली, तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली ||
जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा, ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ||
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी, जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी ||
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना, धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना ||

दो -
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव ||
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ||
१८ ||
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा, राम काजु सुग्रीवँ बिसारा ||
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा, चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा ||
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना, बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना ||
अब मारुतसुत दूत समूहा, पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा ||
कहहु पाख महुँ आव न जोई, मोरें कर ता कर बध होई ||
तब हनुमंत बोलाए दूता, सब कर करि सनमान बहूता ||
भय अरु प्रीति नीति देखाई, चले सकल चरनन्हि सिर नाई ||
एहि अवसर लछिमन पुर आए, क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए ||

दो -
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार, ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार ||
१९ ||
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही, लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही ||
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना, कह कपीस अति भयँ अकुलाना ||
सुनु हनुमंत संग लै तारा, करि बिनती समुझाउ कुमारा ||
तारा सहित जाइ हनुमाना, चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना ||
करि बिनती मंदिर लै आए, चरन पखारि पलँग बैठाए ||
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा, गहि भुज लछिमन कंठ लगावा ||
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं, मुनि मन मोह करइ छन माहीं ||
सुनत बिनीत बचन सुख पावा, लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा ||
पवन तनय सब कथा सुनाई, जेहि बिधि गए दूत समुदाई ||

दो -
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ, रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ ||
२० ||
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी, नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी ||
अतिसय प्रबल देव तब माया, छूटइ राम करहु जौं दाया ||
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी, मैं पावँर पसु कपि अति कामी ||
नारि नयन सर जाहि न लागा, घोर क्रोध तम निसि जो जागा ||
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया, सो नर तुम्ह समान रघुराया ||
यह गुन साधन तें नहिं होई, तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ||
तब रघुपति बोले मुसकाई, तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ||
अब सोइ जतनु करहु मन लाई, जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई ||

दो -
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ, नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ ||
२१ ||
बानर कटक उमा में देखा, सो मूरुख जो करन चह लेखा ||
आइ राम पद नावहिं माथा, निरखि बदनु सब होहिं सनाथा ||
अस कपि एक न सेना माहीं, राम कुसल जेहि पूछी नाहीं ||
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई, बिस्वरूप ब्यापक रघुराई ||
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई, कह सुग्रीव सबहि समुझाई ||
राम काजु अरु मोर निहोरा, बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ||
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई, मास दिवस महँ आएहु भाई ||
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ, आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ ||

दो -
बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत , तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत ||
२२ ||
सुनहु नील अंगद हनुमाना, जामवंत मतिधीर सुजाना ||
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू, सीता सुधि पूँछेउ सब काहू ||
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु, रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ||
भानु पीठि सेइअ उर आगी, स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ||
तजि माया सेइअ परलोका, मिटहिं सकल भव संभव सोका ||
देह धरे कर यह फलु भाई, भजिअ राम सब काम बिहाई ||
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी , जो रघुबीर चरन अनुरागी ||
आयसु मागि चरन सिरु नाई, चले हरषि सुमिरत रघुराई ||
पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावा ||
परसा सीस सरोरुह पानी, करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ||
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु, कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ||
हनुमत जन्म सुफल करि माना, चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ||
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता, राजनीति राखत सुरत्राता ||

दो -
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह, राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह ||
२३ ||
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा, प्रान लेहिं एक एक चपेटा ||
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं, कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं ||
लागि तृषा अतिसय अकुलाने, मिलइ न जल घन गहन भुलाने ||
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना, मरन चहत सब बिनु जल पाना ||
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा, भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा ||
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं, बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ||
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा, सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा ||
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा, पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ||

दो -
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज, मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज ||
२४ ||
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा, पूछें निज बृत्तांत सुनावा ||
तेहिं तब कहा करहु जल पाना, खाहु सुरस सुंदर फल नाना ||
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए, तासु निकट पुनि सब चलि आए ||
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई, मैं अब जाब जहाँ रघुराई ||
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू, पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ||
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा, ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा ||
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा, जाइ कमल पद नाएसि माथा ||
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही, अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ||

दो -
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस , उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस ||
२५ ||
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं, बीती अवधि काज कछु नाहीं ||
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता, बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता ||
कह अंगद लोचन भरि बारी, दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ||
इहाँ न सुधि सीता कै पाई, उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ||
पिता बधे पर मारत मोही, राखा राम निहोर न ओही ||
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं, मरन भयउ कछु संसय नाहीं ||
अंगद बचन सुनत कपि बीरा, बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ||
छन एक सोच मगन होइ रहे, पुनि अस वचन कहत सब भए ||
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना, नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना ||
अस कहि लवन सिंधु तट जाई, बैठे कपि सब दर्भ डसाई ||
जामवंत अंगद दुख देखी, कहिं कथा उपदेस बिसेषी ||
तात राम कहुँ नर जनि मानहु, निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु ||

दो -
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि, सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ||
२६ ||
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती ||
बाहेर होइ देखि बहु कीसा, मोहि अहार दीन्ह जगदीसा ||
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ, दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ ||
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा, आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा ||
डरपे गीध बचन सुनि काना, अब भा मरन सत्य हम जाना ||
कपि सब उठे गीध कहँ देखी, जामवंत मन सोच बिसेषी ||
कह अंगद बिचारि मन माहीं, धन्य जटायू सम कोउ नाहीं ||
राम काज कारन तनु त्यागी , हरि पुर गयउ परम बड़ भागी ||
सुनि खग हरष सोक जुत बानी , आवा निकट कपिन्ह भय मानी ||
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई, कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ||
सुनि संपाति बंधु कै करनी, रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी ||

दो -
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि , बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ||
२७ ||
अनुज क्रिया करि सागर तीरा, कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ||
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई , गगन गए रबि निकट उडाई ||
तेज न सहि सक सो फिरि आवा , मै अभिमानी रबि निअरावा ||
जरे पंख अति तेज अपारा , परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ||
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही, लागी दया देखी करि मोही ||
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा , देहि जनित अभिमानी छड़ावा ||
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही, तासु नारि निसिचर पति हरिही ||
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता, तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ||
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता , तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ||
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू , सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ||
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका , तहँ रह रावन सहज असंका ||
तहँ असोक उपबन जहँ रहई ||
सीता बैठि सोच रत अहई ||

दो -
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार ||
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार ||
२८ ||
जो नाघइ सत जोजन सागर , करइ सो राम काज मति आगर ||
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा , राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ||
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं, अति अपार भवसागर तरहीं ||
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई, राम हृदयँ धरि करहु उपाई ||
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ, तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ||
निज निज बल सब काहूँ भाषा, पार जाइ कर संसय राखा ||
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा, नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ||
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी, तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ||

दो -
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई, उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ ||
२९ ||
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा, जियँ संसय कछु फिरती बारा ||
जामवंत कह तुम्ह सब लायक, पठइअ किमि सब ही कर नायक ||
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना, का चुप साधि रहेहु बलवाना ||
पवन तनय बल पवन समाना, बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ||
कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ||
राम काज लगि तब अवतारा, सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ||
कनक बरन तन तेज बिराजा, मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा ||
सिंहनाद करि बारहिं बारा, लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा ||
सहित सहाय रावनहि मारी, आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ||
जामवंत मैं पूँछउँ तोही, उचित सिखावनु दीजहु मोही ||
एतना करहु तात तुम्ह जाई, सीतहि देखि कहहु सुधि आई ||
तब निज भुज बल राजिव नैना, कौतुक लागि संग कपि सेना ||
छं -
\-कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं, त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं ||
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई, रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई ||

दो -
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि, तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि ||
३०(क) ||
सो -
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक, सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक ||
३०(ख) ||


मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम \-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-\-

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थ सोपानः समाप्तः, (किष्किन्धाकाण्ड समाप्त)

सुन्दरकाण्ड

॥ अथ तुलसीदास कृत रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड ॥

श्रीगणेशाय नमः

श्रीजानकीवल्लभोविजयते

श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड

श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ॥ १ ॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

जामवंत के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ।
सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥ १ ॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी ।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥
यह कह नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥ २ ॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥
बार बार रघुबीर सँभारी ।
तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥ ३ ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता ।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना ।
एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥ ४ ॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥ ५ ॥

दोहा
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ॥ १ ॥

जात पवनसुत देवन्ह देखा ।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता ।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥ १ ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा ।
सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं ।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥ २ ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई ।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना ।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥ ३ ॥
जोजन भरि तिहिं बदनु पसारा ।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥ ४ ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा ।
तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा ।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥ ५ ॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा ।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा ।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥ ६ ॥

दोहा
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ २ ॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई ॥ करि माया नभु के खग गहई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं ।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥ १ ॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई ।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा ।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥ २ ॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा ।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा ।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥ ३ ॥
नाना तरु फल फूल सुहाए ।
खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें ।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥ ४ ॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई ॥ प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहि देखी ।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥ ५ ॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा ।
कनक कोटि कर परम प्रकासा ॥ ६ ॥

छंद
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना ।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै ।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ १ ॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥ २ ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ ३ ॥

दोहा
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ॥ ३ ॥

मसक समान रूप कपि धरी ।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी ।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥ १ ॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी ।
रुधिर बमत धरनीं डनमनी ॥ २ ॥
पुनि संभारि उठी सो लंका ।
जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥
जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे ।
तब जानेसु निसिचर संघारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता ॥ ४ ॥

दोहा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा ।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई ।
गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥ १ ॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही ।
राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना ।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥ २ ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा ।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
गयउ दसानान मंदिर माहीं ।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥ ३ ॥
सयन किएँ देखा कपि तेही ।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा ।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥ ४ ॥

दोहा
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ॥ ५ ॥

लंका निसिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा ।
तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥ १ ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी ।
साधु ते होइ न कारज हानी ॥ २ ॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए ।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई ।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥ ३ ॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई ।
मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी ।
आयहु मोहि करन बड़भागी ॥ ४ ॥

दोहा
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ ६ ॥

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी ।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा ।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥ १ ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं ।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता ।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ॥ २ ॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा ।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती ।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥ ३ ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना ।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा ।
तेहि दिन ताहि न मिले अहारा ॥ ४ ॥

दोहा
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ ७ ॥

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी ।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा ।
पावा अनिर्बाच्य विश्रामा ॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही ।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता ।
देखी चलेउँ जानकी माता ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई ।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ ।
बन असोक सीता रह जहवाँ ॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा ।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी ।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥

दोहा
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई ।
करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा ।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा ।
साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी ।
मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥
तव अनुचरीं करेउँ पन मोरा ।
एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही ।
सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥ ३ ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा ।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझु कहति जानकी ।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥ ४ ॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही ।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥ ५ ॥

दोहा
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥

सीता तैं मम कृत अपमाना ।
कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी ।
सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥ १ ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर ।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंदर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा ।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥ २ ॥
चंद्रहास हरु मम परितापं ।
रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा ।
कह सीता हरु मम दुख भारा ॥ ३ ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा ।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई ।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥ ४ ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना ।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥ ५ ॥

दोहा
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥

त्रिजटा नाम राच्छसी एका ।
राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना ।
सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥ १ ॥
सपनें बानर लंका जारी ।
जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा ।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥ २ ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई ।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई ।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥ ३ ॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी ।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं ।
जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥ ४ ॥

दोहा
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ ११ ॥

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी ।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई ।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥ १ ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई ।
मातु अनल पुनि देहु लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी ।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥ २ ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि ।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी ।
अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥ ३ ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला ।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा ।
अवनि न आवत एकउ तारा ॥ ४ ॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी ।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका ।
सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥ ५ ॥
नूतन किसलय अनल समाना ।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥ ६ ॥

दोहा
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥

तब देखी मुद्रिका मनोहर ।
राम नाम अंकित अति सुंदर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी ।
हरष विषाद हृदयँ अकुलानी ॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई ।
माया तें असि रचि नहिं जाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना ।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥ २ ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा ।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई ।
आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥ ३ ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई ।
कही सो प्रगट होति किन भाई ॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥ ४ ॥
राम दूत मैं मातु जानकी ।
सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी ।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥ ५ ॥
नर बानरहि संग कहु कैसें ।
कही कथा भई संगति जैसें ॥ ६ ॥

दोहा
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥ १३ ॥

हरिजन हानि प्रीति अति गाढ़ी ।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना ।
भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥ १ ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी ।
अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई ।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥ २ ॥
सहज बानि सेवक सुख दायक ।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता ।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥ ३ ॥
बचनु न आव नयन भरे बारी ।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥ ४ ॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता ।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना ।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥ ५ ॥

दोहा
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर ।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ॥ १४ ॥

कहेउ राम बियोग तव सीता ।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू ।
कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥ १ ॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा ।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा ।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥ २ ॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई ।
काहि कहौं यह जान न कोई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥ ३ ॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं ।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही ।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥ ४ ॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता ।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई ।
सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥ ५ ॥

दोहा
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु ।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ १५ ॥

जौं रघुबीर होति सुधि पाई ।
करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥
राम बान रबि उएँ जानकी ।
तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥ १ ॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई ।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा ।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं ।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना ।
जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
मोरें हृदय परम संदेहा ।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा ।
समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
सीता मन भरोस तब भयऊ ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥ ५ ॥

दोहा
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल ।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ॥ १६ ॥

मन संतोष सुनत कपि बानी ।
भगति प्रताप तेज बल सानी ॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना ।
होहु तात बल सील निधाना ॥ १ ॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू ।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना ।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥ २ ॥
बार बार नाएसि पद सीसा ।
बोला बचन जोरि कर कीसा ॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥ ३ ॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा ।
लागि देखि सुंदर फल रूखा ॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी ।
परम सुभट रजनीचर भारी ॥ ४ ॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं ।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ॥ ५ ॥

दोहा
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु ।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ १७ ॥

चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा ।
फल खाएसि तरु तौरैं लागा ॥
रहे तहां बहु भट रखवारे ।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥ १ ॥
नाथ एक आवा कपि भारी ।
तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे ।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥ २ ॥
सुनि रावन पठए भट नाना ।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥
सब रजनीचर कपि संघारे ।
गए पुकारत कछु अधमारे ॥ ३ ॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा ।
चला संग लै सुभट अपारा ॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा ।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥ ४ ॥

दोहा
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि ।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ १८ ॥

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना ।
पठएसि मेघनाद बलवाना ॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही ।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥ १ ॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा ।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥
कपि देखा दारुन भट आवा ।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥ २ ॥
अति बिसाल तरु एक उपारा ।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ॥
रहे महाभट ताके संगा ।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ॥ ३ ॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा ।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई ।
ताहि एक छन मुरुछा आई ॥ ४ ॥
उठि बहोरि कीन्हसि बहु माया ।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥ ५ ॥

दोहा
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार ।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥ १९ ॥

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा ।
परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ ।
नागपास बांधेसि लै गयउ ॥ १ ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी ।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा ।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥ २ ॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए ।
कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई ।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥ ३ ॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता ।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन संका ।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥ ४ ॥

दोहा
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद ।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ २० ॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा ।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही ।
देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ १ ॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा ।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया ।
पाइ जासु बल बिरचित माया ॥ २ ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा ।
पालत सृजत हरत दससीसा ॥
जा बल सीस धरत सहसानन ।
अंडकोस समेत गिरि कानन ॥ ३ ॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता ।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा ।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥ ४ ॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली ।
बधे सकल अतुलित बलसाली ॥ ५ ॥

दोहा
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥ २१ ॥

जानेउ मैं तुम्हारि प्रभुताई ।
सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा ।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥ १ ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा ।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी ।
मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥ २ ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे ।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा ।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥ ३ ॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन ।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी ।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥ ४ ॥
जाकें डर अति काल डेराई ।
जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै ।
मोरे कहें जानकी दीजै ॥ ५ ॥

दोहा
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥ २२ ॥

राम चरन पंकज उर धरहू ।
लंकाँ अचल राज तुम्ह करहू ॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका ।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥ १ ॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा ।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी ।
सब भूषन भूषित बर नारी ॥ २ ॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई ।
जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं ।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं ॥ ३ ॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी ।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही ।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥ ४ ॥

दोहा
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥ २३ ॥

जदपि कही कपि अति हित बानी ।
भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥
बोला बिहसि महा अभिमानी ।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥ १ ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही ।
लागेसि अधम सिखावन मोही ॥
उलटा होइहि कह हनुमाना ।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥ २ ॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना ।
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ॥
सुनत निसाचर मारन धाए ।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ॥ ३ ॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता ।
नीति बिरोधा न मारिअ दूता ॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई ।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई ॥ ४ ॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर ।
अंग भंग करि पठइअ बंदर ॥ ५ ॥

दोहा
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥ २४ ॥

पूँछ हीन बानर तहँ जाइहि ।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई ।
देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥ १ ॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना ।
भइ सहाय सारद मैं जाना ॥
जातुधान सुनि रावन बचना ।
लागे रचें मूढ़ सोइ रचना ॥ २ ॥
रहा न नगर बसन घृत तेला ।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी ।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥ ३ ॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी ।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥
पावक जरत देखि हनुमंता ।
भयउ परम लघुरूप तुरंता ॥ ४ ॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं ।
भइँ सभीत निसाचर नारीं ॥ ५ ॥

दोहा
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ॥ २५ ॥

देह बिसाल परम हरुआई ।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला ।
झपट लपट बहु कोटि कराला ॥ १ ॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा ।
एहिं अवसर को हमहि उबारा ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई ।
बानर रूप धरें सुर कोई ॥ २ ॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा ।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥
जारा नगर निमिष एक माहीं ।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं ॥ ३ ॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा ।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥
उलटि पलटि लंका सब जारी ।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥ ४ ॥

दोहा
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥ २६ ॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा ।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥ १ ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा ।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥
दीन दयाल बिरिदु सँभारी ।
हरहु नाथ मम संकट भारी ॥ २ ॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु ।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥
मास दिवस महुँ नाथ न आवा ।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥ ३ ॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना ।
तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती ।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥ ४ ॥

दोहा
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह ।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ २७ ॥

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी ।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा ।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा ॥ १ ॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना ।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा ।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा ॥ २ ॥
मिले सकल अति भए सुखारी ।
तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥
चले हरषि रघुनायक पासा ।
पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥ ३ ॥
तब मधुबन भीतर सब आए ।
अंगद संमत मधु फल खाए ॥
रखवारे जब बरजन लागे मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥ ४ ॥

दोहा
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज ।
सुन सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ २८ ॥

जौं न होति सीता सुधि पाई ।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा ।
आइ गए कपि सहित समाजा ॥ १ ॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा ।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी ।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥ २ ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना ।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ ।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ॥ ३ ॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा ।
किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई ।
परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥ ४ ॥

दोहा
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज ।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥ २९॥

जामवंत कह सुनु रघुराया ।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर ।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥ १ ॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर ।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू ।
जन्म हमार सुफल भा आजू ॥ २ ॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी ।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवनतनय के चरित सुहाए ।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥ ३ ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए ।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी ।
रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥ ४ ॥

दोहा
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥ ३० ॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही ।
रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी ।
बचन कहे कछु जनककुमारी ॥ १ ॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना ।
दीन बंधु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी ।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी ॥ २॥
अवगुन एक मोर मैं माना ।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा ।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ ३ ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा ।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी ।
जरैं न पाव देह बिरहागी ॥ ४ ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला ।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ ५ ॥

दोहा
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति ।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ ३१ ॥

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना ।
भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन कायँ मन मम गति जाही ।
सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ १ ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई ।
जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की ।
रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ २ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी ।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ॥
प्रति उपकार करौं का तोरा ।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ ३ ॥
सुनु सत तोहि उरिन मैं नाहीं ।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता ।
लोचन नीर पुलक अति गाता ॥ ४ ॥

दोहा
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत ।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ॥ ३२ ॥

बार बार प्रभु चहइ उठावा ।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा ।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥ १ ॥
सावधान मन करि पुनि संकर ।
लागे कहन कथा अति सुंदर ॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा ।
कर गहि परम निकट बैठावा ॥ २ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका ।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना ।
बोला बचन बिगत हनुमाना ॥ ३ ॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई ।
साखा तें साखा पर जाई ॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा ।
निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा ॥ ४ ॥
सो सब तव प्रताप रघुराई ।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥ ५ ॥

दोहा
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल ।
तव प्रभावँ वड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल ॥ ३३ ॥

नाथ भगति अति सुखदायनी ।
देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी ।
एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥ १ ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना ।
ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥
यह संबाद जासु उर आवा ।
रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥ २ ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा ।
जय जय जय कृपाल सुखकंदा ॥
तब रघुपति कपिपतिहिं बोलावा ।
कहा चलैं कर करहु बनावा ॥ ३ ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे ।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी ।
नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥ ४ ॥

दोहा
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ ३४ ॥

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा ।
गर्जहिं भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सेना ।
चितइ कृपा करि राजिव नैना ॥ १ ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा ।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना ।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना ॥ २ ॥
जासु सकल मंगलमय कीती ।
तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं ।
फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥ ३ ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई ।
असगुन भयउ रावनहि सोई ॥
चला कटकु को बरनैं पारा ।
गर्जहिं बानर भालु अपारा ॥ ४ ॥
नख आयुध गिरि पादपधारी ।
चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं ।
डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥ ५ ॥

छंद
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे ।
मन हरष सब गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं ।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥ १ ॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई ।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी ।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥ २ ॥

दोहा
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर ।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ ३५ ॥

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका ।
जब तें जारि गयउ कपि लंका ॥
निज निज गृह सब करहिं बिचारा ।
नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥ १ ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई ।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी ।
मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥ २ ॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी ।
बोली बचन नीति रस पागी ॥
कंत करष हरि सन परिहरहू ।
मोर कहा अति हित हियँ धरहू ॥ ३ ॥
समुझत जासु दूत कइ करनी ।
स्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी ॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई ।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई ॥ ४ ॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदायई ।
सीता सीत निसा सम आई ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें ।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ॥ ५ ॥

दोहा
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ ३६ ॥

श्रवन सुनि सठ ता करि बानी ।
बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा ।
मंगल महुँ भय मन अति काचा ॥ १ ॥
जों आवइ मर्कट कटकाई ।
जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा ।
तासु नारि सभीत बड़ि हासा ॥ २ ॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई ।
चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता ।
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ॥ ३ ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई ।
सिंधु पार सेना सब आई ॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहेहू ।
ते सब हँसे मष्ट करि रहेहू ॥ ४ ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं ।
नर बानर केहि लेखे माहीं ॥ ५ ॥

दोहा
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ ३७ ॥

सोइ रावन कहुँ बनी सहाई ।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा ।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥ १ ॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन ।
बोला बचन पाइ अनुसासन ॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता ।
मति अनुरूप कहउँ हित ताता ॥ २ ॥
जो आपन चाहै कल्याना ।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥
सो परनारि लिलार गोसाई ।
तजउ चउथि के चंद कि नाई ॥ ३ ॥
चौदह भुवन एक पति होई ।
भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ॥
गुन सागर नागर नर जोऊ ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ॥ ४ ॥

दोहा
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥ ३८ ॥

तात राम नहिं नर भूपाला ।
भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता ।
ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥ १ ॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी ।
कृपा सिंधु मानुष तनुधारी ॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता ।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥ २ ॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा ।
प्रनतारति भंजन रघुनाथा ॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही ।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥ ३ ॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा ।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन ।
सोई प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥ ४ ॥

दोहा
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस ।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ ३९ क ॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात ।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ ३९ ख ॥

माल्यवंत अति सचिव सयाना ।
तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन ।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥ १ ॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ ।
दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी ।
कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥ २ ॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं ।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना ।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥ ३ ॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता ।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥
कालराति निसिचर कुल केरी ।
तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥ ४ ॥

दोहा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार ।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥ ४० ॥

बुध पुरान श्रुति संमत बानी ।
कही बिभीषन नीति बखानी ॥
सुनत दसानन उठा रिसाई ।
खल तोहि निकट मृत्य अब आई ॥ १ ॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा ।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥
कहसि न खल अस को जग माहीं ।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं ॥ २ ॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती ।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा ।
अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥ ३ ॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई ।
मंद करत जो करइ भलाई ॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा ।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥ ४ ॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ ।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ॥ ५ ॥

दोहा
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ ४१ ॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं ।
आयूहीन भए सब तबहीं ॥
साधु अवग्या तुरत भवानी ।
कर कल्यान अखिल कै हानी ॥ १ ॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा ।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं ।
करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥ २ ॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता ।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥
जे पद पसरि तरी रिषिनारी ।
दंड़क कानन पावनकारी ॥ ३ ॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए ।
कपट कुरंग संग धर धाए ॥
हर उर सर सरोज पद जेई ।
अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई ॥ ४ ॥

दोहा
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ ४२ ॥

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा ।
आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा ।
जान कोउ रिपु दूत बिसेषा ॥ १ ॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए ।
समाचार सब ताहि सुनाए ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई ।
आवा मिलन दसानन भाई ॥ २ ॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा ।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ॥
जानि न जाइ निसाचर माया ।
कामरूप केहि कारन आया ॥ ३ ॥
भेद हमार लेन सठ आवा ।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी ।
मम पन सरनागत भयहारी ॥ ४ ॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना ।
सरनागत बच्छल भगवाना ॥ ५ ॥

दोहा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ ४३ ॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू ।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥ १ ॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ ।
भजहु मोर तेहि भाव न काऊ ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई ।
मोरें सनमुख आव कि सोई ॥ २ ॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥
भेद लेन पठवा दससीसा ।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥ ३ ॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते ।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ॥
जो सभीत आवा सरनाईं ।
राखिहउँ ताहि प्रान की नाईं ॥ ४ ॥

दोहा
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत ॥ ४४ ॥

सादर तेहि आगें करि बानर ।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता ।
नयनानंद दान के दाता ॥ १ ॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी ।
रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन ।
स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥ २ ॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा ।
आनन अमित मदन मन मोहा ॥
नयन नीर पुलकित अति गाता ।
मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥ ३ ॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता ।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा ।
जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥ ४ ॥

दोहा
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ ४५ ॥

अस कहि करत दंडवत देखा ।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा ।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥ १ ॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी ।
बोले बचन भगत भय हारी ॥
कहु लंकेस सहित परिवारा ।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥ २ ॥
खल मंडलीं बसहु दिन राती ।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती ।
अति नय निपुन न भाव अनीती ॥ ३ ॥
बरु भल बास नरक कर ताता ।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥
अब पद देखि कुसल रघुराया ।
जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥ ४ ॥

दोहा
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
जब लगि भजन न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ ४६ ॥

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना ।
लोभ मोह मच्छर मद माना ॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा ।
धरें चाप सायक कटि भाथा ॥ १ ॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी ।
राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं ।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ॥ २ ॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे ।
देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला ।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥ ३ ॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ ।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा ।
तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥ ४ ॥

दोहा
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ॥ ४७ ॥

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ ।
जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही ।
आवौ सभय सरन तकि मोही ॥ १ ॥
तजि मद मोह कपट छल नाना ।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥
जननी जनक बंधु सुत दारा ।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥ २ ॥
सब कै ममता ताग बटोरी ।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं ।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥ ३ ॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें ।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें ।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें ॥ ४ ॥

दोहा
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम ।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ ४८ ॥

सुन लंकेस सकल गुन तोरें ।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥
राम बचन सुनि बानर जूथा ।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥ १ ॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी ।
नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा ।
हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥ २ ॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी ।
प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥
उर कछु प्रथम बासना रही ।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ ३ ॥
अब कृपाल निज भगति पावनी ।
देहु सदा सिव मन भावनी ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा ।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा ॥ ४ ॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं ।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा ।
सुमन वृष्टि नभ भई अपारा ॥ ५ ॥

दोहा
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड ।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड ॥ ४९ क ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्ह दिएँ दस माथ ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ ४९ ख ॥

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना ।
ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥
निज जन जानि ताहि अपनावा ।
प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥ १ ॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी ।
सर्बरूप सब रहित उदासी ॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक ।
कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥ २ ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा ।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ॥
संकुल मकर उरग झष जाती ।
अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥ ३ ॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक ।
कोटि सिंधु सोषक तव सायक ॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई ।
बिनय करिअ सागर सन जाई ॥ ४ ॥

दोहा
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि ।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ ५० ॥

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई ।
करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा ।
राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥ १ ॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा ।
सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ॥
कादर मन कहुँ एक अधारा ।
दैव दैव आलसी पुकारा ॥ २ ॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा ।
ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई ।
सिंधि समीप गए रघुराई ॥ ३ ॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई ।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए ।
पाछें रावन दूत पठाए ॥ ४ ॥

दोहा
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥ ५१ ॥

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने ।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥ १ ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर ।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर ॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए ।
बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥ २ ॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे ।
दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥
जो हमार हर नासा काना ।
तेहि कोसलाधीस कै आना ॥ ३ ॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए ।
दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए ॥
रावन कर दीजहु यह पाती ।
लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥ ४ ॥

दोहा
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार ।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार ॥ ५२ ॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा ।
चले दूत बरनत गुन गाता ॥
कहत राम जसु लंकाँ आए ।
रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥ १ ॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता ।
कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी ।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥ २ ॥
करत राज लंका सठ त्यागी ।
होइहि जव कर कीट अभागी ॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई ।
कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥ ३ ॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा ।
भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा ॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी ।
जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥ ४ ॥

दोहा
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर ।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥ ५३ ॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें ।
मानहु कहा क्रोध तजि तैसें ॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा ।
जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥ १ ॥
रावन दूत हमहि सुनि काना ।
कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥
श्रवन नासिका काटैं लागे ।
राम सपथ दीन्हें हम त्यागे ॥ २ ॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई ।
बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥
नाना बरन भालु कपि धारी ।
बिकटानन बिसाल भयकारी ॥ ३ ॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा ।
सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥
अमित नाम भट कठिन कराला ।
अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥ ४ ॥

दोहा
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि ।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ॥ ५४ ॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना ।
इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना ॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं ।
तृन समान त्रैलोकहि गनहीं ॥ १ ॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर ।
पदुम अठारह जूथप बंदर ॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं ।
जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ॥ २ ॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा ।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला ।
पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला ॥ ३ ॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा ।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका ।
मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका ॥ ४ ॥

दोहा
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम ।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम ॥ ५५ ॥

राम तेज बल बुधि बिपुलाई ।
सेष सहस सत सकहिं न गाई ॥
सक सर एक सोषि सत सागर ।
तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥ १ ॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं ।
मागत पंथ कृपा मन माहीं ॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा ।
जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥ २ ॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई ।
सागर सन ठानी मचलाई ॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई ।
रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥ ३ ॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें ।
बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी ।
समय बिचार पत्रिका काढ़ी ॥ ४ ॥
रामानुज दीन्ही यह पाती ।
नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन ।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥ ५ ॥

दोहा
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस ।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ ५६ क ॥
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग ।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ॥ ५६ ख ॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई ।
कहत दसानन सबहि सुनाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा ।
लघु तापस कर बाग बिलासा ॥ १ ॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी ।
समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी ॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा ।
नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥ २ ॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ ।
जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही ।
उर अपराध न एकउ धरही ॥ ३ ॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे ।
एतना कहा मोर प्रभु कीजे ॥
जब तेहि कहा देन बैदेही ।
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥ ४ ॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ ।
कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई ।
राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥ ५ ॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी ।
राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी ॥
बंदि राम पद बारहिं बारा ।
मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥ ६ ॥

दोहा
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥ ५७ ॥

लछिमन बान सरासन आनू ।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती ।
सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥ १ ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी ।
अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा ।
ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥ २ ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा ।
यह मत लछिमन के मन भावा ॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला ।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ॥ ३ ॥
मकर उरग झष गन अकुलाने ।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने ॥
कनक थार भरि मनि गन नाना ।
बिप्र रूप आयउ तजि माना ॥ ४ ॥

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच ।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ॥ ५८ ॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे ।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥
गगन समीर अनल जल धरनी ।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ॥ १ ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए ।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई ।
सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ॥ २ ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही ।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी ।
सकल ताड़ना के अधिकारी ॥ ३ ॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई ।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई ॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई ।
करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई ॥ ४ ॥

दोहा
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ ।
जेहि बिधि उतरैं कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ ५९ ॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई ।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई ।
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे ।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥ १ ॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई ।
करिहउँ बल अनुमान सहाई ॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥ २ ॥
एहिं सर मम उत्तर तट बासी ।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा ।
तुरतहिं हरी राम रन धीरा ॥ ३ ॥
देखि राम बल पौरुष भारी ।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा ।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥ ४ ॥

छंद
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गाउअऊ ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥

दोहा
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥ ६० ॥

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।

॥ सियावर रामचन्द्र की जै ॥

लंकाकाण्ड

श्री गणेशाय नमः श्री जानकीवल्लभो विजयते

श्री रामचरितमानस षष्ठ सोपान (लंकाकाण्ड)




श्लोक
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम ।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम ॥ १ ॥

शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम ।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम ॥ २ ॥

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम ।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥

दो॰ लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥
सो॰ सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु ॥
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह ।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं ॥
यह लघु जलधि तरत कति बारा ।
अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी ।
सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ॥
तब रिपु नारी रुदन जल धारा ।
भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ॥
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी ।
हरषे कपि रघुपति तन हेरी ॥
जामवंत बोले दोउ भाई ।
नल नीलहि सब कथा सुनाई ॥
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं ।
करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥
बोलि लिए कपि निकर बहोरी ।
सकल सुनहु बिनती कछु मोरी ॥
राम चरन पंकज उर धरहू ।
कौतुक एक भालु कपि करहू ॥
धावहु मर्कट बिकट बरूथा ।
आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ॥
सुनि कपि भालु चले करि हूहा ।
जय रघुबीर प्रताप समूहा ॥
दो॰ अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ॥ १ ॥

सैल बिसाल आनि कपि देहीं ।
कंदुक इव नल नील ते लेहीं ॥
देखि सेतु अति सुंदर रचना ।
बिहसि कृपानिधि बोले बचना ॥
परम रम्य उत्तम यह धरनी ।
महिमा अमित जाइ नहिं बरनी ॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना ।
मोरे हृदयँ परम कलपना ॥
सुनि कपीस बहु दूत पठाए ।
मुनिबर सकल बोलि लै आए ॥
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा ।
सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥
सिव द्रोही मम भगत कहावा ।
सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी ।
सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥
दो॰ संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास ॥ २ ॥

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं ।
ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि ।
सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि ।
भगति मोरि तेहि संकर देइहि ॥
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही ।
सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥
राम बचन सब के जिय भाए ।
मुनिबर निज निज आश्रम आए ॥
गिरिजा रघुपति कै यह रीती ।
संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ॥
बाँधा सेतु नील नल नागर ।
राम कृपाँ जसु भयउ उजागर ॥
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई ।
भए उपल बोहित सम तेई ॥
महिमा यह न जलधि कइ बरनी ।
पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ॥
दो०=श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥ ३ ॥

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा ।
देखि कृपानिधि के मन भावा ॥
चली सेन कछु बरनि न जाई ।
गर्जहिं मर्कट भट समुदाई ॥
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई ।
चितव कृपाल सिंधु बहुताई ॥
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा ।
प्रगट भए सब जलचर बृंदा ॥
मकर नक्र नाना झष ब्याला ।
सत जोजन तन परम बिसाला ॥
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं ।
एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं ॥
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे ।
मन हरषित सब भए सुखारे ॥
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी ।
मगन भए हरि रूप निहारी ॥
चला कटकु प्रभु आयसु पाई ।
को कहि सक कपि दल बिपुलाई ॥
दो॰ सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं ।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं ॥ ४ ॥

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई ।
बिहँसि चले कृपाल रघुराई ॥
सेन सहित उतरे रघुबीरा ।
कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ॥
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा ।
सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा ॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए ।
सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए ॥
सब तरु फरे राम हित लागी ।
रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥
खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं ।
लंका सन्मुख सिखर चलावहिं ॥
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं ।
घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ॥
दसनन्हि काटि नासिका काना ।
कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना ॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता ।
तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना ।
दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥
दो॰ बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस ।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५ ॥

निज बिकलता बिचारि बहोरी ।
बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी ॥
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो ।
कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी ।
बोली परम मनोहर बानी ॥
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा ।
सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥
नाथ बयरु कीजे ताही सों ।
बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा ।
खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे ।
महाबीर दितिसुत संघारे ॥
जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा ।
सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ॥
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा ।
काल करम जिव जाकें हाथा ॥
दो॰ रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥ ६ ॥

नाथ दीनदयाल रघुराई ।
बाघउ सनमुख गएँ न खाई ॥
चाहिअ करन सो सब करि बीते ।
तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥
संत कहहिं असि नीति दसानन ।
चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥
तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता ।
जो कर्ता पालक संहर्ता ॥
सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी ।
भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी ।
भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥
सोइ कोसलधीस रघुराया ।
आयउ करन तोहि पर दाया ॥
जौं पिय मानहु मोर सिखावन ।
सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥
दो॰ अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात ।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥ ७ ॥

तब रावन मयसुता उठाई ।
कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥
सुनु तै प्रिया बृथा भय माना ।
जग जोधा को मोहि समाना ॥
बरुन कुबेर पवन जम काला ।
भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला ॥
देव दनुज नर सब बस मोरें ।
कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई ।
सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥
मंदोदरीं हदयँ अस जाना ।
काल बस्य उपजा अभिमाना ॥
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा ।
करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा ।
बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥
कहहु कवन भय करिअ बिचारा ।
नर कपि भालु अहार हमारा ॥
दो॰ सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि ।
निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि ॥ ८ ॥

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती ।
नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥
बारिधि नाघि एक कपि आवा ।
तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू ।
जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥
सुनत नीक आगें दुख पावा ।
सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥
जेहिं बारीस बँधायउ हेला ।
उतरेउ सेन समेत सुबेला ॥
सो भनु मनुज खाब हम भाई ।
बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥
तात बचन मम सुनु अति आदर ।
जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं ।
ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥
बचन परम हित सुनत कठोरे ।
सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती ।
सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥
दो॰ नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि ।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ॥ ९ ॥

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा ।
उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥
सुत सन कह दसकंठ रिसाई ।
असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥
अबहीं ते उर संसय होई ।
बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा ।
चला भवन कहि बचन कठोरा ॥
हित मत तोहि न लागत कैसें ।
काल बिबस कहुँ भेषज जैसें ॥
संध्या समय जानि दससीसा ।
भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥
लंका सिखर उपर आगारा ।
अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥
बैठ जाइ तेही मंदिर रावन ।
लागे किंनर गुन गन गावन ॥
बाजहिं ताल पखाउज बीना ।
नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥
दो॰ सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥ १० ॥

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा ।
उतरे सेन सहित अति भीरा ॥
सिखर एक उतंग अति देखी ।
परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी ॥
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए ।
लछिमन रचि निज हाथ डसाए ॥
ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला ।
तेहीं आसान आसीन कृपाला ॥
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा ।
बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ॥
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना ।
कह लंकेस मंत्र लगि काना ॥
बड़भागी अंगद हनुमाना ।
चरन कमल चापत बिधि नाना ॥
प्रभु पाछें लछिमन बीरासन ।
कटि निषंग कर बान सरासन ॥
दो॰ एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥ ११(क) ॥

पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक ।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥ ११(ख) ॥

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी ।
परम प्रताप तेज बल रासी ॥
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी ।
ससि केसरी गगन बन चारी ॥
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा ।
निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई ।
कहहु काह निज निज मति भाई ॥
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई ।
ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई ॥
मारेउ राहु ससिहि कह कोई ।
उर महँ परी स्यामता सोई ॥
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा ।
सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं ।
तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा ।
अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥
बिष संजुत कर निकर पसारी ।
जारत बिरहवंत नर नारी ॥
दो॰ कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास ।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ॥ १२(क) ॥

नवान्हपारायण ॥
सातवाँ विश्राम पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान ।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२(ख) ॥

देखु बिभीषन दच्छिन आसा ।
घन घंमड दामिनि बिलासा ॥
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा ।
होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ॥
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला ।
होइ न तड़ित न बारिद माला ॥
लंका सिखर उपर आगारा ।
तहँ दसकंघर देख अखारा ॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी ।
सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥
मंदोदरी श्रवन ताटंका ।
सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका ॥
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा ।
सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना ।
चाप चढ़ाइ बान संधाना ॥
दो॰ छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान ।
सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३(क) ॥

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग ।
रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३(ख) ॥

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा ।
अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥
सोचहिं सब निज हृदय मझारी ।
असगुन भयउ भयंकर भारी ॥
दसमुख देखि सभा भय पाई ।
बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही ।
मुकुट परे कस असगुन ताही ॥
सयन करहु निज निज गृह जाई ।
गवने भवन सकल सिर नाई ॥
मंदोदरी सोच उर बसेऊ ।
जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥
सजल नयन कह जुग कर जोरी ।
सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥
कंत राम बिरोध परिहरहू ।
जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥
दो॰ बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु ।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥ १४ ॥

पद पाताल सीस अज धामा ।
अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥
भृकुटि बिलास भयंकर काला ।
नयन दिवाकर कच घन माला ॥
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा ।
निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥
श्रवन दिसा दस बेद बखानी ।
मारुत स्वास निगम निज बानी ॥
अधर लोभ जम दसन कराला ।
माया हास बाहु दिगपाला ॥
आनन अनल अंबुपति जीहा ।
उतपति पालन प्रलय समीहा ॥
रोम राजि अष्टादस भारा ।
अस्थि सैल सरिता नस जारा ॥
उदर उदधि अधगो जातना ।
जगमय प्रभु का बहु कलपना ॥
दो॰ अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान ।
मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान ॥ १५ क ॥

अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ॥ १५ ख ॥

बिहँसा नारि बचन सुनि काना ।
अहो मोह महिमा बलवाना ॥
नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं ।
अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥
साहस अनृत चपलता माया ।
भय अबिबेक असौच अदाया ॥
रिपु कर रुप सकल तैं गावा ।
अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥
सो सब प्रिया सहज बस मोरें ।
समुझि परा प्रसाद अब तोरें ॥
जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई ।
एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई ॥
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि ।
समुझत सुखद सुनत भय मोचनि ॥
मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ ।
पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ ॥
दो॰ एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध ।
सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध ॥ १६(क) ॥

सो॰ फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ।
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥ १६(ख) ॥

इहाँ प्रात जागे रघुराई ।
पूछा मत सब सचिव बोलाई ॥
कहहु बेगि का करिअ उपाई ।
जामवंत कह पद सिरु नाई ॥
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी ।
बुधि बल तेज धर्म गुन रासी ॥
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा ।
दूत पठाइअ बालिकुमारा ॥
नीक मंत्र सब के मन माना ।
अंगद सन कह कृपानिधाना ॥
बालितनय बुधि बल गुन धामा ।
लंका जाहु तात मम कामा ॥
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ ।
परम चतुर मैं जानत अहऊँ ॥
काजु हमार तासु हित होई ।
रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥
सो॰ प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ ।
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥ १७(क) ॥

स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥ १७(ख) ॥

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई ।
अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥
प्रभु प्रताप उर सहज असंका ।
रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥
पुर पैठत रावन कर बेटा ।
खेलत रहा सो होइ गै भैंटा ॥
बातहिं बात करष बढ़ि आई ।
जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥
तेहि अंगद कहुँ लात उठाई ।
गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई ॥
निसिचर निकर देखि भट भारी ।
जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी ॥
एक एक सन मरमु न कहहीं ।
समुझि तासु बध चुप करि रहहीं ॥
भयउ कोलाहल नगर मझारी ।
आवा कपि लंका जेहीं जारी ॥
अब धौं कहा करिहि करतारा ।
अति सभीत सब करहिं बिचारा ॥
बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई ।
जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई ॥
दो॰ गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज ।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥ १८ ॥

तुरत निसाचर एक पठावा ।
समाचार रावनहि जनावा ॥
सुनत बिहँसि बोला दससीसा ।
आनहु बोलि कहाँ कर कीसा ॥
आयसु पाइ दूत बहु धाए ।
कपिकुंजरहि बोलि लै आए ॥
अंगद दीख दसानन बैंसें ।
सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें ॥
भुजा बिटप सिर सृंग समाना ।
रोमावली लता जनु नाना ॥
मुख नासिका नयन अरु काना ।
गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा ।
बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥
उठे सभासद कपि कहुँ देखी ।
रावन उर भा क्रौध बिसेषी ॥
दो॰ जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ ।
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥ १९ ॥

कह दसकंठ कवन तैं बंदर ।
मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥
मम जनकहि तोहि रही मिताई ।
तव हित कारन आयउँ भाई ॥
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती ।
सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा ।
जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥
नृप अभिमान मोह बस किंबा ।
हरि आनिहु सीता जगदंबा ॥
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा ।
सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी ।
परिजन सहित संग निज नारी ॥
सादर जनकसुता करि आगें ।
एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें ॥
दो॰ प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि ।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥ २० ॥

रे कपिपोत बोलु संभारी ।
मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी ॥
कहु निज नाम जनक कर भाई ।
केहि नातें मानिऐ मिताई ॥
अंगद नाम बालि कर बेटा ।
तासों कबहुँ भई ही भेटा ॥
अंगद बचन सुनत सकुचाना ।
रहा बालि बानर मैं जाना ॥
अंगद तहीं बालि कर बालक ।
उपजेहु बंस अनल कुल घालक ॥
गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु ।
निज मुख तापस दूत कहायहु ॥
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई ।
बिहँसि बचन तब अंगद कहई ॥
दिन दस गएँ बालि पहिं जाई ।
बूझेहु कुसल सखा उर लाई ॥
राम बिरोध कुसल जसि होई ।
सो सब तोहि सुनाइहि सोई ॥
सुनु सठ भेद होइ मन ताकें ।
श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें ॥
दो॰ हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस ।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस ॥
२१ ।
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई ।
चाहत जासु चरन सेवकाई ॥
तासु दूत होइ हम कुल बोरा ।
अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा ॥
सुनि कठोर बानी कपि केरी ।
कहत दसानन नयन तरेरी ॥
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ ।
नीति धर्म मैं जानत अहऊँ ॥
कह कपि धर्मसीलता तोरी ।
हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी ॥
देखी नयन दूत रखवारी ।
बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी ॥
कान नाक बिनु भगिनि निहारी ।
छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी ॥
धर्मसीलता तव जग जागी ।
पावा दरसु हमहुँ बड़भागी ॥
दो॰ जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु ।
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु ॥ २२(क) ॥

पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास ।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास ॥ २२(ख) ॥

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद ।
मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना ।
अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ ।
अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा ।
सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला ।
है कपि एक महा बलसीला ॥
आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा ।
सुनत बचन कह बालिकुमारा ॥
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा ।
साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा ॥
रावन नगर अल्प कपि दहई ।
सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥
जो अति सुभट सराहेहु रावन ।
सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥
चलइ बहुत सो बीर न होई ।
पठवा खबरि लेन हम सोई ॥
दो॰ सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ ।
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥ २३(क) ॥

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह ।
कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥ २३(ख) ॥

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि ।
जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥ २३(ग) ॥

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष ।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष ॥ २३(घ) ॥

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस ।
प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस ॥ २३(ङ) ॥

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक ।
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥ २३(छ) ॥

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा ।
जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई ।
पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥
अंगद स्वामिभक्त तव जाती ।
प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती ॥
मैं गुन गाहक परम सुजाना ।
तव कटु रटनि करउँ नहिं काना ॥
कह कपि तव गुन गाहकताई ।
सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा ।
तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई ।
दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई ॥
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा ।
तुम्हरें लाज न रोष न माखा ॥
जौं असि मति पितु खाए कीसा ।
कहि अस बचन हँसा दससीसा ॥
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही ।
अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥
बालि बिमल जस भाजन जानी ।
हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥
कहु रावन रावन जग केते ।
मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥
बलिहि जितन एक गयउ पताला ।
राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥
खेलहिं बालक मारहिं जाई ।
दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥
एक बहोरि सहसभुज देखा ।
धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥
कौतुक लागि भवन लै आवा ।
सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥
दो॰ एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख ।
इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख ॥ २४ ॥

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला ।
हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥
जान उमापति जासु सुराई ।
पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥
सिर सरोज निज करन्हि उतारी ।
पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला ।
सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला ॥
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई ।
जब जब भिरउँ जाइ बरिआई ॥
जिन्ह के दसन कराल न फूटे ।
उर लागत मूलक इव टूटे ॥
जासु चलत डोलति इमि धरनी ।
चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥
सोइ रावन जग बिदित प्रतापी ।
सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥
दो॰ तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान ।
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान ॥ २५ ॥

सुनि अंगद सकोप कह बानी ।
बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥
सहसबाहु भुज गहन अपारा ।
दहन अनल सम जासु कुठारा ॥
जासु परसु सागर खर धारा ।
बूड़े नृप अगनित बहु बारा ॥
तासु गर्ब जेहि देखत भागा ।
सो नर क्यों दससीस अभागा ॥
राम मनुज कस रे सठ बंगा ।
धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा ।
अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥
बैनतेय खग अहि सहसानन ।
चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥
सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा ।
लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥
दो॰ सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि ॥
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥ २६ ॥

सुनु रावन परिहरि चतुराई ।
भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥
जौ खल भएसि राम कर द्रोही ।
ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला ।
राम बयर अस होइहि हाला ॥
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें ।
परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥
ते तव सिर कंदुक सम नाना ।
खेलहहिं भालु कीस चौगाना ॥
जबहिं समर कोपहि रघुनायक ।
छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा ।
अस बिचारि भजु राम उदारा ॥
सुनत बचन रावन परजरा ।
जरत महानल जनु घृत परा ॥
दो॰ कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि ।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥ २७ ॥

सठ साखामृग जोरि सहाई ।
बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥
नाघहिं खग अनेक बारीसा ।
सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥
मम भुज सागर बल जल पूरा ।
जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा ॥
बीस पयोधि अगाध अपारा ।
को अस बीर जो पाइहि पारा ॥
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा ।
भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥
जौं पै समर सुभट तव नाथा ।
पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥
तौ बसीठ पठवत केहि काजा ।
रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू ।
पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥
दो॰ सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस ।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥ २८ ॥

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला ।
बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥
नर कें कर आपन बध बाँची ।
हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें ।
लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥
आन बीर बल सठ मम आगें ।
पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे ॥
कह अंगद सलज्ज जग माहीं ।
रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥
लाजवंत तव सहज सुभाऊ ।
निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥
सिर अरु सैल कथा चित रही ।
ताते बार बीस तैं कही ॥
सो भुजबल राखेउ उर घाली ।
जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा ।
काटें सीस कि होइअ सूरा ॥
इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा ।
काटइ निज कर सकल सरीरा ॥
दो॰ जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद ।
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २९ ॥

अब जनि बतबढ़ाव खल करही ।
सुनु मम बचन मान परिहरही ॥
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ ।
अस बिचारि रघुबीष पठायउँ ॥
बार बार अस कहइ कृपाला ।
नहिं गजारि जसु बधें सृकाला ॥
मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे ।
सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा ।
लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥
जानेउँ तव बल अधम सुरारी ।
सूनें हरि आनिहि परनारी ॥
तैं निसिचर पति गर्ब बहूता ।
मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥
जौं न राम अपमानहि डरउँ ।
तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥
दो॰ तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ ।
तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ ॥ ३० ॥

जौ अस करौं तदपि न बड़ाई ।
मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई ॥
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा ।
अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥
सदा रोगबस संतत क्रोधी ।
बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी ॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी ।
जीवन सव सम चौदह प्रानी ॥
अस बिचारि खल बधउँ न तोही ।
अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा ।
अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥
रे कपि अधम मरन अब चहसी ।
छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥
कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें ।
बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥
दो॰ अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास ।
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास ॥ ३१(क) ॥

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक ।
खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥ ३१(ख) ॥

जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा ।
क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा ॥
हरि हर निंदा सुनइ जो काना ।
होइ पाप गोघात समाना ॥
कटकटान कपिकुंजर भारी ।
दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥
डोलत धरनि सभासद खसे ।
चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥
गिरत सँभारि उठा दसकंधर ।
भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे ।
कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥
आवत मुकुट देखि कपि भागे ।
दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥
की रावन करि कोप चलाए ।
कुलिस चारि आवत अति धाए ॥
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू ।
लूक न असनि केतु नहिं राहू ॥
ए किरीट दसकंधर केरे ।
आवत बालितनय के प्रेरे ॥
दो॰ तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास ।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२(क) ॥

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ ।
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२(ख) ॥

एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु ।
खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु ॥
मर्कटहीन करहु महि जाई ।
जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा ।
गाल बजावत तोहि न लाजा ॥
मरु गर काटि निलज कुलघाती ।
बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥
रे त्रिय चोर कुमारग गामी ।
खल मल रासि मंदमति कामी ॥
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा ।
भएसि कालबस खल मनुजादा ॥
याको फलु पावहिगो आगें ।
बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥
रामु मनुज बोलत असि बानी ।
गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं ।
सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥
सो॰ सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर ।
बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३(क) ॥

तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर ।
तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३(ख) ॥

मै तव दसन तोरिबे लायक ।
आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं ।
लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥
गूलरि फल समान तव लंका ।
बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥
मैं बानर फल खात न बारा ।
आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥
जुगति सुनत रावन मुसुकाई ।
मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥
बालि न कबहुँ गाल अस मारा ।
मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा ।
जौं न उपारिउँ तव दस जीहा ॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा ।
सभा माझ पन करि पद रोपा ॥
जौं मम चरन सकसि सठ टारी ।
फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥
सुनहु सुभट सब कह दससीसा ।
पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥
इंद्रजीत आदिक बलवाना ।
हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना ॥
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई ।
पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥
पुनि उठि झपटहीं सुर आराती ।
टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी ।
मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥
दो॰ कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ ।
झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४(क) ॥

भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग ॥
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥ ३४(ख) ॥

कपि बल देखि सकल हियँ हारे ।
उठा आपु कपि कें परचारे ॥
गहत चरन कह बालिकुमारा ।
मम पद गहें न तोर उबारा ॥
गहसि न राम चरन सठ जाई ।
सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥
भयउ तेजहत श्री सब गई ।
मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥
सिंघासन बैठेउ सिर नाई ।
मानहुँ संपति सकल गँवाई ॥
जगदातमा प्रानपति रामा ।
तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा ॥
उमा राम की भृकुटि बिलासा ।
होइ बिस्व पुनि पावइ नासा ॥
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई ।
तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना ।
मान न ताहि कालु निअराना ॥
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो ।
यह कहि चल्यो बालि नृप जायो ॥
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई ।
तोहि अबहिं का करौं बड़ाई ॥
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा ।
सो सुनि रावन भयउ दुखारा ॥
जातुधान अंगद पन देखी ।
भय ब्याकुल सब भए बिसेषी ॥
दो॰ रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज ।
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज ॥ ३५(क) ॥

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ ।
मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ (ख) ॥

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही ।
सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥
रामानुज लघु रेख खचाई ।
सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा ।
जाके दूत केर यह कामा ॥
कौतुक सिंधु नाघी तव लंका ।
आयउ कपि केहरी असंका ॥
रखवारे हति बिपिन उजारा ।
देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा ।
कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥
अब पति मृषा गाल जनि मारहु ।
मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु ।
अग जग नाथ अतुल बल जानहु ॥
बान प्रताप जान मारीचा ।
तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥
जनक सभाँ अगनित भूपाला ।
रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला ॥
भंजि धनुष जानकी बिआही ।
तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥
सुरपति सुत जानइ बल थोरा ।
राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी ।
तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी ॥
दो॰ बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध ।
बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध ॥ ३६ ॥

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला ।
उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥
कारुनीक दिनकर कुल केतू ।
दूत पठायउ तव हित हेतू ॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा ।
करि बरूथ महुँ मृगपति जथा ॥
अंगद हनुमत अनुचर जाके ।
रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू ।
मुधा मान ममता मद बहहू ॥
अहह कंत कृत राम बिरोधा ।
काल बिबस मन उपज न बोधा ॥
काल दंड गहि काहु न मारा ।
हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥
निकट काल जेहि आवत साईं ।
तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥
दो॰ दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु ।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥ ३७ ॥

नारि बचन सुनि बिसिख समाना ।
सभाँ गयउ उठि होत बिहाना ॥
बैठ जाइ सिंघासन फूली ।
अति अभिमान त्रास सब भूली ॥
इहाँ राम अंगदहि बोलावा ।
आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥
अति आदर सपीप बैठारी ।
बोले बिहँसि कृपाल खरारी ॥
बालितनय कौतुक अति मोही ।
तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥

रावनु जातुधान कुल टीका ।
भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए ।
कहहु तात कवनी बिधि पाए ॥
सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी ।
मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥
साम दान अरु दंड बिभेदा ।
नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥
नीति धर्म के चरन सुहाए ।
अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥
दो॰ धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस ।
तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥
३८(((क) ॥
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार ।
समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥ ३८(ख) ॥

रिपु के समाचार जब पाए ।
राम सचिव सब निकट बोलाए ॥
लंका बाँके चारि दुआरा ।
केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा ॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन ।
सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन ॥
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा ।
चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥
जथाजोग सेनापति कीन्हे ।
जूथप सकल बोलि तब लीन्हे ॥
प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए ।
सुनि कपि सिंघनाद करि धाए ॥
हरषित राम चरन सिर नावहिं ।
गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं ॥
गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा ।
जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥
जानत परम दुर्ग अति लंका ।
प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥
घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी ।
मुखहिं निसान बजावहीं भेरी ॥
दो॰ जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव ।
गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव ॥ ३९ ॥

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी ।
सुना दसानन अति अहँकारी ॥
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई ।
बिहँसि निसाचर सेन बोलाई ॥
आए कीस काल के प्रेरे ।
छुधावंत सब निसिचर मेरे ॥
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा ।
गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा ॥
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू ।
धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥
उमा रावनहि अस अभिमाना ।
जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना ॥
चले निसाचर आयसु मागी ।
गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥
तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा ।
सुल कृपान परिघ गिरिखंडा ॥
जिमि अरुनोपल निकर निहारी ।
धावहिं सठ खग मांस अहारी ॥
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा ।
तिमि धाए मनुजाद अबूझा ॥
दो॰ नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर ।
कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर ॥ ४० ॥

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे ।
मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ ।
सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा ।
सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा ।
अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा ॥
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा ।
पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा ॥
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं ।
दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं ॥
उत रावन इत राम दोहाई ।
जयति जयति जय परी लराई ॥
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं ।
कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥
दो॰ धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं ।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं ॥
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए ।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए ॥
दो॰ एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।
ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ ॥ ४१ ॥

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा ।
मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ॥
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर ।
जय रघुबीर प्रताप दिवाकर ॥
चले निसाचर निकर पराई ।
प्रबल पवन जिमि घन समुदाई ॥
हाहाकार भयउ पुर भारी ।
रोवहिं बालक आतुर नारी ॥
सब मिलि देहिं रावनहि गारी ।
राज करत एहिं मृत्यु हँकारी ॥
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना ।
फेरि सुभट लंकेस रिसाना ॥
जो रन बिमुख सुना मैं काना ।
सो मैं हतब कराल कृपाना ॥
सर्बसु खाइ भोग करि नाना ।
समर भूमि भए बल्लभ प्राना ॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने ।
चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥
सन्मुख मरन बीर कै सोभा ।
तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥
दो॰ बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि ।
ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी ॥ ४२ ॥

भय आतुर कपि भागन लागे ।
जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता ।
कहँ नल नील दुबिद बलवंता ॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना ।
पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥
मेघनाद तहँ करइ लराई ।
टूट न द्वार परम कठिनाई ॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा ।
गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा ।
गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता ।
ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना ।
स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥
दो॰ अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल ।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर ।
राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई ।
करहि कोसलाधीस दोहाई ॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा ।
देखि निसाचरपति भय पावा ॥
नारि बृंद कर पीटहिं छाती ।
अब दुइ कपि आए उतपाती ॥
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं ।
रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥
पुनि कर गहि कंचन के खंभा ।
कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा ॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी ।
लागे मर्दै भुज बल भारी ॥
काहुहि लात चपेटन्हि केहू ।
भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥
दो॰ एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड ।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥ ४४ ॥

महा महा मुखिआ जे पावहिं ।
ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा ।
देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी ।
पावहिं गति जो जाचत जोगी ॥
उमा राम मृदुचित करुनाकर ।
बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर ॥
देहिं परम गति सो जियँ जानी ।
अस कृपाल को कहहु भवानी ॥
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी ।
नर मतिमंद ते परम अभागी ॥
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा ।
कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥
लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें ।
मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें ॥
दो॰ भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत ।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत ॥ ४५ ॥

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए ।
देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥
राम कृपा करि जुगल निहारे ।
भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥
गए जानि अंगद हनुमाना ।
फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥
जातुधान प्रदोष बल पाई ।
धाए करि दससीस दोहाई ॥
निसिचर अनी देखि कपि फिरे ।
जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी ।
लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥
महाबीर निसिचर सब कारे ।
नाना बरन बलीमुख भारे ॥
सबल जुगल दल समबल जोधा ।
कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥
प्राबिट सरद पयोद घनेरे ।
लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे ॥
अनिप अकंपन अरु अतिकाया ।
बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा ।
बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥
दो॰ देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार ।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥

सकल मरमु रघुनायक जाना ।
लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥
समाचार सब कहि समुझाए ।
सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा ।
पावक सायक सपदि चलावा ॥
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं ।
ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा ।
धाए हरष बिगत श्रम त्रासा ॥
हनूमान अंगद रन गाजे ।
हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥
भागत पट पटकहिं धरि धरनी ।
करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥
गहि पद डारहिं सागर माहीं ।
मकर उरग झष धरि धरि खाहीं ॥
दो॰ कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ ।
गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ ॥ ४७ ॥

निसा जानि कपि चारिउ अनी ।
आए जहाँ कोसला धनी ॥
राम कृपा करि चितवा सबही ।
भए बिगतश्रम बानर तबही ॥
उहाँ दसानन सचिव हँकारे ।
सब सन कहेसि सुभट जे मारे ॥
आधा कटकु कपिन्ह संघारा ।
कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥
माल्यवंत अति जरठ निसाचर ।
रावन मातु पिता मंत्री बर ॥
बोला बचन नीति अति पावन ।
सुनहु तात कछु मोर सिखावन ॥
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी ।
असगुन होहिं न जाहिं बखानी ॥
बेद पुरान जासु जसु गायो ।
राम बिमुख काहुँ न सुख पायो ॥
दो॰ हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।
जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥ ४८(क) ॥

मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध ।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध ॥ ४८(ख) ॥

परिहरि बयरु देहु बैदेही ।
भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥
ताके बचन बान सम लागे ।
करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही ।
अब जनि नयन देखावसि मोही ॥
तेहि अपने मन अस अनुमाना ।
बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा ।
तब सकोप बोलेउ घननादा ॥
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा ।
करिहउँ बहुत कहौं का थोरा ॥
सुनि सुत बचन भरोसा आवा ।
प्रीति समेत अंक बैठावा ॥
करत बिचार भयउ भिनुसारा ।
लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा ।
नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥
बिबिधायुध धर निसिचर धाए ।
गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए ॥
छं॰ ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले ।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए ।
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए ॥
दो॰ मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ ।
उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ ॥ ४९ ॥

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता ।
धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥
कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा ।
अंगद हनूमंत बल सींवा ॥
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही ।
आजु सबहि हठि मारउँ ओही ॥
अस कहि कठिन बान संधाने ।
अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥
सर समुह सो छाड़ै लागा ।
जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा ॥
जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर ।
सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर ॥
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा ।
बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा ॥
सो कपि भालु न रन महँ देखा ।
कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा ॥
दो॰ दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर ।
सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर ॥ ५० ॥

देखि पवनसुत कटक बिहाला ।
क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥
महासैल एक तुरत उपारा ।
अति रिस मेघनाद पर डारा ॥
आवत देखि गयउ नभ सोई ।
रथ सारथी तुरग सब खोई ॥
बार बार पचार हनुमाना ।
निकट न आव मरमु सो जाना ॥
रघुपति निकट गयउ घननादा ।
नाना भाँति करेसि दुर्बादा ॥
अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे ।
कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना ।
करै लाग माया बिधि नाना ॥
जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला ।
डरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥
दो॰ जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट ।
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट ॥ ५१ ॥

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा ।
महि ते प्रगट होहिं जलधारा ॥
नाना भाँति पिसाच पिसाची ।
मारु काटु धुनि बोलहिं नाची ॥
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा ।
बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा ॥
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा ।
सूझ न आपन हाथ पसारा ॥
कपि अकुलाने माया देखें ।
सब कर मरन बना एहि लेखें ॥
कौतुक देखि राम मुसुकाने ।
भए सभीत सकल कपि जाने ॥
एक बान काटी सब माया ।
जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके ।
भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥
दो॰ आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥

छतज नयन उर बाहु बिसाला ।
हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥
इहाँ दसानन सुभट पठाए ।
नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥
भूधर नख बिटपायुध धारी ।
धाए कपि जय राम पुकारी ॥
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी ।
इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं ।
कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥
मारु मारु धरु धरु धरु मारू ।
सीस तोरि गहि भुजा उपारू ॥
असि रव पूरि रही नव खंडा ।
धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा ॥
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा ।
कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥
दो॰ रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ ।
जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ ॥ ५३ ॥

घायल बीर बिराजहिं कैसे ।
कुसुमित किंसुक के तरु जैसे ॥
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा ।
भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥
एकहि एक सकइ नहिं जीती ।
निसिचर छल बल करइ अनीती ॥
क्रोधवंत तब भयउ अनंता ।
भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥
नाना बिधि प्रहार कर सेषा ।
राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥
रावन सुत निज मन अनुमाना ।
संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी ।
तेज पुंज लछिमन उर लागी ॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें ।
तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥
दो॰ मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ ॥ ५४ ॥

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू ।
जारइ भुवन चारिदस आसू ॥
सक संग्राम जीति को ताही ।
सेवहिं सुर नर अग जग जाही ॥
यह कौतूहल जानइ सोई ।
जा पर कृपा राम कै होई ॥
संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी ।
लगे सँभारन निज निज अनी ॥
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर ।
लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ॥
तब लगि लै आयउ हनुमाना ।
अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ॥
जामवंत कह बैद सुषेना ।
लंकाँ रहइ को पठई लेना ॥
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता ।
आनेउ भवन समेत तुरंता ॥
दो॰ राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥ ५५ ॥

राम चरन सरसिज उर राखी ।
चला प्रभंजन सुत बल भाषी ॥
उहाँ दूत एक मरमु जनावा ।
रावन कालनेमि गृह आवा ॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना ।
पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना ॥
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा ।
तासु पंथ को रोकन पारा ॥
भजि रघुपति करु हित आपना ।
छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा ।
हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू ।
महा मोह निसि सूतत जागू ॥
काल ब्याल कर भच्छक जोई ।
सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥
दो॰ सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।
राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥

अस कहि चला रचिसि मग माया ।
सर मंदिर बर बाग बनाया ॥
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम ।
मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा ।
मायापति दूतहि चह मोहा ॥
जाइ पवनसुत नायउ माथा ।
लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥
होत महा रन रावन रामहिं ।
जितहहिं राम न संसय या महिं ॥
इहाँ भएँ मैं देखेउँ भाई ।
ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल ।
कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥
सर मज्जन करि आतुर आवहु ।
दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥
दो॰ सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान ।
मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा ।
मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा ।
मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥
अस कहि गई अपछरा जबहीं ।
निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू ।
पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू ॥
सिर लंगूर लपेटि पछारा ।
निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना ।
सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥
देखा सैल न औषध चीन्हा ।
सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ ।
अवधपुरी उपर कपि गयऊ ॥
दो॰ देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि ।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥

परेउ मुरुछि महि लागत सायक ।
सुमिरत राम राम रघुनायक ॥
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए ।
कपि समीप अति आतुर आए ॥
बिकल बिलोकि कीस उर लावा ।
जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥
मुख मलीन मन भए दुखारी ।
कहत बचन भरि लोचन बारी ॥
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा ।
तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥
जौं मोरें मन बच अरु काया ।
प्रीति राम पद कमल अमाया ॥
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला ।
जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा ।
कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥
सो॰ लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥

तात कुसल कहु सुखनिधान की ।
सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥
कपि सब चरित समास बखाने ।
भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥
अहह दैव मैं कत जग जायउँ ।
प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥
जानि कुअवसरु मन धरि धीरा ।
पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥
तात गहरु होइहि तोहि जाता ।
काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥
चढ़ु मम सायक सैल समेता ।
पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता ॥
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना ।
मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥
राम प्रभाव बिचारि बहोरी ।
बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥
दो॰ तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत ।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६०(क) ॥

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६०(ख) ॥

उहाँ राम लछिमनहिं निहारी ।
बोले बचन मनुज अनुसारी ॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ ।
राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ ।
बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥
मम हित लागि तजेहु पितु माता ।
सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥
सो अनुराग कहाँ अब भाई ।
उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू ।
पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥
सुत बित नारि भवन परिवारा ।
होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता ।
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना ।
मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही ।
जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई ।
नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं ।
नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा ।
सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥
निज जननी के एक कुमारा ।
तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी ।
सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई ।
उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥
बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन ।
स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥
उमा एक अखंड रघुराई ।
नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
सो॰ प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर ।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस ॥ ६१ ॥

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना ।
अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई ।
उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता ।
हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा ।
जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ ।
अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा ।
बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा ।
मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई ।
काहे तव मुख रहे सुखाई ॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी ।
जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे ।
महामहा जोधा संघारे ॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी ।
भट अतिकाय अकंपन भारी ॥
अपर महोदर आदिक बीरा ।
परे समर महि सब रनधीरा ॥
दो॰ सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान ।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा ।
अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना ।
भजहु राम होइहि कल्याना ॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक ।
जाके हनूमान से पायक ॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई ।
प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक ।
सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा ।
कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई ।
लोचन सूफल करौ मैं जाई ॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन ।
देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥
दो॰ राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥

महिष खाइ करि मदिरा पाना ।
गर्जा बज्राघात समाना ॥
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा ।
चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ ।
परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो ।
रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥
तात लात रावन मोहि मारा ।
कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ ।
देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥
सुनु सुत भयउ कालबस रावन ।
सो कि मान अब परम सिखावन ॥
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन ।
भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर ।
भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥
दो॰ बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ।
६४ ॥
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन ।
आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन ॥
नाथ भूधराकार सरीरा ।
कुंभकरन आवत रनधीरा ॥
एतना कपिन्ह सुना जब काना ।
किलकिलाइ धाए बलवाना ॥
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर ।
कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा ।
करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥
मुर यो न मन तनु टर यो न टार यो ।
जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो ।
पर यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो ॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता ।
घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि ।
जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि ॥
चली बलीमुख सेन पराई ।
अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥
दो॰ अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव ।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव ॥ ६५ ॥

उमा करत रघुपति नरलीला ।
खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई ।
ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं ।
गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं ॥
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा ।
सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती ।
निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥
काटेसि दसन नासिका काना ।
गरजि अकास चलउ तेहिं जाना ॥
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा ।
अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥
पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना ।
जयति जयति जय कृपानिधाना ॥
नाक कान काटे जियँ जानी ।
फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा ।
देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥
दो॰ जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह ।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा ।
सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा ॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई ।
जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा ।
कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा ।
निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥
रन मद मत्त निसाचर दर्पा ।
बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा ॥
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे ।
सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे ॥
कुंभकरन कपि फौज बिडारी ।
सुनि धाई रजनीचर धारी ॥
देखि राम बिकल कटकाई ।
रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥
दो॰ सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन ।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥ ६७ ॥

कर सारंग साजि कटि भाथा ।
अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा ।
रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा ।
कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा ।
लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा ।
बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं ।
उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं ॥
लागत बान जलद जिमि गाजहीं ।
बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं ॥
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं ।
धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं ॥
दो॰ छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच ।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच ॥ ६८ ॥

कुंभकरन मन दीख बिचारी ।
हति धन माझ निसाचर धारी ॥
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा ।
कियो मृगनायक नाद गँभीरा ॥
कोपि महीधर लेइ उपारी ।
डारइ जहँ मर्कट भट भारी ॥
आवत देखि सैल प्रभू भारे ।
सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक ।
छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं ।
जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे ।
जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥
बिकल बिलोकि भालु कपि धाए ।
बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥
दो॰ महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस ।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस ॥ ६९ ॥

भागे भालु बलीमुख जूथा ।
बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा ॥
चले भागि कपि भालु भवानी ।
बिकल पुकारत आरत बानी ॥
यह निसिचर दुकाल सम अहई ।
कपिकुल देस परन अब चहई ॥
कृपा बारिधर राम खरारी ।
पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥
सकरुन बचन सुनत भगवाना ।
चले सुधारि सरासन बाना ॥
राम सेन निज पाछैं घाली ।
चले सकोप महा बलसाली ॥
खैंचि धनुष सर सत संधाने ।
छूटे तीर सरीर समाने ॥
लागत सर धावा रिस भरा ।
कुधर डगमगत डोलति धरा ॥
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी ।
रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी ॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी ।
प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥
काटें भुजा सोह खल कैसा ।
पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ॥
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका ।
ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका ॥
दो॰ करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि ।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥

सभय देव करुनानिधि जान्यो ।
श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ ।
तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा ।
काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा ।
धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥
सो सिर परेउ दसानन आगें ।
बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा ।
तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा ॥
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर ।
हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥
तासु तेज प्रभु बदन समाना ।
सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं ।
अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥
करि बिनती सुर सकल सिधाए ।
तेही समय देवरिषि आए ॥
गगनोपरि हरि गुन गन गाए ।
रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए ।
राम समर महि सोभत भए ॥
छं॰ संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी ।
श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने ।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥
दो॰ निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम ।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥

दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी ।
समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा ।
जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ॥
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती ।
निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥
बहु बिलाप दसकंधर करई ।
बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥
रोवहिं नारि हृदय हति पानी ।
तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥
मेघनाद तेहि अवसर आयउ ।
कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥
देखेहु कालि मोरि मनुसाई ।
अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ ।
सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना ।
चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥
इत कपि भालु काल सम बीरा ।
उत रजनीचर अति रनधीरा ॥
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू ।
बरनि न जाइ समर खगकेतू ॥
दो॰ मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास ॥
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास ॥ ७२ ॥

सक्ति सूल तरवारि कृपाना ।
अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥
डारह परसु परिघ पाषाना ।
लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥
दस दिसि रहे बान नभ छाई ।
मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना ।
जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं ।
देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥
अवघट घाट बाट गिरि कंदर ।
माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर ।
सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥
मारुतसुत अंगद नल नीला ।
कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन ।
सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥
पुनि रघुपति सैं जूझे लागा ।
सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा ॥
ब्याल पास बस भए खरारी ।
स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥
नट इव कपट चरित कर नाना ।
सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो ।
नागपास देवन्ह भय पायो ॥
दो॰ गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास ॥ ७३ ॥

चरित राम के सगुन भवानी ।
तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥
अस बिचारि जे तग्य बिरागी ।
रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा ।
पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा ॥
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा ।
सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही ।
लागेसि अधम पचारै मोही ॥
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो ।
जामवंत कर गहि सोइ धायो ॥
मारिसि मेघनाद कै छाती ।
परा भूमि घुर्मित सुरघाती ॥
पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ ।
महि पछारि निज बल देखरायो ॥
बर प्रसाद सो मरइ न मारा ।
तब गहि पद लंका पर डारा ॥
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो ।
राम समीप सपदि सो आयो ॥
दो॰ खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ ।
७४(क) ॥
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥ ७४(ख) ॥

मेघनाद के मुरछा जागी ।
पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा ।
करौं अजय मख अस मन धरा ॥
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा ।
सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥
मेघनाद मख करइ अपावन ।
खल मायावी देव सतावन ॥
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि ।
नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना ।
बोले अंगदादि कपि नाना ॥
लछिमन संग जाहु सब भाई ।
करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही ।
देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई ।
जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥
जामवंत सुग्रीव बिभीषन ।
सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन ।
कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥
प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा ।
बोले घन इव गिरा गँभीरा ॥
जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं ।
तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥
जौं सत संकर करहिं सहाई ।
तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥
दो॰ रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत ।
अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा ।
आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा ।
जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई ।
लातन्हि हति हति चले पराई ॥
लै त्रिसुल धावा कपि भागे ।
आए जहँ रामानुज आगे ॥
आवा परम क्रोध कर मारा ।
गर्ज घोर रव बारहिं बारा ॥
कोपि मरुतसुत अंगद धाए ।
हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा ।
सर हति कृत अनंत जुग खंडा ॥
उठि बहोरि मारुति जुबराजा ।
हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा ।
तब धावा करि घोर चिकारा ॥
आवत देखि क्रुद्ध जनु काला ।
लछिमन छाड़े बिसिख कराला ॥
देखेसि आवत पबि सम बाना ।
तुरत भयउ खल अंतरधाना ॥
बिबिध बेष धरि करइ लराई ।
कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥
देखि अजय रिपु डरपे कीसा ।
परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा ।
एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा ।
सर संधान कीन्ह करि दापा ॥
छाड़ा बान माझ उर लागा ।
मरती बार कपटु सब त्यागा ॥
दो॰ रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ॥ ७६ ॥

बिनु प्रयास हनुमान उठायो ।
लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥
तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा ।
चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं ।
श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥
जय अनंत जय जगदाधारा ।
तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए ।
लछिमन कृपासिन्धु पहिं आए ॥
सुत बध सुना दसानन जबहीं ।
मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥
मंदोदरी रुदन कर भारी ।
उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥
नगर लोग सब ब्याकुल सोचा ।
सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥
दो॰ तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि ।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन ।
आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥
पर उपदेस कुसल बहुतेरे ।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा ।
लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥
सुभट बोलाइ दसानन बोला ।
रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई ।
संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥
निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा ।
देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा ।
बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥
चले बीर सब अतुलित बली ।
जनु कज्जल कै आँधी चली ॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला ।
गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला ॥
छं॰ अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते ।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने ।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥
दो॰ ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥

चलेउ निसाचर कटकु अपारा ।
चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥
बिबिध भाँति बाहन रथ जाना ।
बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥
चले मत्त गज जूथ घनेरे ।
प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥
बरन बरद बिरदैत निकाया ।
समर सूर जानहिं बहु माया ॥
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी ।
बीर बसंत सेन जनु साजी ॥
चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं ।
छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥
उठी रेनु रबि गयउ छपाई ।
मरुत थकित बसुधा अकुलाई ॥
पनव निसान घोर रव बाजहिं ।
प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥
भेरि नफीरि बाज सहनाई ।
मारू राग सुभट सुखदाई ॥
केहरि नाद बीर सब करहीं ।
निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा ।
मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ॥
हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई ।
अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई ।
धाए करि रघुबीर दोहाई ॥
छं॰ धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते ।
मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते ॥
नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं ।
जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥
दो॰ दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि ।
भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि ॥ ७९ ॥

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा ।
देखि बिभीषन भयउ अधीरा ॥
अधिक प्रीति मन भा संदेहा ।
बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना ।
केहि बिधि जितब बीर बलवाना ॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना ।
जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका ।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥
बल बिबेक दम परहित घोरे ।
छमा कृपा समता रजु जोरे ॥
ईस भजनु सारथी सुजाना ।
बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा ।
बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥
अमल अचल मन त्रोन समाना ।
सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा ।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें ।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥
दो॰ महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥ ८०(क) ॥

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज ।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥ ८०(ख) ॥

उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान ।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥ ८०(ग) ॥

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना ।
देखत रन नभ चढ़े बिमाना ॥
हमहू उमा रहे तेहि संगा ।
देखत राम चरित रन रंगा ॥
सुभट समर रस दुहु दिसि माते ।
कपि जयसील राम बल ताते ॥
एक एक सन भिरहिं पचारहिं ।
एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं ॥
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं ।
सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥
उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं ।
गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं ॥
निसिचर भट महि गाड़हि भालू ।
ऊपर ढारि देहिं बहु बालू ॥
बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे ।
देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे ॥
छं॰ क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं ।
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं ॥
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं ।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं ॥
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं ।
प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥
धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही ।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही ॥
दो॰ निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप ।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर ।
सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥
गहि कर पादप उपल पहारा ।
डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥
लागहिं सैल बज्र तन तासू ।
खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥
चला न अचल रहा रथ रोपी ।
रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा ।
मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ॥
चले पराइ भालु कपि नाना ।
त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई ।
यह खल खाइ काल की नाई ॥
तेहि देखे कपि सकल पराने ।
दसहुँ चाप सायक संधाने ॥
छं॰ संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं ।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं ॥
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे ।
रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे ॥
दो॰ निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥ ८२ ॥

रे खल का मारसि कपि भालू ।
मोहि बिलोकु तोर मैं कालू ॥
खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती ।
आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा ।
लछिमन किए सकल सत खंडा ॥
कोटिन्ह आयुध रावन डारे ।
तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा ।
स्यंदनु भंजि सारथी मारा ॥
सत सत सर मारे दस भाला ।
गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला ॥
पुनि सत सर मारा उर माहीं ।
परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं ॥
उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी ।
छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी ॥
छं॰ सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही ।
पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही ॥
ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी ।
तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी ॥
दो॰ देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर ।
आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर ॥ ८३ ॥

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा ।
उठा सँभारि बहुत रिस भरा ॥
मुठिका एक ताहि कपि मारा ।
परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा ॥
मुरुछा गै बहोरि सो जागा ।
कपि बल बिपुल सराहन लागा ॥
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही ।
जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही ॥
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो ।
देखि दसानन बिसमय पायो ॥
कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता ।
तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला ।
गई गगन सो सकति कराला ॥
पुनि कोदंड बान गहि धाए ।
रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥
छं॰ आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो ।
गिर यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ॥
सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो ।
रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो ॥
दो॰ उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य ।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई ।
सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥
नाथ करइ रावन एक जागा ।
सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर ।
करहिं बिधंस आव दसकंधर ॥
प्रात होत प्रभु सुभट पठाए ।
हनुमदादि अंगद सब धाए ॥
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका ।
पैठे रावन भवन असंका ॥
जग्य करत जबहीं सो देखा ।
सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा ॥
रन ते निलज भाजि गृह आवा ।
इहाँ आइ बक ध्यान लगावा ॥
अस कहि अंगद मारा लाता ।
चितव न सठ स्वारथ मन राता ॥
छं॰ नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं ।
धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं ॥
तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई ।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥
दो॰ जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास ।
चलेउ निसाचर क्रुर्द्ध होइ त्यागि जिवन कै आस ॥ ८५ ॥

चलत होहिं अति असुभ भयंकर ।
बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥
भयउ कालबस काहु न माना ।
कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥
चली तमीचर अनी अपारा ।
बहु गज रथ पदाति असवारा ॥
प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें ।
सलभ समूह अनल कहँ जैंसें ॥
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही ।
दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥
अब जनि राम खेलावहु एही ।
अतिसय दुखित होति बैदेही ॥
देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना ।
उठि रघुबीर सुधारे बाना ।
जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे ।
सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा ।
अखिल लोक लोचनाभिरामा ॥
कटितट परिकर कस्यो निषंगा ।
कर कोदंड कठिन सारंगा ॥
छं॰ सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो ।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो ॥
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे ।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥
दो॰ सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार ।
जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार ॥ ८६ ॥

एहीं बीच निसाचर अनी ।
कसमसात आई अति घनी ।
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा ।
प्रलयकाल के जनु घन घट्टा ॥
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं ।
जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं ॥
गज रथ तुरग चिकार कठोरा ।
गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए ।
मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए ॥
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा ।
बान बुंद भै बृष्टि अपारा ॥
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा ।
बज्रपात जनु बारहिं बारा ॥
रघुपति कोपि बान झरि लाई ।
घायल भै निसिचर समुदाई ॥
लागत बान बीर चिक्करहीं ।
घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं ॥
स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी ।
सोनित सरि कादर भयकारी ॥
छं॰ कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी ।
दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥
जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने ।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥
दो॰ बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन ।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥ ८७ ॥

मज्जहि भूत पिसाच बेताला ।
प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥
काक कंक लै भुजा उड़ाहीं ।
एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई ।
सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥
कहँरत भट घायल तट गिरे ।
जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे ॥
खैंचहिं गीध आँत तट भए ।
जनु बंसी खेलत चित दए ॥
बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं ।
जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं ।
भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं ॥
भट कपाल करताल बजावहिं ।
चामुंडा नाना बिधि गावहिं ॥
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं ।
खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं ॥
कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं ।
सीस परे महि जय जय बोल्लहिं ॥
छं॰ बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं ।
खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं ॥
बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए ।
संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए ॥
दो॰ रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार ।
मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा ।
उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥
सुरपति निज रथ तुरत पठावा ।
हरष सहित मातलि लै आवा ॥
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा ।
हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥
चंचल तुरग मनोहर चारी ।
अजर अमर मन सम गतिकारी ॥
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी ।
धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥
सही न जाइ कपिन्ह कै मारी ।
तब रावन माया बिस्तारी ॥
सो माया रघुबीरहि बाँची ।
लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥
देखी कपिन्ह निसाचर अनी ।
अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥
छं॰ बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे ।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे ॥
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी ।
माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥
दो॰ बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर ।
द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८९ ॥

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा ।
बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥
तब लंकेस क्रोध उर छावा ।
गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥
जीतेहु जे भट संजुग माहीं ।
सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं ॥
रावन नाम जगत जस जाना ।
लोकप जाकें बंदीखाना ॥
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा ।
बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा ॥
निसिचर निकर सुभट संघारेहु ।
कुंभकरन घननादहि मारेहु ॥
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही ।
जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं ॥
आजु करउँ खलु काल हवाले ।
परेहु कठिन रावन के पाले ॥
सुनि दुर्बचन कालबस जाना ।
बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई ।
जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई ॥
छं॰ जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ।
संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा ॥
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं ।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥
दो॰ राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ॥ ९० ॥

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर ।
कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥
नानाकार सिलीमुख धाए ।
दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए ॥
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा ।
छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥
छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई ।
बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥
कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै ।
बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै ॥
निफल होहिं रावन सर कैसें ।
खल के सकल मनोरथ जैसें ॥
तब सत बान सारथी मारेसि ।
परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥
राम कृपा करि सूत उठावा ।
तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ॥
छं॰ भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे ।
कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥
मँदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे ।
चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥
दो॰ तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल ।
राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल ॥ ९१ ॥

चले बान सपच्छ जनु उरगा ।
प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥
रथ बिभंजि हति केतु पताका ।
गर्जा अति अंतर बल थाका ॥
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना ।
अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना ॥
बिफल होहिं सब उद्यम ताके ।
जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥
तब रावन दस सूल चलावा ।
बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक ।
खैंचि सरासन छाँड़े सायक ॥
रावन सिर सरोज बनचारी ।
चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥
दस दस बान भाल दस मारे ।
निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥
स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना ।
प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥
तीस तीर रघुबीर पबारे ।
भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥
काटतहीं पुनि भए नबीने ।
राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए ।
कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा ।
अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥
रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू ।
मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥
छं॰ जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं ।
रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं ।
जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं ॥
दो॰ जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार ।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥ ९२ ॥

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी ।
बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी ॥
गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी ।
धायउ दसहु सरासन तानी ॥
समर भूमि दसकंधर कोप्यो ।
बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो ॥
दंड एक रथ देखि न परेऊ ।
जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा ।
तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा ॥
सर निवारि रिपु के सिर काटे ।
ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे ॥
काटे सिर नभ मारग धावहिं ।
जय जय धुनि करि भय उपजावहिं ॥
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा ।
कहँ रघुबीर कोसलाधीसा ॥
छं॰ कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले ।
संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले ॥
सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं ।
करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं ॥
दो॰ पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड ।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥ ९३ ॥

आवत देखि सक्ति अति घोरा ।
प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला ।
सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई ।
प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो ।
गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे ।
तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए ।
एक एक के कोटिन्ह पाए ॥
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो ।
अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥
राम बिमुख सठ चहसि संपदा ।
अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥
छं॰ उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर यो ।
दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर यो ॥
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै ।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै ॥
दो॰ उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ ।
सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥ ९४ ॥

देखा श्रमित बिभीषनु भारी ।
धायउ हनूमान गिरि धारी ॥
रथ तुरंग सारथी निपाता ।
हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता ।
गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता ॥
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी ।
चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना ।
पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥
लरत अकास जुगल सम जोधा ।
एकहि एकु हनत करि क्रोधा ॥
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं ।
कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥
बुधि बल निसिचर परइ न पार यो ।
तब मारुत सुत प्रभु संभार यो ॥
छं॰ संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो ।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो ॥
हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले ।
रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥
दो॰ तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड ।
कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥ ९५ ॥

अंतरधान भयउ छन एका ।
पुनि प्रगटे खल रूप अनेका ॥
रघुपति कटक भालु कपि जेते ।
जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते ॥
देखे कपिन्ह अमित दससीसा ।
जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा ॥
भागे बानर धरहिं न धीरा ।
त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा ॥
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन ।
गर्जहिं घोर कठोर भयावन ॥
डरे सकल सुर चले पराई ।
जय कै आस तजहु अब भाई ॥
सब सुर जिते एक दसकंधर ।
अब बहु भए तकहु गिरि कंदर ॥
रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी ।
जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥
छं॰ जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे ।
चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे ॥
हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे ।
मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ॥
दो॰ सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस ।
सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥ ९६ ॥

प्रभु छन महुँ माया सब काटी ।
जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥
रावनु एकु देखि सुर हरषे ।
फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे ॥
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे ।
फिरे एक एकन्ह तब टेरे ॥
प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए ।
तरल तमकि संजुग महि आए ॥
अस्तुति करत देवतन्हि देखें ।
भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें ॥
सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल ।
अस कहि कोपि गगन पर धायल ॥
हाहाकार करत सुर भागे ।
खलहु जाहु कहँ मोरें आगे ॥
देखि बिकल सुर अंगद धायो ।
कूदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥
छं॰ गहि भूमि पार यो लात मार यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो ।
संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ॥
करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई ।
किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई ॥
दो॰ तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप ।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप ।
९७ ॥
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी ।
भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥
मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा ।
धाए कोपि भालु भट कीसा ॥
बालितनय मारुति नल नीला ।
बानरराज दुबिद बलसीला ॥
बिटप महीधर करहिं प्रहारा ।
सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा ॥
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी ।
भागि चलहिं एक लातन्ह मारी ॥
तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ ।
नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥
रुधिर देखि बिषाद उर भारी ।
तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी ॥
गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं ।
जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥
कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी ।
महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे ।
सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर ।
पाइ प्रदोष हरष दसकंधर ॥
मुरुछित देखि सकल कपि बीरा ।
जामवंत धायउ रनधीरा ॥
संग भालु भूधर तरु धारी ।
मारन लगे पचारि पचारी ॥
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना ।
गहि पद महि पटकइ भट नाना ॥
देखि भालुपति निज दल घाता ।
कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥
छं॰ उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा ।
गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥
मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ ।
निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो ॥
दो॰ मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास ।
निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ ९८ ॥

मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम तेही निसि सीता पहिं जाई ।
त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी ।
सीता उर भइ त्रास घनेरी ॥
मुख मलीन उपजी मन चिंता ।
त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥
होइहि कहा कहसि किन माता ।
केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई ।
बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही ।
जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही ॥
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा ।
अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥
जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए ।
लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥
रघुपति बिरह सबिष सर भारी ।
तकि तकि मार बार बहु मारी ॥
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना ।
सोइ बिधि ताहि जिआव न आना ॥
बहु बिधि कर बिलाप जानकी ।
करि करि सुरति कृपानिधान की ॥
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी ।
उर सर लागत मरइ सुरारी ॥
प्रभु ताते उर हतइ न तेही ।
एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥
छं॰ एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है ।
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा ।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥
दो॰ काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान ।
तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ॥ ९९ ॥

अस कहि बहुत भाँति समुझाई ।
पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही ।
उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती ।
जुग सम भई सिराति न राती ॥
करति बिलाप मनहिं मन भारी ।
राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥
जब अति भयउ बिरह उर दाहू ।
फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥
सगुन बिचारि धरी मन धीरा ।
अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा ।
निज सारथि सन खीझन लागा ॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही ।
धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा ।
भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥
सुनि आगवनु दसानन केरा ।
कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी ।
धाए कटकटाइ भट भारी ॥
छं॰ धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा ।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥
बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो ।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो ॥
दो॰ देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार ।
अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥

छं॰ जब कीन्ह तेहिं पाषंड ।
भए प्रगट जंतु प्रचंड ॥
बेताल भूत पिसाच ।
कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥

जोगिनि गहें करबाल ।
एक हाथ मनुज कपाल ॥
करि सद्य सोनित पान ।
नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥

धरु मारु बोलहिं घोर ।
रहि पूरि धुनि चहुँ ओर ॥
मुख बाइ धावहिं खान ।
तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि ।
तहँ बरत देखहिं आगि ॥
भए बिकल बानर भालु ।
पुनि लाग बरषै बालु ॥ ४ ॥

जहँ तहँ थकित करि कीस ।
गर्जेउ बहुरि दससीस ॥
लछिमन कपीस समेत ।
भए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥

हा राम हा रघुनाथ ।
कहि सुभट मीजहिं हाथ ॥
एहि बिधि सकल बल तोरि ।
तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान ।
धाए गहे पाषान ॥
तिन्ह रामु घेरे जाइ ।
चहुँ दिसि बरूथ बनाइ ॥ ७ ॥

मारहु धरहु जनि जाइ ।
कटकटहिं पूँछ उठाइ ॥
दहँ दिसि लँगूर बिराज ।
तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥

छं॰ तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही ।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी ।
रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी ॥ १ ॥

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे ।
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं ।
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥ २ ॥

दो॰ ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास ।
जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥ १०१(क) ॥

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस ।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस ॥ १०१(ख) ॥

काटत बढ़हिं सीस समुदाई ।
जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा ।
राम बिभीषन तन तब देखा ॥
उमा काल मर जाकीं ईछा ।
सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥
सुनु सरबग्य चराचर नायक ।
प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥
नाभिकुंड पियूष बस याकें ।
नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला ।
हरषि गहे कर बान कराला ॥
असुभ होन लागे तब नाना ।
रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना ॥
बोलहि खग जग आरति हेतू ।
प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥
दस दिसि दाह होन अति लागा ।
भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥
मंदोदरि उर कंपति भारी ।
प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी ॥
छं॰ प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही ।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए ।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥
दो॰ खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस ।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥

सायक एक नाभि सर सोषा ।
अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥
लै सिर बाहु चले नाराचा ।
सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा ।
तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी ।
कहाँ रामु रन हतौं पचारी ॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर ।
छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर ॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई ।
चापि भालु मर्कट समुदाई ॥
मंदोदरि आगें भुज सीसा ।
धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥
प्रबिसे सब निषंग महु जाई ।
देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥
तासु तेज समान प्रभु आनन ।
हरषे देखि संभु चतुरानन ॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा ।
जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥
बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा ।
जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥
छं॰ जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो ।
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो ॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही ।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही ॥
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं ।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं ॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने ।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने ॥
दो॰ कृपादृष्टि करि प्रभु अभय किए सुर बृंद ।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद ॥ १०३ ॥

पति सिर देखत मंदोदरी ।
मुरुछित बिकल धरनि खसि परी ॥
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं ।
तेहि उठाइ रावन पहिं आई ॥
पति गति देखि ते करहिं पुकारा ।
छूटे कच नहिं बपुष सँभारा ॥
उर ताड़ना करहिं बिधि नाना ।
रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥
तव बल नाथ डोल नित धरनी ।
तेज हीन पावक ससि तरनी ॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा ।
सो तनु भूमि परेउ भरि छारा ॥
बरुन कुबेर सुरेस समीरा ।
रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा ॥
भुजबल जितेहु काल जम साईं ।
आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई ।
सुत परिजन बल बरनि न जाई ॥
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा ।
रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा ।
सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं ।
राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥
काल बिबस पति कहा न माना ।
अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥
छं॰ जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं ।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥
दो॰ अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन ।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥

मंदोदरी बचन सुनि काना ।
सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥
अज महेस नारद सनकादी ।
जे मुनिबर परमारथबादी ॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी ।
प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥
रुदन करत देखीं सब नारी ।
गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा ।
तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो ।
बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका ।
करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी ।
बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥
दो॰ मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि ।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो ।
कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला ।
जामवंत मारुति नयसीला ॥
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा ।
सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ ।
आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना ।
कीन्ही जाइ तिलक की रचना ॥
सादर सिंहासन बैठारी ।
तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥
जोरि पानि सबहीं सिर नाए ।
सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए ॥
तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे ।
कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥
छं॰ किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥
दो॰ प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज ।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥ १०६ ॥

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना ।
लंका जाहु कहेउ भगवाना ॥
समाचार जानकिहि सुनावहु ।
तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु ॥
तब हनुमंत नगर महुँ आए ।
सुनि निसिचरी निसाचर धाए ॥
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही ।
जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥
दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा ।
रघुपति दूत जानकीं चीन्हा ॥
कहहु तात प्रभु कृपानिकेता ।
कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा ।
मातु समर जीत्यो दससीसा ॥
अबिचल राजु बिभीषन पायो ।
सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥
छं॰ अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा ।
का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं ।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं ॥
दो॰ सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत ।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥ १०७ ॥

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता ।
देखौं नयन स्याम मृदु गाता ॥
तब हनुमान राम पहिं जाई ।
जनकसुता कै कुसल सुनाई ॥
सुनि संदेसु भानुकुलभूषन ।
बोलि लिए जुबराज बिभीषन ॥
मारुतसुत के संग सिधावहु ।
सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता ।
सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता ॥
बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो ।
तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो ॥
बहु प्रकार भूषन पहिराए ।
सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥
ता पर हरषि चढ़ी बैदेही ।
सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥
बेतपानि रच्छक चहुँ पासा ।
चले सकल मन परम हुलासा ॥
देखन भालु कीस सब आए ।
रच्छक कोपि निवारन धाए ॥
कह रघुबीर कहा मम मानहु ।
सीतहि सखा पयादें आनहु ॥
देखहुँ कपि जननी की नाईं ।
बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई ॥
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे ।
नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥
सीता प्रथम अनल महुँ राखी ।
प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी ॥
दो॰ तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद ।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद ॥ १०८ ॥

प्रभु के बचन सीस धरि सीता ।
बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥
लछिमन होहु धरम के नेगी ।
पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥
सुनि लछिमन सीता कै बानी ।
बिरह बिबेक धरम निति सानी ॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ ।
प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥
देखि राम रुख लछिमन धाए ।
पावक प्रगटि काठ बहु लाए ॥
पावक प्रबल देखि बैदेही ।
हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही ॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं ।
तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना ।
मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना ॥
छं॰ श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली ।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली ॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे ।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥ १ ॥

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो ।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो ॥
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली ।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥ २ ॥

दो॰ बरषहिं सुमन हरषि सुन बाजहिं गगन निसान ।
गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान ॥ १०९(क) ॥

जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार ।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार ॥ १०९(ख) ॥

तब रघुपति अनुसासन पाई ।
मातलि चलेउ चरन सिरु नाई ॥
आए देव सदा स्वारथी ।
बचन कहहिं जनु परमारथी ॥
दीन बंधु दयाल रघुराया ।
देव कीन्हि देवन्ह पर दाया ॥
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी ।
निज अघ गयउ कुमारगगामी ॥
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी ।
सदा एकरस सहज उदासी ॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय ।
अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥
मीन कमठ सूकर नरहरी ।
बामन परसुराम बपु धरी ॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो ।
नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो ॥
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही ।
काम लोभ मद रत अति कोही ॥
अधम सिरोमनि तव पद पावा ।
यह हमरे मन बिसमय आवा ॥
हम देवता परम अधिकारी ।
स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥
भव प्रबाहँ संतत हम परे ।
अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥
दो॰ करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि ।
अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि ॥ ११० ॥

छं॰ जय राम सदा सुखधाम हरे ।
रघुनायक सायक चाप धरे ॥
भव बारन दारन सिंह प्रभो ।
गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥
तन काम अनेक अनूप छबी ।
गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥
जसु पावन रावन नाग महा ।
खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥
जन रंजन भंजन सोक भयं ।
गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥
अवतार उदार अपार गुनं ।
महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥
अज ब्यापकमेकमनादि सदा ।
करुनाकर राम नमामि मुदा ॥
रघुबंस बिभूषन दूषन हा ।
कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥
गुन ग्यान निधान अमान अजं ।
नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं ।
खल बृंद निकंद महा कुसलं ॥
बिनु कारन दीन दयाल हितं ।
छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥
भव तारन कारन काज परं ।
मन संभव दारुन दोष हरं ॥
सर चाप मनोहर त्रोन धरं ।
जरजारुन लोचन भूपबरं ॥
सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं ।
मद मार मुधा ममता समनं ॥
अनवद्य अखंड न गोचर गो ।
सबरूप सदा सब होइ न गो ॥
इति बेद बदंति न दंतकथा ।
रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए ।
निरखंति तवानन सादर ए ॥
धिग जीवन देव सरीर हरे ।
तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥
अब दीन दयाल दया करिऐ ।
मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ ॥
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ ।
दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ ॥
खल खंडन मंडन रम्य छमा ।
पद पंकज सेवित संभु उमा ॥
नृप नायक दे बरदानमिदं ।
चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं ॥
दो॰ बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात ।
सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए ।
तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥
अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा ।
आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ ।
जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥
सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी ।
नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना ।
चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो ।
दसरथ भेद भगति मन लायो ॥
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं ।
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं ॥
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा ।
दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥
दो॰ अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस ।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥

छं॰ जय राम सोभा धाम ।
दायक प्रनत बिश्राम ॥
धृत त्रोन बर सर चाप ।
भुजदंड प्रबल प्रताप ॥ १ ॥

जय दूषनारि खरारि ।
मर्दन निसाचर धारि ॥
यह दुष्ट मारेउ नाथ ।
भए देव सकल सनाथ ॥ २ ॥

जय हरन धरनी भार ।
महिमा उदार अपार ॥
जय रावनारि कृपाल ।
किए जातुधान बिहाल ॥ ३ ॥

लंकेस अति बल गर्ब ।
किए बस्य सुर गंधर्ब ॥
मुनि सिद्ध नर खग नाग ।
हठि पंथ सब कें लाग ॥ ४ ॥

परद्रोह रत अति दुष्ट ।
पायो सो फलु पापिष्ट ॥
अब सुनहु दीन दयाल ।
राजीव नयन बिसाल ॥ ५ ॥

मोहि रहा अति अभिमान ।
नहिं कोउ मोहि समान ॥
अब देखि प्रभु पद कंज ।
गत मान प्रद दुख पुंज ॥ ६ ॥

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव ।
अब्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥
मोहि भाव कोसल भूप ।
श्रीराम सगुन सरूप ॥ ७ ॥

बैदेहि अनुज समेत ।
मम हृदयँ करहु निकेत ॥
मोहि जानिए निज दास ।
दे भक्ति रमानिवास ॥ ८ ॥

दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं ।
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥
सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं ।
ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं ॥
दो॰ अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल ।
काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल ॥ ११३ ॥

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे ।
परे भूमि निसचरन्हि जे मारे ॥
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना ।
सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥
सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी ।
अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी ॥
प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई ।
केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई ॥
सुधा बरषि कपि भालु जिआए ।
हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए ॥
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर ।
जिए भालु कपि नहिं रजनीचर ॥
रामाकार भए तिन्ह के मन ।
मुक्त भए छूटे भव बंधन ॥
सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा ।
जिए सकल रघुपति कीं ईछा ॥
राम सरिस को दीन हितकारी ।
कीन्हे मुकुत निसाचर झारी ॥
खल मल धाम काम रत रावन ।
गति पाई जो मुनिबर पाव न ॥
दो॰ सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान ।
देखि सुअवसरु प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥ ११४(क) ॥

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि ।
पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि ॥ ११४(ख) ॥

छं॰ मामभिरक्षय रघुकुल नायक ।
धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥
मोह महा घन पटल प्रभंजन ।
संसय बिपिन अनल सुर रंजन ॥ १ ॥

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर ।
भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥
काम क्रोध मद गज पंचानन ।
बसहु निरंतर जन मन कानन ॥ २ ॥

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन ।
प्रबल तुषार उदार पार मन ॥
भव बारिधि मंदर परमं दर ।
बारय तारय संसृति दुस्तर ॥ ३ ॥

स्याम गात राजीव बिलोचन ।
दीन बंधु प्रनतारति मोचन ॥
अनुज जानकी सहित निरंतर ।
बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥ ४ ॥

मुनि रंजन महि मंडल मंडन ।
तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ॥ ५ ॥

दो॰ नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार ।
कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार ॥ ११५ ॥

करि बिनती जब संभु सिधाए ।
तब प्रभु निकट बिभीषनु आए ॥
नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी ।
बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी ॥
सकुल सदल प्रभु रावन मार यो ।
पावन जस त्रिभुवन बिस्तार यो ॥
दीन मलीन हीन मति जाती ।
मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती ॥
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे ।
मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे ॥
देखि कोस मंदिर संपदा ।
देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा ॥
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ ।
पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ ॥
सुनत बचन मृदु दीनदयाला ।
सजल भए द्वौ नयन बिसाला ॥
दो॰ तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात ।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात ॥ ११६(क) ॥

तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि ।
देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि ॥ ११६(ख) ॥

बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर ।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥ ११६(ग) ॥

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं ।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥ ११६(घ) ॥

सुनत बिभीषन बचन राम के ।
हरषि गहे पद कृपाधाम के ॥
बानर भालु सकल हरषाने ।
गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने ॥
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो ।
मनि गन बसन बिमान भरायो ॥
लै पुष्पक प्रभु आगें राखा ।
हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा ॥
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन ।
गगन जाइ बरषहु पट भूषन ॥
नभ पर जाइ बिभीषन तबही ।
बरषि दिए मनि अंबर सबही ॥
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं ।
मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं ॥
हँसे रामु श्री अनुज समेता ।
परम कौतुकी कृपा निकेता ॥
दो॰ मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥ ११७(क) ॥

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम ।
राम कृपा नहि करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥ ११७(ख) ॥

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए ।
पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥
नाना जिनस देखि सब कीसा ।
पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥
चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया ।
बोले मृदुल बचन रघुराया ॥
तुम्हरें बल मैं रावनु मार यो ।
तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार यो ॥
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू ।
सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर ।
जोरि पानि बोले सब सादर ॥
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा ।
हमरे होत बचन सुनि मोहा ॥
दीन जानि कपि किए सनाथा ।
तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं ।
मसक कहूँ खगपति हित करहीं ॥
देखि राम रुख बानर रीछा ।
प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा ॥
दो॰ प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि ।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥ ११८(क) ॥

कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान ।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान ॥ ११८(ख) ॥

दो॰ कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि ।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥ ११८(ग) ॥

~ अतिसय प्रीति देख रघुराई ।
लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो ।
उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥
चलत बिमान कोलाहल होई ।
जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर ।
श्री समेत प्रभु बैठै ता पर ॥
राजत रामु सहित भामिनी ।
मेरु सृंग जनु घन दामिनी ॥
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर ।
कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर ॥
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी ।
सागर सर सरि निर्मल बारी ॥
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा ।
मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा ॥
कह रघुबीर देखु रन सीता ।
लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता ॥
हनूमान अंगद के मारे ।
रन महि परे निसाचर भारे ॥
कुंभकरन रावन द्वौ भाई ।
इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई ॥
दो॰ इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम ।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥ ११९(क) ॥

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम ।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम ॥ ११९(ख) ॥

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा ।
दंडक बन जहँ परम सुहावा ॥
कुंभजादि मुनिनायक नाना ।
गए रामु सब कें अस्थाना ॥
सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा ।
चित्रकूट आए जगदीसा ॥
तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा ।
चला बिमानु तहाँ ते चोखा ॥
बहुरि राम जानकिहि देखाई ।
जमुना कलि मल हरनि सुहाई ॥
पुनि देखी सुरसरी पुनीता ।
राम कहा प्रनाम करु सीता ॥
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा ।
निरखत जन्म कोटि अघ भागा ॥
देखु परम पावनि पुनि बेनी ।
हरनि सोक हरि लोक निसेनी ॥
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि ।
त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि ॥

दो॰ सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम ।
सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम ॥ १२०(क) ॥

पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह ।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह ॥ १२०(ख) ॥

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई ।
धरि बटु रूप अवधपुर जाई ॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु ।
समाचार लै तुम्ह चलि आएहु ॥
तुरत पवनसुत गवनत भयउ ।
तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही ।
अस्तुती करि पुनि आसिष दीन्ही ॥
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी ।
चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए ।
नाव नाव कहँ लोग बोलाए ॥
सुरसरि नाघि जान तब आयो ।
उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ॥
तब सीताँ पूजी सुरसरी ।
बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी ॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा ।
सुंदरि तव अहिवात अभंगा ॥
सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल ।
आयउ निकट परम सुख संकुल ॥
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही ।
परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही ॥
प्रीति परम बिलोकि रघुराई ।
हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥
छं॰ लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती ।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती ।
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे ।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥ १ ॥

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो ।
मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो ॥
यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा ।
कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥ २ ॥

दो॰ समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान ।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥ १२१(क) ॥

यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार ।
श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥ १२१(ख) ॥
मासपारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठः सोपानः समाप्तः ।

(लंकाकाण्ड समाप्त)

उत्तरकाण्ड

श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस सप्तम सोपान (उत्तरकाण्ड)

श्लोक
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम, पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम ||१ ||

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ, जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ ||२ ||

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम, कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम ||३ ||

दो -
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग, जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ||
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर, प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ||
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ, आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ ||
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार, जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ||
रहेउ एक दिन अवधि अधारा, समुझत मन दुख भयउ अपारा ||
कारन कवन नाथ नहिं आयउ, जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ||
अहह धन्य लछिमन बड़भागी, राम पदारबिंदु अनुरागी ||
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा, ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ||
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी, नहिं निस्तार कलप सत कोरी ||
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ, दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ||
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई, मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ||
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना, अधम कवन जग मोहि समाना ||

दो -
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत, बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ||
१(क) ||
बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात, राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात ||
१(ख) ||
देखत हनूमान अति हरषेउ, पुलक गात लोचन जल बरषेउ ||
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी, बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ||
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती, रटहु निरंतर गुन गन पाँती ||
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता, आयउ कुसल देव मुनि त्राता ||
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत, सीता सहित अनुज प्रभु आवत ||
सुनत बचन बिसरे सब दूखा, तृषावंत जिमि पाइ पियूषा ||
को तुम्ह तात कहाँ ते आए, मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ||
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना, नामु मोर सुनु कृपानिधाना ||
दीनबंधु रघुपति कर किंकर, सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ||
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता, नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ||
कपि तव दरस सकल दुख बीते, मिले आजु मोहि राम पिरीते ||
बार बार बूझी कुसलाता, तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता ||
एहि संदेस सरिस जग माहीं, करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ||
नाहिन तात उरिन मैं तोही, अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ||
तब हनुमंत नाइ पद माथा, कहे सकल रघुपति गुन गाथा ||
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं, सुमिरहिं मोहि दास की नाईं ||
छं -
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर यो, सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकित तन चरनन्हि पर यो ||
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो, काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ||

दो -
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात, पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ||
२(क) ||
सो -
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं, कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ||
२(ख) ||
हरषि भरत कोसलपुर आए, समाचार सब गुरहि सुनाए ||
पुनि मंदिर महँ बात जनाई, आवत नगर कुसल रघुराई ||
सुनत सकल जननीं उठि धाईं, कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ||
समाचार पुरबासिन्ह पाए, नर अरु नारि हरषि सब धाए ||
दधि दुर्बा रोचन फल फूला, नव तुलसी दल मंगल मूला ||
भरि भरि हेम थार भामिनी, गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी ||
जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं, बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ||
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई, तुम्ह देखे दयाल रघुराई ||
अवधपुरी प्रभु आवत जानी, भई सकल सोभा कै खानी ||
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा, भइ सरजू अति निर्मल नीरा ||

दो -
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत, चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ||
३(क) ||
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान, देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ||
३(ख) ||
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान, बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ||
३(ग) ||
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर, कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ||
सुनु कपीस अंगद लंकेसा, पावन पुरी रुचिर यह देसा ||
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, बेद पुरान बिदित जगु जाना ||
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ, यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ||
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ||
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा, मम समीप नर पावहिं बासा ||
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी, मम धामदा पुरी सुख रासी ||
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी, धन्य अवध जो राम बखानी ||

दो -
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान, नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ||
४(क) ||
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु, प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ||
४(ख) ||
आए भरत संग सब लोगा, कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ||
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक, देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ||
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह, अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ||
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया, हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ||
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा, धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ||
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज, नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज ||
परे भूमि नहिं उठत उठाए, बर करि कृपासिंधु उर लाए ||
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े, नव राजीव नयन जल बाढ़े ||
छं -
राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी, अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ||
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही, जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ||
१ ||
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई, सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ||
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो, बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ||
२ ||

दो -
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ, लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ||
५ ||
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे, दुसह बिरह संभव दुख मेटे ||
सीता चरन भरत सिरु नावा, अनुज समेत परम सुख पावा ||
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी, जनित बियोग बिपति सब नासी ||
प्रेमातुर सब लोग निहारी, कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ||
अमित रूप प्रगटे तेहि काला, जथाजोग मिले सबहि कृपाला ||
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी, किए सकल नर नारि बिसोकी ||
छन महिं सबहि मिले भगवाना, उमा मरम यह काहुँ न जाना ||
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा, आगें चले सील गुन धामा ||
कौसल्यादि मातु सब धाई, निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई ||
छं -
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं, दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई ||
अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे, गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ||

दो -
भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि, रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि ||
६(क) ||
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ, कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ||
६ ||
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही, चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ||
देहिं असीस बूझि कुसलाता, होइ अचल तुम्हार अहिवाता ||
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं, मंगल जानि नयन जल रोकहिं ||
कनक थार आरति उतारहिं, बार बार प्रभु गात निहारहिं ||
नाना भाँति निछावरि करहीं, परमानंद हरष उर भरहीं ||
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि, चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ||
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा, कवन भाँति लंकापति मारा ||
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे, निसिचर सुभट महाबल भारे ||

दो -
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु, परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ||
७ ||
लंकापति कपीस नल नीला, जामवंत अंगद सुभसीला ||
हनुमदादि सब बानर बीरा, धरे मनोहर मनुज सरीरा ||
भरत सनेह सील ब्रत नेमा, सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ||
देखि नगरबासिन्ह कै रीती, सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती ||
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए, मुनि पद लागहु सकल सिखाए ||
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे, इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ||
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे, भए समर सागर कहँ बेरे ||
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे, भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ||
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए, निमिष निमिष उपजत सुख नए ||

दो -
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ ||
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ||
८(क) ||
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद, चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ||
८(ख) ||
कंचन कलस बिचित्र सँवारे, सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ||
बंदनवार पताका केतू, सबन्हि बनाए मंगल हेतू ||
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई, गजमनि रचि बहु चौक पुराई ||
नाना